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स्वर्ण से कम नहीं यह कांस्य - अशोक कुमार

स्वर्ण से कम नहीं यह कांस्य -   अशोक कुमार


क्या खूब खेली हमारी हॉकी टीम! दूसरे क्वार्टर में जर्मनी ने कुछ मिनटों के अंतराल पर ही दो गोल दाग दिए थे और हम 3-1 से पिछड़ गए। मगर उसी क्वार्टर के आखिरी पांच मिनटों में हमारे लड़कों ने खेल बराबर कर दिया। और, इसके बाद जो कुछ हुआ, वह इतिहास है। 41 साल के बाद हमारी पुरुष हॉकी टीम ओलंपिक के पोडियम पर पहुंची। वाकई, क्या जोश और जज्बा था खिलाड़ियों में। अगर उन्हें आधा घंटा और खेलना पड़ता, तब भी उनके चेहरे पर थकान नहीं दिखती। हालांकि, इस जीत में कुछ योगदान किस्मत का भी रहा। आखिरी पांच सेकंड में जिस तरह से जर्मनी को पेनाल्टी मिली और हमारे गोलकीपर पीआर श्रीजेश ने जिस तत्परता से उसे रोका, वह चमत्कार जैसा ही था। एकाध बार तो गेंद हमारी गोलपोस्ट के दाएं-बाएं से निकल गई। फिर भी, ओलंपिक का यह कांस्य किसी स्वर्ण पदक से कम नहीं है।

इस टीम से पदक की उम्मीद ओलंपिक के पहले से ही की जा रही थी। इस भविष्यवाणी का आधार हमारी ताकत, कमजोरी पर मेहनत और हमारा मनोबल था। टीम का ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करना, विश्व हॉकी की रैंकिंग में आठवें से चौथे स्थान पर आना, और बड़ी-बड़ी टीमों के खिलाफ पूरे जोश के साथ सफलतापूर्वक लड़ना, हरेक हॉकीप्रेमी को आश्वस्त कर रहा था कि यह अटीम टोक्यो से पदक लेकर ही लौटेगी। शुरुआती मैच हम न्यूजीलैंड से जीते, फिर ऑस्ट्रेलिया से हारे, लेकिन इन जीत-हार के बावजूद पुल से आगे बढे़ और सेमीफाइनल में पहुंचे। हम चूंकि नीचे से उठकर ऊपर पहुंचे थे, जिससे टीम में काफी विविधता थी, सोचने-खेलने की अलग-अलग प्लानिंग थी और हमारा उत्साह भी चरम पर था। फिर भी, हम सेमीफाइनल जीत नहीं सके। खास बात यह कि हमारे खिलाड़ियों ने इस हार को ओढ़ा नहीं। प्रधानमंत्री ने भी बाकायदा टीम को सराहा, जिसने खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाया होगा। उन्हें महसूस हुआ होगा कि हार के बाद भी उन्हें अपने देश, लोग और सरकारों की तरफ से पूरा प्यार मिल रहा है। ऐसे में, रुपिंदर पाल सिंह, हरमनप्रीत, अमित रोहिदास जैसे खिलाड़ी जर्मनी के खिलाफ मैच में हमारी ऐतिहासिक जीत की रीढ़ बन गए। यहां मुझे अनायास 1972 के ओलंपिक खेल याद आ रहे हैं, जिसकी टीम का मैं भी सदस्य था। तब से लेकर अब तक काफी कुछ बदल चुका है। उस समय कोचिंग, प्रशिक्षण की सुविधाएं, खान-पान आदि तमाम मामलों में हमें महज 10 फीसदी मदद मिला करती थी। हम ‘सेल्फ प्लेयर’ थे। अपना कोच खुद ही होते थे। कैंप एकाध महीने ही लगते, जिसका ठिकाना आमतौर पर पटियाला होता। कैंप में हमें कोचिंग मिलती, सामूहिक मैच खेले जाते और शारीरिक मेहनत पर ध्यान दिया जाता। आज ऐसा नहीं है। 

अब खिलाड़ियों को शायद ही कोई शिकायत होती है। अब तो राइट हाफ, लेफ्ट हाफ, सेंट्रल हाफ, फॉरवर्ड सब अलग-अलग खेल हैं और सबके अलग-अलग खिलाड़ी, जबकि हमारे समय में पांच फॉरवर्ड ही खेला करते थे। आज तो हॉकी का बिल्कुल कायाकल्प हो गया है। इसकी विधा ही बदल गई है, नियम-कायदे बदल गए हैं, और तो और, मैदान भी बदल गए हैं। हम घास के मैदानों में खेला करते थे, लेकिन आज ‘आर्टिफिशियल टर्फ’ पर खेल होते हैं। बहरहाल, उन दिनों को आज याद करने का कोई खास मतलब नहीं है। गुरुवार सुबह की जीत देश के हर परिवार ने महसूस की। मेरे पास ऐसे कई शुभकामना संदेश आए, जिन्हें पढ़कर लगा, मानो संदेश भेजने वाले परिवार का कोई बच्चा मेडल जीतकर लौट रहा हो। जब ऐसा माहौल बनने लगे, तो समझिए कि पूरे देश में इस खेल का डंका बज चुका है। अगले कुछ दिनों तक, संभवत: महीना भर तक सिर्फ हॉकी की बातें होंगी। जरूरत इस माहौल को संभालकर रखने की है, जिसकी जिम्मेदारी हमारे कर्णधारों पर है। खेल संगठनों, प्रशासकों, प्रबंधकों, प्रायोजकों, राज्यों और वे सभी, जो हॉकी की दशा-दिशा तय करते हैं, इसे संभालने की हरसंभव कोशिश करें। इसके लिए बाकायदा प्लानिंग करनी होगी और हॉकी को ऊपर उठाना होगा। क्रिकेट को जीने वाला हमारा समाज हॉकी को भी खूब पसंद करता है, बस उसे प्रोत्साहित करने की जरूरत है।

यह प्रोत्साहन कैसे मिले? इसके लिए जरूरी है कि जगह-जगह टर्फ बनाए जाएं। अभी तो कई राज्यों में महज दो-तीन टर्फ ही हैं। वहां जिला स्तरीय और राज्य स्तरीय टूर्नामेंट घास के मैदान में होते हैं। यह तस्वीर अब बदलनी चाहिए। इस मामले में पंजाब, हरियाणा जैसे राज्य अच्छा काम कर रहे हैं। पंजाब से इसीलिए खिलाड़ी ज्यादा निकलते हैं, क्योंकि वहां हॉकी को खासा प्रोत्साहन दिया जाता है। वहां एकेडमिक हैं, ग्राउंड है, पैसा दे-देकर लोग अपने बच्चों की ट्रेनिंग करवाते हैं। हरियाणा भी अपने खिलाड़ियों को तमाम तरह की सुविधाएं देता है। जरा सोचिए। सन् 1975 में जब हमारी टीम ने वल्र्ड कप जीता था, तब हमें एअर इंडिया से बतौर ‘इन्सेंटिव’ दो-दो बार 50-50 रुपये मिले थे। मुझे ही नहीं, बी पी गोविंदा, और असलम शेर खान को भी इतने ही रुपये दिए गए थे। बरसों बाद हमारे चेयरमैन ने एक समारोह में विजेता टीम के खिलाड़ियों को 3,000-3,000 रुपये देकर सम्मानित किया था। आज ऐसी नौबत नहीं आने वाली। एक जीत पर केंद्र व राज्य सरकारें इनामों की बारिश करने लगती हैं। खिलाड़ियों को प्रतिष्ठित पदों पर सरकारी नौकरियां मिलने लगी हैं। रही बात टर्फ की, तो एक काम यह हो सकता है कि स्कूलों को मिलने वाली करोड़ों की राशि का कुछ हिस्सा टर्फ के निर्माण पर लगाया जाए। स्कूल चाहें, तो अच्छे मैदान बना सकते हैं। इससे उन्हीं को फायदा होगा। एक बार जब मैदान तैयार हो जाएगा, तो बच्चा खुद-ब-खुद हॉकी स्टिक उठा लेगा। और यह जगजाहिर मान्यता है कि जहां संख्या ज्यादा होती है, वहां गुणवत्ता भी ज्यादा दिखती है। हमें बच्चों को प्रेरित करना ही होगा। अगर सभी राज्य ऐसा करने लगेंगे, तो यकीन मानिए कि हॉकी का स्वर्ण युग जल्द ही लौट आएगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)