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किसान कानून: मिले सुर मेरा तुम्हारा का नया शरद राग - डॉ राजाराम त्रिपाठी

किसान कानून: मिले सुर मेरा तुम्हारा का नया शरद राग - डॉ राजाराम त्रिपाठी


राजनीति मुसीबत की तलाश करने, उसे हर जगह खोजकर ढूंढ निकालने, उसका गलत तरीके से निदान करने और गलत उपायों को लागू करने की कला है ; ग्रूचो की इस उक्ति को  भाजपा ने अपने दूसरे कार्यकाल में, कम-से-कम अब तक तो भली भांति सही साबित किया है। जिस तरह से इन्होंने अपने चंद शक्तिशाली मित्रों को प्रसन्न करने के लिए, बैठे ठाले तीन नये कृषि कानून किसानों पर थोपकर  मधुमक्खी के छत्तों पर बारी बारी से पत्थर फेंके हैं, उससे साबित तो यही होता है। सरकार भले ही जाहिर ना करे, पर वह देश के  किसानों के बीच अपनी तेजी से घटती लोकप्रियता से बेहद घबराई हुई है। कोरोना की लगातार पड़ रही मार, रोजगार के सिकुड़ते अवसर, गगनचुंबी महंगाई, विशेषकर पेट्रोल डीजल के आसमान छूते दाम सहित कई मोर्चों पर लगातार विफलता ने प्रबल बहुमत लेकर आई इस सरकार को इस कदर झकझोर कर रख दिया है, कि इसके एक दर्जन भर बेहद खास मंत्री, पके आमों की तरह ऐसे टपक गए कि यकायक वो "खास ओ खास" से  'सड़े आम' हो गए। 

 हाल में ही सरकार से एकमुश्त 12 प्रमुख मंत्रियों को हटाया जाना दरअसल इसी का परिचायक है। राजनीति की नब्ज पहचानकर सही समय पर सही दांव लगाने में माहिर वेटरन पहलवान शरद पवार ने मौके का फायदा उठाते हुए हालिया तीनों कृषि कानूनों पर सरकार को सुहाने वाला बयान देकर  अपने पत्ते खोल दिए हैं, जाहिर है वह अपना प्रसिद्ध और निर्णायक धोबी पाट लगाने की तैयारी में हैं । शरद पवार के इस बयान के मायने सरकार के लिए , अन्य पार्टियों के लिए तथा देश के किसानों के लिए, क्या क्या हो सकते हैं, इसे समझना जरूरी है। जब यह कानून अध्यादेश की सूरत में 5 जून 2020 को लाए गए थे, तो 48 घंटे के भीतर ही अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा) ने तीनों कानूनों  को पूरी तरह से कारपोरेट के पक्ष में गढ़ा हुआ बताते हुए इनका विरोध दर्ज किया था, तथा 16 जून 2020 की बैठक में अधिकांश किसान संगठनों ने आईफा के इस पक्ष का समर्थन भी कर दिया था, जिसकी परिणति दिल्ली किसान आंदोलन के रूप में पिछले सितंबर प्रारंभ हुई। किसान आंदोलन के परवान चढ़ने के साथ ही ,शरद पवार ने दिसंबर 2020 के पहले हफ्ते में ही किसान आंदोलन को अपना समर्थन देने की घोषणा की थी । अब यहां सोचने वाली दो बातें हैं, पहली यह कि 5 जून को जब अध्यादेश लाए गए तब से लेकर सितंबर तक,  जब तक किसान दिल्ली की ओर कूच  नहीं किए, तब तक हमेशा किसानों के नाम पर राजनीति करने वाले इस शातिर राजनीतिज्ञ ने इन कानूनों के बारे में अपना कोई भी निर्णायक रुख जाहिर नहीं किया था। लेकिन जब प्रबल किसान आंदोलन खड़ा होने लगा तब इन्होंने किसानों के पक्ष में बयानबाजी शुरू की। लेकिन अब सोचने समझने वाली बात यह है कि,  इधर इन 7 सात  महीनों में आखिर ऐसा क्या हुआ शरद पवार जी की आंखों की रोशनी इस कदर साफ हुई है , कि वह तीनों कानून जो पहले इन्हें  किसान विरोधी लगते थे, अचानक से इन्हें इन नामुराद कानूनों में अनेकों अच्छाइयां दिखने लगी हैं, जबकि कारपोरेट्स के दबाव में इन कानूनों को लेकर लाने वाली सरकार को भी, पिछले दौर की वार्ताओं में (किसान संगठनों द्वारा दिखाए जाने पर) ,अब इनमें 16 खामियां तो नजर आ ही गई हैं, जिन्हे  बदलने के लिए भी सरकार तैयार हो गई है। उधर  सुप्रीम कोर्ट ने भी इन कानूनों की खामियों को देखते समझते हुए इन पर रोक लगाई हुई है। फिर शरद पवार जी को अचानक यह गूढ ग्यान कहां से प्राप्त हो गया‌ कि ये कानून किसान विरोधी नहीं हैं।  क्या इन तीनों कृषि कानूनों ने भी राजनीतिज्ञों की भांति ही रातों-रात पाला बदल लिया, और कारपोरेट्स हित  को छोड़कर वे रातों-रात किसान हितेषी हो गए हैं।  दरअसल शरद पवार ने हमेशा किसानों की राजनीति की है, और किसान समर्थन के दम पर ही पायदान दर पायदान सीढ़ियां चढ़ते हुए राजनीति मी एक विशिष्ट ऊंचाई हासिल की है। पर इनकी कृषक राजनीति का किसानों को कितना फायदा हुआ है, वह बिल्कुल  दिगर बात है। लगातार 10 साल तक कृषि मंत्री रहे शरद पवार की कृषि विकास की दृष्टि "बारामती से आगे कभी नहीं बढ़ पाई। इनके लिए देश की खेती का मतलब बारामती की खेती, देश का किसान का मतलब केवल अपने चुनाव क्षेत्र का किसान। बाकी समग्र देश की खेती किसानी और किसान से इनका कभी कोई खास लेना-देना और सरोकार नहीं रहा। अगर ऐसा न होता तो, जब यह 10 वर्षों तक देश के कृषि मंत्री थे, उसी दशक में देश में खेती किसानी में हुए लगातार घाटे से मजबूर होकर सबसे ज्यादा संख्या में आत्महत्या करने वाले किसानों के जिलों की गणना सूची में देश भर में प्रथम स्थान, द्वितीय स्थान तथा तृतीय स्थान पर  इनके अपने प्रदेश महाराष्ट्र के यवतमाल, अमरावती, वर्धा  आदि ज़िलों की गिनती नहीं होती। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि पवार इसी सूबे के लंबे समय तक मुख्यमंत्री भी रहे हैं। यूं तो राजनीति में सत्ता पाने के बाद कुछ ही समय में नल्ले निठल्ले नेताओं को भी कुबेरपति बनते देखने की जनता आदी हो गई है। पर पवार ने इस क्षेत्र में जो कीर्तिमान स्थापित किए वह वह अनूठे हैं। लाखों करोड़ के खाद अनुदान, बीज, दवाई, ड्रिप इरिगेशन, स्प्रिंकलरस, पाली हाउस, ट्रेक्टर, अन्य कृषि यंत्र आदि की कंपनियों से गठजोड़ तथा विभिन्न अनुदानों के खेल तथा उन पर बहुस्तरीय कमीशनखोरी के खेल के संबंध में उनकी एक सफल राष्ट्रीयनीति थी उस पर विस्तार से चर्चा फिर कभी। मराठा राजनीति के साथ ही युति के रूप में पवार ने हमेशा किसानों वोट तथा किसान नेताओं का भरपूर उपयोग किया और एक पृथक राजनैतिक कार्यशैली विकसित की है।   इन्होंने अपने चुनिंदा विश्वासपात्र छुटभैय्ये नेताओं को पर्याप्त आर्थिक तथा राजनीतिक अवसर तथा आधार प्रदान कर उन्हें हर तरह से मजबूत कर अपने और केवल अपने लिए  एक सर्व समर्थ , सशक्त कट्टर, समर्थक जमात तैयार की। शरद पवार के राजनीतिक उतार-चढ़ाव के पलों में यह पूंजी उनके बहुत काम आई। शरद पवार केवल किसान राजनीति के ही नहीं बल्कि खेती किसानी के सभी मुद्दों के बहुत ही अच्छे विशेषज्ञ जानकार भी हैं,लेकिन यह दुर्भाग्य ही है कि, हमेशा किसानों की नाम पर राजनीति करने वाले शरद पवार ने वास्तविक रूप से देश किसानों की कभी सुध ही नहीं ली। हकीकत तो यही है की शरद पवार के दशकीय कृषि मंत्रित्व काल में भारत की कृषि रसातल में चली गई ,यूं कहना भी अनुचित न होगा कि आज भारत की कृषि तथा किसान अगर मरणासन्न अवस्था में आईसीयू में पहुंच गये हैं , तो इसे इस  अधोगति व महापतन तक पहुंचाने के घोरपाप से, इस देश के अबाध रूप से 10 वर्षों तक कृषि मंत्री रहने वाले शरद पवार अपने आप को नहीं बचा सकते। तीनों कृषि कानून लाए जाने के शुरुआत में किसानों के पक्ष में घड़ियाली आंसू बहाने के बाद अब अचानक पलटी मारकर  शरद पवार जी  सरकार के सुर में अपना सुर मिलाने लगे हैं, और इसीलिए देश के किसानों के लिए शरद पवार अब पूरे  बेसुरे हो गए हैं। निश्चित रूप से इन तीनों कानूनों के पक्ष में, पवार के यह वचनामृत  अकारण नहीं टपक रहे हैं, क्योंकि शरद पवार जी का इतिहास उठाकर देख लीजिए, वह कभी भी कुछ भी अकारण ना कहते हैं, ना करते हैं। उनका दाहिना हाथ क्या कर रहा है वह बाएं हाथ को पता नहीं होता और वह क्या सोच रहे हैं यह दूसरों को तब पता चलता है, जब वह उस कार्य को संपन्न कर चुके होते हैं । केन्द्र सरकार की साथ सुर मिलाकर गृहराज्य महाराष्ट्र की वर्तमान राजनीति में अपने लिए अधिक मजबूत स्थायित्व की तलाश के साथ ही केंद्र में भी अपना महत्त्व तथा वजन पुनः स्थापित करने का लक्ष्य साधकर, दरअसल  पवार का  एक तीर से दो शिकार करने का  प्रयास कर रहे हैं। हालांकि इसे अभी दूर की कौड़ी ही कहा जाएगा, पर इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि  अगर कोई 'तीसरा मोर्चा' बनता है तो, पवार की इन हालिया कसरतों से उनका कद और महत्व बढ़ सकता है, जो कि उनकी चिरआकांक्षा की पूर्ति हेतु सौदेबाजी में मदद कर सकता है। और उनकी चिर आकांक्षा से तो सभी परिचित हैं ही। देश के  किसानों के विरोध में सरकार के पक्ष में खड़े होकर शरद पवार ने न केवल अपनी प्रासंगिकता देश के किसानों को के सामने खो दी है, बल्कि कृषि के जानकार, किसान हितैषी नेता की जो छवि उन्होंने 1967 से लेकर अब तक , आधी सदी तक लगातार गढते हुए बड़े ही परिश्रम से तैयार की थी ,अपनी वह भव्य प्रतिमा उन्होंने स्वयं अपने हथौड़े के एक ही प्रहार से चकनाचूर कर दी। 

ऑस्कर आमिंगर ने कहा है कि, राजनीति एक दूसरे से रक्षा करने का वादा करके, गरीबों से वोट पाने और अमीरों से प्रचार के धन प्राप्त करने की सौम्य कला है। और चाहे कांग्रेस हो अथवा भाजपा अथवा अन्य कोई भी बड़े दल , सभी को बड़े कारपोरेट्स को साधकर, किसान मजदूरों के नाम पर सत्ता हासिल करने  की सफल राजनीति का ककहरा जाने अनजाने में शरद पवार ने ही सिखाया है। हालांकि वर्तमान राजनीति में गुरु दक्षिणा के रूप में  शिष्य एकलव्य की भांति अपने गुरु द्रोणाचार्य को अपना अंगूठा देने की परंपरा के बजाय  संपूर्ण विद्या सीखने के बाद प्रायः शिष्य के द्वारा गुरु का ही सिर और कुर्सी हासिल कर लेने की परंपरा चल पड़ी हैं । पर इस मामले में भी शरद पवार बेहद ही घाघ, सतर्क और भाग्यशाली राजनीतिक गुरु साबित हुए हैं, तभी तो अब तक उनका कोई भी शिष्य अथवा परिजन उनका बाल तक बांका नहीं कर पाया है। पर जैसा कि कहा जाता है की मजबूत से मजबूत बरगद के पेड़ के लिए भी  तूफान का एक दिन जरूर तय रहता है, जो अपने वक्त पर उसे उखाड़ फेंकता है । पवार के बयान से देश के किसानों में उनके प्रति उपजी नाराजगी उनके लिए वो तूफान बन पाएगी अथवा नहीं यह तो समय ही तय करेगा। लेकिन इस सरकार से किसानों की लगातार बढ़ती नाराजगी तथा निराशा अगर मतदाता केंद्रों व मतपेटियों तक पहुंची तो आगामी चुनावों में यह सरकार निश्चित रूप से धराशाई होगी। यह दीवाल पर लिखी चमकती हुई इबारत है अब इसे सरकार और उनकी पार्टी चाहे इसे पढ़े या न पढ़ें यह उनकी मर्जी।


( लेखक अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा) के राष्ट्रीय संयोजक हैं)