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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - चुनाव में फैलाया गया वायरस ज्यादा खतरनाक है

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - चुनाव में फैलाया गया वायरस ज्यादा खतरनाक है

-सुभाष मिश्र
हम सब जानते हैं कि हमारे देश में होने वाले चुनावों में धर्म, जाति, संप्रदाय के साथ-साथ मनी मीडिया पावर भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। चुनाव में बढ़ते खर्च के साथ-साथ जातीयता और सांप्रदायिकता भी बढ़ी है। राष्ट्रवाद के नाम पर, हिन्दु-मुस्लिम तुष्टिकरण के नाम पर, तो कभी आरक्षण के नाम पर, तो कभी जातिगत भेदभाव, उपेक्षा के नाम पर वोट मांगे गये। चुनाव में कहने को तो विकास का, पिछड़ेपन का, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं के मुद्दे भी शामिल होते हैं, किन्तु चुनाव आते-आते कब वे मंदिर-मस्जिद, हिन्दू-मुस्लिम, क्षेत्रीय अस्मिता, तुष्टिकरण का रूप ले लेता है, और हमें पता ही नही चलता। आज पूरे देश की लचर स्वास्थ्य सेवाओं को देखकर हम समझ सकते हैं की हमारे नेताओं की प्राथमिकताएं क्या रही होंगी?

हमार बांगला, सोनार बांगला की अनुगूंज से अभिभूत हर बंगाली भाषी को अपने बंगाल की रीति रिवाज, रवींद्र संगीत से लेकर अपनी साहित्यिक, सांस्कृतिक पृष्ठ भूमि के साथ अपनी मिस्टी रसोगुल्ला पर नाज है, आज बंटा हुआ है। जिस दुर्गा पूजा को लेकर आज राजनीति हो रही है, उसका हर बंगाली को चाहे वो किसी भी जाति, धर्म का क्यों ना हो, इंतजार रहता है। इस विधानसभा के इस चुनाव ने बंगाली स्वाभिमान को झकझोरा है। बंगाली प्राइड यानी जाति-धर्म और राज्य और देश सीमाओ से परे फैले हुए यहां के लोग अपनी विरासत, प्रबुद्धता और सांस्कृतिक समृद्धता पर जिस तरह से फक्र करते थे, उसे इस बार के चुनाव में गहरा धक्का लगा है। इस चुनाव में बंगाली, गैरबंगाली, बाहरी-भीतरी और हिन्दू-मुस्लिम की भावना को हवा देकर बंगाली स्वाभिमान को क्षतिग्रस्त किया है। दो मई को आने वाले चुनाव परिणाम में भले ही कोई भी पार्टी जीते किन्तु सर्वाधिक नुकसान बंगाल की संस्कृति विरासत को होगा।

मोदी जी का कला, साहित्य, संस्कृति और शिक्षा से गहरा प्रेम किसी से छिपा नहीं है। उन्होंने गांधीजी, सरदार पटेल के गुजरात को किस तरह का मॉडल बनाया है, ये सब जानते है। गोधरा और गुजरात के दंगो का भूत कभी-कभी बीच में प्रकट होकर गुजरात मॉडल की याद दिला जाता है। पूरे देश को गुजरात मॉडल बनाने पर तुले मोदीजी, अमित शाह और उनके साथी अब बंगाली प्राइड को नये सिरे से प्रभावित करने आये है। इस आग में घी डालने में ममता बैनजी, औवेसी भी बराबर के मददगार हैं। यही वजह है कि इस विधानसभा चुनाव में जितने आक्रामक तरीके से भाजपा ने जयश्रीराम, हिन्दू ध्रुवीकरण और मुस्लिम तुष्टिकरण की बात उठाई है, उतनी आक्रामकता पहले किसी चुनाव में नहीं दिखाई दी। पश्चिम बंगाल का यह चुनाव वहां के सामाजिक ताने-बाने को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। ऐसा नहीं था कि पश्चिम बंगाल में पहले के चुनाव बहुत शांतिप्रिय तरीके से हुए हो, उन चुनावों में भी लोगों ने अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं का टकराव, मजदूर आंदोलन, औद्योगिक घरानों की उपस्थिति और उनका विरोध, नक्सलबाड़ी आंदोलन सभी कुछ देखा है। इस बार के चुनाव ने सारी हदों को पार कर दिया है।

भाजपा इस बार ममता बैनर्जी की सत्ता से अलग करने के लिए उन्हीं के पार्टी के महत्वाकांक्षी नेताओं को उनसे तोड़कर अपने साथ जोड़ा है। तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल शुभेंद्रु अधिकारी कहते हैं, ममता चंडी पाठ गलत कहती है लेकिन कलमा एकदम ठीक बोलती है। विष्णु को माता बोलती है। ये हिन्दू धर्म का अपमान नहीं तो और क्या है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित भाजपा के सभी स्टार प्रचारकों ने अपने चुनावी मंचों से बार-बार ममता बैनर्जी को सिर्फ मुसलमानों की परवाह करने वाली बताया है। भारतीय राजनीति के पितृ पुरुष राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की राजनीति में धर्म के मेल की बात करते थे, तब उनका मतलब था कि राजनीति में नैतिकता हो, सत्य हो, अहिंसा हो, जो हमें धर्म सीखाता है। लोकतंत्र आने के बाद कुछ राजनीतिक दलों ने अपने स्वार्थ के लिये धर्म को राजनीति में घुसाया और धर्म के नाम पर सांप्रदायिकता भी आई। धर्म और संप्रदाय के नाम पर संगठन बने और इसी आधार पर वोट मांगे जाने लगे। हम देख रहे हैं कि धर्म की राजनीति हमारे लोकतंत्र को नष्ट कर रही है। जो हिटलर अपने नस्लवाद के चलते यहूदियों से घृणा करके जर्मन को श्रेष्ठ बताकर आर्थिक सत्ता यहूदियों से छीनकर जर्मन नस्ल के हाथ में देना चाहता था। वह फासिस्टवादी था और उसने जर्मन जाति को उसकी महत्ता के उन्माद से भर दिया और उन्हें विश्व विजय के समने दिखाएं। यही सपने आज पश्चिम बंगाल को भी दिखाएं जा रहे हैं।

पूरे देश में बढ़ती कोरोना संक्रमण की बेखबर रफ्तार आज साढ़े तीन लाख का आंकड़ा पार कर गई। पश्चिम बंगाल में कोरोना संक्रमण तेजी से फैल रहा है। दो मई को होने वाली मतगणना में भले ही कोई जीते, हारेगा जनता का हौसला।

पश्चिम बंगाल में चुनाव की बागडोर संभाल रहे भाजपा के महासचिव और मध्यप्रदेश के भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय का लेख मीडिया में आया है। वह इस बात का प्रमाण है की वे किस तरह से बंगाली अस्मिता का दोहन करना चाहते हैं। उन्होने पश्चिम बंगाल में 34 साल राज करने वाले वामपंथी दल तथा दस साल राज करने वाली ममता बैनर्जी पर गंभीर आरोप लगाते हुए वहां की संस्कृति को नष्ट कर वहां पर गुंडागर्दी, रक्तरंजित राजनीति, अपहरण, लूटपाट, हफ्ता वसूली जैसे आरोप लगाए हैं। पश्चिम बंगाल की मौजूदा दुर्दशा सुधारने के लिए उन्हें नरेंन्द्र मोदी अवतारी पुरूष दिखाई देते हैं, जो रवींद्रनाथ टैगोर की कविता के मर्म को समझाते हैं, जिसका स्वामी विवेकानंद के प्रति आदर है। उन्हे अपनी पार्टी यानी जनसंघ के पितृपुरूष श्यामप्रसाद मुखर्जी की भी इसी बंगाल के थे, यह भी याद दिलाया है। उनके अनुसार मोदी जी के आदर्श रहे अटल बिहारी बाजपेयी की कविता में बंगाल प्रेम झलकता था। ऐसे बंगाल को बचाने और बंगाल को देश की सांस्कृतिक, साहित्यिक राजधानी बनाने वे भी मोदी जी के साथ कृत संकल्पित दिखाई देते हैं।

जो बंगाल के बारे में जानते हैं उन्हे पता है की बंगाल विभाजन के भारत में सूत्रधार लॉर्ड कर्जन थे। रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी एक कविता में लॉर्ड कजऱ्न को एक बड़े खलनायक के रूप में चित्रित करते हुए उसे दुर्जन कजऱ्न  कहा है। दरअसल बांग्ला संस्कृति एक साझेपन का नाम है और लोकमानस में धर्म-आधारित प्रशासनिक विभाजन की कुटिल औपनिवेशिक चाल को एक असांस्कृतिक कार्रवाई माना गया।
लेकिन दुर्भाग्यवश 1947 में देश-विभाजन के चलते अखण्ड बंगाल सांप्रदायिक आधार पर ही दो भूखंडों में बाँट दिया गया। नोआखाली के दंगों और महात्मा गांधी के शांति उपवास को कौन भूल सकता है। राजनीतिक आधार पर विभाजित बंगाल के पश्चिमी हिस्से में आज 27 प्रतिशत मुसलमान हैं। ज़ाहिर है, चुनावी राजनीति के लिहाज से आज के भारत में उनकी हैसियत सिफऱ् वोट बैंक की है। विडम्बना है कि डायरेक्ट एक्शन डे जैसे ज़हरीले वातावरण को अपवाद के रूप में याद करते हुए बंगाल के साम्प्रदायिक सद्भाव की परंपरा पर ज़ोर दे रहे कैलाश विजयवर्गीय और उनकी पार्टी को चुनावी लाभ के लिये वैसा ही ज़हरीला वातावरण निर्मित करने में कोई संकोच नहीं है।

इस चुनावी दौर में बंगाल को जैसे 1946 के दौर में पहुँचाने का अभियान चलाया जा रहा है। सच पूछा जाए तो यह बंगाल के सांप्रदायिक आधार पर पुन: विभाजित करने का एक कुचक्र है जिसमें बंगाली भद्रलोक को उसके हिन्दू होने की याद दिलायी जा रही है। स्वामी विवेकानंद और रवींद्रनाथ टैगोर  को बांग्ला भद्रलोक का प्रतीक मानकर उनके प्रति लगाव प्रदर्शित कर भाजपा शिक्षित, मध्यवर्ग को लुभाने की कोशिश कर रही है। लेकिन वह रामकृष्ण परमहंस की परंपरा को भूल गयी, जिन्होंने ईश्वर की प्राप्ति के लिए इस्लाम और ईसाइयत की पद्धति का भी प्रयोग किया था। उनके शिष्य स्वामी विवेकानंद की शिक्षा पर अमल करते तो मुसलमानों के खिलाफ ज़हर पैदा करने से बाज़ आए। रवींद्रनाथ के राष्ट्रीयता बोध पर अमल करने से तो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का शीराज़ा ही बिखर जाएगा। ज़ाहिर है, भाजपा का बंगाल प्रेम महज़ दिखावा है। कहने की ज़रूरत नहीं है कि यह चुनावी राजनीति से प्रेरित है।

भाजपा का बंगाल के हिन्दू-मुस्लिम विभाजन का यह प्रयोग चुनावी मैदान में सफल हो जाएगा तो कहना होगा कि 1905 में लार्ड कजऱ्न को जो कामयाबी हासिल नहीं हो सकी थी, उसे पाने में 2021 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा सफल होगी। यह बंगाल का भौगोलिक विभाजन भले न हो, लेकिन इस बार विभाजन रेखा बंगाल के हृदय के भीतर से गुजऱेगी। तब बंगाल नवजागरण की विरासत नष्ट हो चुकी होगी और स्वामी विवेकानंद या रवींद्रनाथ टैगोर के विचार अर्थहीन हो चुके होंगे।

भाजपा के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय आज नरेन्द्र मोदी को रवींद्रनाथ टैगोर की कविता के मर्म समझने वाला बता रहें हैं तो उन्हें यह भी मालूम होना चाहिए की मानवतावादी फ्रांस के महान लेखक रोम्यॉं रोला से रवींद्रनाथ टैगोर के मित्रवत संबंध थे। दोनों के विचारों में बहुत समानता थी। एक बार इटली के डिक्टेटर मुसोलिन के आमंत्रण पर रवींद्रनाथ टैगोर ने इटली जाकर उनकी तारीफ कर दी इससे रोम्यॉं रोला नाराज हुए उन्होंने रवींद्रनाथ टैगोर को बताया कि मुसोलिन मानव विरोधी निरंकुश तानाशाह है। आपने उसकी जो तारीफ की है, उसका खंडन कीजिए। रवींद्रनाथ टैगोर की मुसोलिन की तारीफ का खंडन करना पड़ा। आज भले ही कुछ भक्त मंडली और कुछ लोग इस झांसे में आ जाएं की बंगाल की अस्मिता, वहां के सांस्कृति बौद्ध की रक्षा की बात करके जो लोग वहां के लोगों को बरगलाना चाहते हैं, यह लंबे समय तक नहीं चलेगा। उन्हें भी कोई रोम्यॉं रोला मिलकर मुसोलिन, हिटलर और उन जैसी विचारधारा को घोषित करने वालों की सच्चाई जरूर बता ही देगा।
प्रसंववश श्रीकांत वर्मा की कविता "हस्तिनापुर का रिवाज"
मैं फिर कहता हूं धर्म नहीं रहेगा, तो कुछ नहीं रहेगा,
मगर मेरी कोई नहीं सुनता। हस्तिनापुर में सुनने का रिवाज नहीं।।
जो सुनते हैं बहरे हैं या अनसुनी करने के लिए नियुक्त किये गये हैं
मैं फिर कहता हूं धर्म नहीं रहेगा, तो कुछ नहीं रहेगा
मगर मेरी कोई नहीं सुनता
तब सुनो या मत सुनो हस्तिनापुर के निवासियों! होशियार! हस्तिनापुर में
तुम्हारा एक शत्रु पल रहा है, विचार और याद रखो आजकल महामारी की तरफ फैल जाता है, विचार।