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वैलेंटाइन डे पर विशेष: प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- प्रेम के विरोध का समय

वैलेंटाइन डे पर विशेष: प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- प्रेम के विरोध का समय


यह समय बाजार समय है यह समय छलकपट, दुव्र्यसन, लोलुपता, घनघोर सांप्रदायिकता, संकीर्णताओं, धार्मिक सामाजिक और सांस्कृतिक हठ और कट्टरता और एकांगी सोच का समय है। ऐसे समय में प्रेम के बारे में सोचना या प्रेम की बात करना बहुत बड़े साहस की बात है। क्योंकि यह समय प्रेम के विरोध का समय है। एक तरफ बाजार है जो वैलेंटाइन डे के बहाने आर्थिक लाभ के रास्ते खोज रहा है बल्कि खोज लिए हैं। अकेले वैलेंटाइन डे पर पांच हजार करोड़ रुपए से ज्यादा के वैलेंटाइन कार्ड बांटे जाते हैं वह भी सिर्फ भारत में। इसके अलावा दूसरे उपहारों की कीमत मिलाकर देखें तो बात बहुत आगे तक जाती है। इसमें सरकार का मुनाफा भी है, सरकार को टैक्स से करोड़ों रुपए मिलते हैं इसलिए वह बाजार की खिलाफत नहीं करती है। बाजार चाहता है कि लोगों में खरीददारी की आदत बनी रहे और बढ़ती जाए। वह व्यक्ति को एक उपभोक्ता में बदल देना चाहती है बल्कि बदल दिया है। उनके लिए युवा एक उपभोक्ता से ज्यादा नहीं है। वह भारतीय युवाओं में खरीदारी की लत देखना चाहता है। बाजार को किसी भी धर्म-संप्रदाय जाति के संस्कारों से लेना-देना नहीं है उसे सिर्फ और सिर्फ मुनाफा चाहिए। प्रसिद्ध आलोचक सुधीश पचौरी की बात कहें तो लेट कैपिटलिज्म हमें याद दिला रहा है कि भाई कोई भी आनंद सुख अपने आप में शुद्ध, प्रबुद्ध पवित्र और अर्थ व बाजार निरपेक्ष नहीं होता। हर आनंद के क्षण का अपना अर्थशास्त्र है जो बाजार से आता जाता है। बाजार निरपेक्ष या बाजार मुक्त सुख की कल्पना सिर्फ पाखंडी साधु महात्मा करते होंगे जो करते होंगे अन्यथा वहां भी लक्ष्मी की पूजा होती ही है। इंडियन और विश्व पूंजी के तेज प्रसार तथा बाजार के बाजारवाद भूमंडलीकरण के नारे तथा उदारवादी अर्थव्यवस्था के नारों ने जीवन को बहुत विखंडित करना शुरू कर दिया है और इस सबसे हमारे समाज के बहुत सी पूंजीवादी व्यवस्थाओं को न केवल बल मिला है बल्कि उन्होंने कब्जा करने के लिए नए-नए क्षेत्र खोजना शुरू कर दिए हैं और नए इलाकों में उनकी पैठ शुरू हो गई है। जिस तरह से शासकीय परिसंपत्तियां विक्रय के लिए उपलब्ध हो रही है। यह अंतरराष्ट्रीय बाजारीकरण का देसी रूप है। दिलचस्प बात तो यह है कि विकास और आधुनिकता की बात करने वाली सरकार और उससे जुड़े संगठनों का प्रेम जैसे सनातन पद पर आधुनिकता के तलछट में पहुंच जाती है और घनघोर विरोधी रूप अपना लेती है। वैलेंटाइन डे पर उसका विरोध करना संस्कृति के हिमायतियों का सनातन धर्मियों का वार्षिक आयोजन का एक हिस्सा हो गया है, ऐसा हिस्सा जो एक उग्र रस्म अदायगी पर पहुंच चुका है। इस दिवस के पश्चात फिर सब कुछ शांत हो जाता है फिर उसके बाद चाहे अपहरण हो, लड़कियां घर से भागे, बलात्कार हो या धर्मांतरण हो फिर उस तरह का उग्र तेवर देखने को नहीं मिलता है। फिर सब कुछ आंदोलन जीवियों  के ऊपर छोड़ दिया जाता है संस्कृति की और संस्कार की सालाना फिक्र करने के बाद तलवारें म्यान में चली जाती है फिर किसी को तकलीफ में देखकर न किसी को गुस्सा आता है और ना किसी का मन पसीजता है जो कुछ कार्यवाही होती भी है वह बहुत औपचारिक और लगभग दिखावे की होती है। हाल ही में छत्तीसगढ़ के महासमुंद में सरेआम एक लड़के ने देसी कट्टे से एकतरफा प्यार में लड़की को मार दिया जिसमें उसके दो साथियों ने सहयोग किया। वहीं दूसरी ओर बस्तर के टिकरा लोहंगा गांव में रहने वाले चंद्रू मौर्य ने दो लड़कियों से एक साथ विवाह मंडप में शादी की, जो सोशल मीडिया पर बहुत वायरल हुई। लोगों को प्रेम का यह नया विस्तार शायद पसंद आया। यही वजह है कि गांव के लोगों ने न केवल इसमें बढ़-चढ़कर भाग लिया बल्कि अपनी ओर से भेंट पूजा भी दी।

ऐसी घटनाओं को लेकर कोई बवाल नहीं होता। ऐसी घटनाएं पूरे देश में आये दिन घटते रहती हैं और सब क्राईम पेट्रोल जैसे टीवी सीरियल में उसे मजे से देखते रहते हैं।

प्रेम जीवन का सबसे कोमल पद है। कृष्ण कथा तो पूरी प्रेममय है। अचरज की बात है कि कृष्ण को और उनकी प्रेम लीलाओं को तो हम धर्म का हिस्सा मानकर स्वीकार करते हैं और उसे ईश्वर की लीला मानते हैं लेकिन ईश्वर पुत्र को प्रेम के अधिकार से वंचित रखना चाहते हैं। प्रेम ना तो दरोगा की लाठी तले और ना ही किसी गुंडे की चाकू की धार तले किया जा सकता है अर्थात यह न तो जबरदस्ती किया जा सकता है ना उसके लिए किसी के पैर पड़े जा सकते हैं। प्रेम एक क्षण का निर्णय होता है बस हो जाता है। यही एक ऐसा निर्णय होता है जहां किसी से सलाह मशविरा लेने की मियाद मिलती है और ना कोई सोचने-समझने के लिए अवसर मिलता है और यही प्रेम सबसे सफल और सबसे पवित्र प्रेम होता है। पवित्रता को संदेह से देखना हम भारतीयों की फितरत में शामिल है। जहां पवित्रता नष्ट हो जाती है वहां प्रेम होता ही नहीं है इसलिए एक पवित्र प्रेम का आदर हर किसी के मन में होना चाहिए। लोग उसे सावन या अंधा समझते हैं जिसे सब हरा ही हरा सूझता है।

लोकतंत्र में जहां हर बात के लिए स्वतंत्रता है प्रेम के लिए इतना निषेध और पाबंदियां क्यों हैं यह अचरज की बात है सिर्फ प्रेम करने से भारतीय संस्कृति को खतरा हो जाता है। ऐसा सोचने और मानने वाले लोग जानते नहीं हैं कि भारतीय संस्कृति की ताकत क्या है। भारतीय संस्कृति में प्रेम सर्वोच्च और सर्वोपरि पद है। यदि हम भारतीय संस्कृति में मनुष्यता की बात करते हैं तो उसमें प्रेम और संवेदना के पद सबसे पहले आएंगे। प्रेम मनुष्य को एक बेहतर मनुष्य बनाने में मददगार साबित होता है लेकिन उसका प्रेम कितना निश्छल और पवित्र है इस पर निर्भर करता है। प्रेम की माप देह के वजन से नहीं, देह की लंबाई से नहीं बल्कि आत्मा के ताप से की जाती है और एक पवित्र मन ही आत्मा के ताप की माप कर सकता है। प्रेम के लिए एक जीवन की लंबाई कम पड़ सकती है और एक क्षण में एक क्षण का प्रेम जीवन भर के सुख के बराबर हो जाता है। प्रेमियों को न तो शत्रु की तरह देखा जाना चाहिए और ना वोटर की तरह। प्रेमी आदमी को राजनीति के कोट से गुलाब का फूल निकालकर हाथ में लेना पड़ता है। लाठी हिफाजत के लिए होती है आक्रमण के लिए नहीं। फूल दुनिया की सबसे कोमल वनस्पति है , प्रकृति और मनुष्य के कोमल अनुबंध पर ही प्रकृति और जीव का विकास संभव है। यह कम अचरज की बात नहीं है कि साम्यवादियों ने भी साहित्य में प्रेम के प्रति नकार का भाव रखा है। साहित्य में प्रेम की उपस्थिति को साम्यवादियों ने उपेक्षा की नजरों से देखा और कमाल की बात यह है कि अधिकांश साम्यवादियों ने प्रेम विवाह किए हैं लेकिन प्रेम के प्रति उनके मन में जो भावना है वह ठीक उसी तरह है जो हिंदू वादियों के मन में प्रेम दिवस को लेकर घृणा है और उस पर खास बात यह है कि दोनों मनुष्यता की बात करते हैं लेकिन यह भूल जाते हैं कि मनुष्य प्रेम के बगैर अधूरा है। मनुष्यता और प्रेम के अंतर्संबंध सबसे कोमल और सबसे बड़े हैं यदि कम्युनिस्टों की आंख में क्रांति की कंजेक्टिवाइटिस होकर लालिमा है तो हिंदूवादियों की आंख में रूढिय़ों का मोतियाबिंद है। निम्नवर्गीय और निम्न मध्यमवर्गीय मुस्लिम समाज में युवा पुरुष खुद तो प्रेम के लिए तत्पर रहते हैं लेकिन स्त्रियों के लिए हजारों पाबंदिया हैं जबकि प्रेम की पवित्रता की बात मनुष्य मात्र पर लागू है। प्रेम को लेकर अपवित्रताबोध इस कदर बढ़ गया है कि और इस कदर फैल गया है कि कोई भी धर्म इससे अछूता नहीं रहा और एक किस्म का भय प्रेम को लेकर गुस्से में बदलता चला गया है।  

प्रेम को लेकर अब तो हालात और बदल गए हैं। खास करके इस उत्तर आधुनिक समय में जब लिव-इन-रिलेशनशिप की बात भी सर्वस्वीकृत होती जा रही है और न्यायपालिका ने भी इसे मान्यता दे दी है। प्रेम अब सिर्फ गूंगे का गुड़ नहीं रह गया है बल्कि इसके अर्थ और ज्यादा बढ़ गए हैं, फैल गए हैं। यदि व्यक्ति बाजार को स्वीकार कर रहा है तो पुराने जमाने की फिल्मों में जब दो फूल आपस में टकराकर प्रेमियों के प्रेम की स्वीकृति प्रदर्शित कर दी जाती थी अब वेबसीरीज में वही प्रेम की स्वीकृति बिस्तर पर आ गई है, इसे किस हद तक स्वीकार किया जाएगा और किया जा रहा है यह एक नई बहस का विषय है।

प्रेम दिवस पर मेरे प्रिय कवि केदारनाथ सिंह की कविता-
उसका हाथ
अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा
दुनिया को
हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए