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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - बेहतर कोचिंग इंस्ट्टीयूट राज्यों की भूमिका निरंक

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  - बेहतर कोचिंग इंस्ट्टीयूट राज्यों की भूमिका निरंक

-सुभाष मिश्र

देश में कोरोना महामारी के चलते 24 मार्च 2020 से हुए देशव्यापी लॉगडाउन के चलते आवागमन के साधन बंद कर दिये गये थे। स्कूल, कालेज, कोचिंग इस्टीट्यूट सहित सभी तरह की शिक्षण संस्थान बंद कर दी गयी। इस तालाबंदी का सर्वाधिक असर पढा़ लिखाई पर पड़ा। करियर के लिए बने शिक्षा के नये केन्द्र कोटा, दिल्ली, पूना, बैंगलोर, हैदराबाद, विशाखापटनम जैसी जगह पर देश भर से आकर यहॉं रहकर कोचिंग करने वाले, पढऩे वाले छात्र-छात्रा को जैसे तैसे अलग-अलग माध्यमों से घर भेजा गया। यहां रह रहे बच्चों के माता-पिता ने बच्चों की सुरक्षा और वापसी को लेकर तूफान उठा रखा था। यहां से अलग-अलग राज्यों को बच्चों को लाने को लेकर भी बहुत राजनीति हुई। अब जब कोरोना संक्रमण का प्रभाव कम हो रहा है एक बार फिर बहुत से अभिभावक अपने बच्चों को कोचिंग के नाम पर यहां भेजने के लिए उतारू हैं।

अकेले छत्तीसगढ़ के 2200 छात्रों को कोटा राजस्थान से छत्तीसगढ़ सुरक्षित पहुंचाया गया और उन्होंने 15 दिन क्वांरटाइन किया गया। बाकी राज्यों की छात्र-छात्राओं की संख्या इससे भी कहीं बहुत अधिक थी। कोटा में करीब डेढ़ लाख बच्चे बाहर से कोचिंग के लिए हर साल जाते हैं। कोटा कोविड-19 का हाट स्पाट बना हुआ था और वहां फंसे बच्चों के मां-बाप हाय-तौबा मचाते रहे। अब वही मां-बाप फिर से अपने बच्चों के कथित करियर की खातिर बच्चों को कोटा, दिल्ली भेजने आमदा है। कोरोना संक्रमण काल में अधिकांश राज्यों में कथित रूप से फंसे बच्चों को लाने में जो तत्परता दिखाई वह तत्परता जहां के तहां धरी रह गई। सवा साल से ज्यादा बीत गया राज्यों ने अपने यहां एक भी ऐसा कोचिंग संस्थान तैयार नहीं किया जो बच्चों और अभिभावकों को आश्वस्त कर सके कि यहां कोचिंग करके उनके बच्चे कोटा, दिल्ली की तरह ही अच्छे कॉलेज में या यूपीएससी में चयनित हो सकते हैं।

बहुत से अभिभावको को लगता है की उनके बच्चे कोटा, दिल्ली, पूना, बैंगलोर जाकर वहां कोचिंग करके ही प्रतियोगी परीक्षा में टॉप करके सिलेक्ट हो सकते हैं। एज्युकेशन का नया केन्द्र कोटा में संचालित कोचिंग संस्थानो में लोग अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजिनियर बनाने भेजते हैं उसी तरह दिल्ली में लोग यूपीएससी की तैयारी के लिए दो-तीन साल रहते हैं। हमारे देशों के उच्च शिक्षण संस्थानों में एडमिशन के लिए कोटा में और यूपीएससी के जरिए भारतीय सेवा में जाने के उत्सुक लाखों लोगो का जमावड़ा दिल्ली में रहता हैं। इसके अलावा अच्छे संस्थानों में पढऩे के लिए बैंगलौर, हैदराबाद, पूना और विशाखापटनम में लोग बड़ी संख्या में रहते हैं। अब जब तक पूरे देश में कोरोना की वैक्सीन नहीं लग जाती तब तक स्कूल-कॉलेज और कोचिंग संस्थानो को खोला जाना आत्मघाती कदम साबित होगा। हमारे देश में आन लाईन पढ़ाई का ढिंढोरा पिटने वालों ने पिछले एक-डेढ साल में ऐसी कोई मजबूत अधोसंरचना विकसित नहीं की जो कोचिंग इंस्टीट्यूट का विकल्प बन सके। स्कूल, कॉलेज में कहने को बहुत जगहो पर आन लाईन पढ़ाई की जा रही है किन्तु कहीं भी किसी भी स्तर पर यह नहीं सोचा गया की कोचिंग इंस्टीट्यूट का कोई विकल्प तैयार किया जाए। जिस तरह निचली बस्तियों, डूबान क्षेत्र में रहने वालों के लिए सुरक्षित रहने का कोई इंतजाम नहीं करके हर साल बाढ़ आने पर जैसे थोड़े समय के लिए उनका पुनर्वास स्कूल-कालेज, धर्मशाला भवन में होता है उसी तरह कोरोना संक्रमण में यह व्यवस्था है। अब कोरोना का प्रभाव कम हो रहा है तो फिर से लोग कोटा, पूना, दिल्ली जाने की तैयारी में हैं। बहुत से शिक्षण संस्थानो में टीचर्स को भी बुलाकर बिना मतलब बिठाकर गैर शैक्षणिक कार्य कराये जा रहे हैं।

एक तरफ़ रोजग़ार और जीविका के अवसर सिमट रहे हैं, और इस क्षेत्र में लगातार गिरावट हो रही है। इसके चलते शिक्षा और रोजग़ार में प्रतिस्पर्धा निरंतर बढ़ रही है। ऐसी विकट स्पद्र्धा में सफलता की मंजि़ल तक पहुंचने के लिये मध्यवर्ग सारी ऊर्जा झोंक दे रहा है। कोचिंग उद्योग के फलने-फूलने का यही राज़ है। वे सफलता का भरोसा बेचते हैं। अपनी महत्त्वाकांक्षा तले दबा मध्यवर्ग का उन पर अटूट भरोसा होता है। तभी तो गाढ़ी कमाई की एक बड़ी रकम खर्च कर वह कोचिंग संस्थानों से सफलता का भरोसा खऱीदने को तैयार होता है। कहने की ज़रूरत नहीं कि परीक्षा में नाकाम होने पर थोड़े से सफल छात्रों के पालकों को छोड़कर यही मध्यवर्ग ठगा-सा महसूस करता है। दरअसल ठगा जाना उसकी नियति है। ज़ाहिर है, ठगी का एक संगठित कारोबार पिछले तीन दशकों में हमारे देश में उठ खड़ा हुआ है।

कोचिंग उद्योग का उभार हमारे शिक्षा तंत्र की विफलता और मानव संसाधन के नियोजन में सरकारों की लापरवाही, दोनों की तरफ  संकेत करता है। शिक्षा और रोजग़ार के बीच क्या रिश्ता होना चाहिये, इस पर कभी विचार नहीं हुआ। उल्टे राजनीतिक कारणों से और अनियोजित ढंग से सरकार ने उच्चशिक्षा के  संस्थान खोले और साथ ही उसका बाज़ार भी खोल दिया। विद्यार्थियों की अभिरुचि और उनकी क्षमता की मैपिंग कर उसके अनुरूप रोजग़ार सृजन की कारगर रणनीति बनाने की बजाए सरकार ने प्रतिस्पर्धा की ज़मीन को पुख्ता किया और इस भेड़चाल में मध्यवर्ग खुशी-खुशी शामिल हो गया।

महामारी ने सरकार की अदूरदर्शिता और मध्यवर्ग के अंधकृत्य दोनों का पर्दाफाश कर दिया है। पिछले महामारी का प्रकोप बढऩे पर जिन सरकारों ने अपने राज्यों से कोटा गये विद्यार्थियों की वापसी का प्रबंध कर वाहवाही बटोरी, अगर महामारी की दूसरी लहर में उन्होंने स्थानीय स्तर पर कोचिंग की पुख्ता व्यवस्था करने के बारे में विचार करने की ज़रूरत ही नहीं महसूस की तो इसमें अचरज नहीं होना चाहिए। बल्कि उनसे ऐसी अपेक्षा करने की बजाए कोचिंग की ज़रूरत को ही खत्म करने के उपाय करने के लिए दबाव बनना चाहिए। इसके लिए शिक्षा नियोजन और रोजग़ार नियोजन की समन्वित नीति बनाए जाने की आवश्यकता होगी। देश की विशाल आबादी की दृष्टि से यह काम कठिन ज़रूर है, मगर ठोस नज़रिया और संकल्प हो तो नामुमकिन भी नहीं है। दुर्भाग्य से कोई भी सरकार आज इसके लिये तैयार दिखाई नहीं देती। सब-कुछ बाजार के हवाले कर वे निश्चिंत हैं। यूनेस्को की रिपोर्ट का अनुमान है कि वैश्विक स्तर पर दुनिया भर में वर्तमान में 186 देशों में 1.2 बिलियन से अधिक बच्चे महामारी के कारण स्कूल बंद होने से प्रभावित हुए हैं। जिनमें यूनेस्को का अनुमान है कि भारत में करीब 32 करोड़ छात्र इनमें से बहुत से छात्र आन लाईन पढ़ाई कर रहे हैं। इस विश्वव्यापी वैश्विक स्वास्थ्य संकट के बाद अधिकांश नवाचार डिजिटलीकरण के इर्द-गिर्द घूम रहे हैं।

देश के कई राज्यों में काम होते कोरोना के प्रकरणों को देखते हुए महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने कहा की जिन गाँव में कोरोना के केसे कम है वह दसवीं और बारहवी की कक्षाए शुरू कर सकते है। तो वहीं जंहा कोरोना की दूसरी लहर  पर काबू पाया गया है, तो दूसरी तरफ  कोरोना का नया डेल्टा वैरिएंट सामने आया है और वैज्ञानिको के अनुसार तीसरी लहर इसी के आ सकती है। यदि हमे अपनी भावी पीढ़ी को कोरोना संक्रमण से बचाना है तो इसके लिए हमे जिस तरह 18+ का वैक्सीनेशन किया जा रहा है उसी तरह से 10+ के बच्चो का भी टीकाकरण शुरू करना चाहिए। यूएस में 70 फीसदी से अधिक जनसंख्या को वैक्सीन लग चुकी है और अमेरिकी प्रेसीडेंट जो बिडेन ने एलान कर दिया है की मास्क पहनने की अब अमेरिका में जरुरत नहीं। आप सभी अपनी जि़न्दगी प्री कोरोना पीरियड में जैसे जीते थे वैसे जी सकते है। पर हमारे यहाँ उस स्तर पर वैक्सीनेशन हो जाए तभी हमे शिक्षण संस्थाए, कोचिंग सेंटर खोलने के बारे में सोचना चाहिए। इस समय देश के ख्यातिनाम कोचिंग सेंटर सहित बाकि सभी नियमित कोचिंग उद्योग बाधित किया है और अधिकांश छात्र अपने घर पर पढ़ रहे हैं। यह भारतीय शिक्षा क्षेत्र के लिए एक और गेम-चेंजर होना चाहिए, जहां कोचिंग पर निर्भरता को कम किया जा सके। सरकारों ने इस ओर कोई ध्यान नही दिया। स्कूल शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, रोजगार नियोजन जैसे विभाग सब कोंचिंग संस्थानो के विकल्प को लेकर चुप्पी साधे हुए हैं।
प्रसंगवश हैदर अली आतिश का यह शेर
बड़ा शोर सुनते थे पहलू में दिल का
जो चीरा तो इक क़तरा-ए-ख़ूँ न निकला।।