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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - ये सभ्यता के संकट का समय है

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -  ये सभ्यता के संकट का समय है

-  सुभाष मिश्र
जो देश अपनी प्रकृति, हवा, प्राकृतिक खुलेपन और अपनी वसुधैव कुटुम्बकम  की परंपरा के लिए जाना जाता था, आज उस देश को विदेशों से हवा यानी आक्सीजन आयात करनी पड़ रही है। उस देश में लोग आक्सीजन सिलेंडर की लूट कर रहे हैं, अस्पतालों में घंटों आक्सीजन की कमी के कारण दम तोड़ रहे है। कोरोना संक्रमण से जब दुनिया के बाकी देश उभर रहे हैं, हम उसमें धंसते जा रहे हैं। अमेरिका, यूरोप, रूस आदि से यह खबर नहीं आ रही है कि वहां आक्सीजन, रेमेडसिविर जैसी जीवन रक्षक दवाईयों की कालाबाजारी हो रही है। हमारे देश में इस समय जिस तरह की बेमानी, लूट, भ्रष्टाचार, अमानवीय दृश्य दिखाई दे रहे हैं, वैसे दृश्य दूसरे देशों में दिखलाई सुनाई नहीं देते।

यह सभ्यता के संकट का समय है। कोरोना समय ने मनुष्य के घमंड को चकनाचूर कर दिया है। आजादी के बाद जिस तरह लोगों के बीच पैसे और पावर को लेकर एक तरह का घमंड आ गया था, कोरोना वायरस ने बता दिया है कि तुम इससे अछूते नहीं हो। हमारी कथित परंपरा, संस्कार और धार्मिक आस्थाओं को भी कोरोना से उपजी स्थितियों ने कमजोर किया है। लाकडाउन ने लोगों को बता दिया है कि आप चाहे कितने ही अमीर क्यों ना हो आपका पैसा, पावर काम नहीं आयेगा। कोरोना ने मनुष्य के कथित घमंड, अभिमान को बुलडोजर से रौंद कर अपनी चपेट में लेकर बता दिया है कि वह न अमीर देखता है, ना गरीब, ना वो भाजपा देखता है, ना कांग्रेस, ना अमित शाह देखता है, ना राहुल गांधी, ना वह किसी तरह जातिभेद भाव नहीं करता है। सबको बराबरी से अपनी चपेट में लेता है। जो भी उसकी चपेट में आयेगा उसे उसकी इम्युनिटी ,बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और जरूरी ऐतिहायत ही बचा सकते हैं।

सलीम जावेद द्वारा लिखी अमिताभ बच्चन और शशि कपूर अभिनीत एक फिल्म दीवार का बहुचर्चित डायलॉग है -
मेरे पास बिल्डिंग है, प्रापर्टी है, बैंक बैलेंस है, बंगला है, गाड़ी है, तुम्हारे पास क्या है?
दूसरा भाई कहता है -मेरे पास मॉ है ।
कोरोना समय में ये भाई कहेगा-मेरे पास अस्पताल में बेड है, आक्सीजन सिलेण्डर है, वेंटीलेटर है, रेमडेसिविर का इजेक्शन है, कोरोना वैक्सीन के दोनो डोज हैं ,तुम्हारे पास क्या है?
अपना बंगला गाड़ी पैसा अपने पास रख, ये कोई काम नहीं आयेगा।

सभ्यता के विकासक्रम में जब समाज ने दिखावट पसंद संस्कृति की ओर रूख किया तो सबसे पहले हमारी प्रकृति, हमारी वन संपदा, हमारी जीवन पद्धति प्रभावित हुई। हमारा आर्किटेक्चर जो दुनिया में सबसे मशहूर था, हमने उसके साथ छेड़छा कर लुक के चक्कर में बड़ी-बड़ी बिल्डिंगों, अस्पतालों, मॉल, तक की सरकारी दफ्तरों में भी कांच लगाना शुरू कर दिया था। हमारा सामाजिक जीवन जिसका प्रदर्शन सिनेमा के माध्यम से भी होता है, उसका गीत है रंगमहल के दस दरवाजे न जाने कौन सी खिड़की खुली की, सैयां निसट गये मैना लड़ी थी।

अब हमने सारी खिड़कियां बंद कर ली है। हमारी दिमाग की, सोच की, विवेक की सारी खिड़कियां बंद करके हम शीशे के घरों में बैठकरर अपने आपको सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। ऐसे शीशों के महल में जब आग लगती है तब हमे पता चलता है की दम कैसे घुटता है। हमारे पास खिड़कियों के कांच तोड़कर भागने का भी समय नहीं रहता। रायपुर के एक सुपर स्पेशिलिटी हास्पिटल में आग लगी और कोरोना से बचने के लिए भर्ती पांच लोग जलकर मर गये। यह बिल्डिंग अपने लुक के कारण कांच की बड़ी-बड़ी दीवारों से बनी थी। पुलिस की जांच रिपोर्ट कुछ भी कहे लेकिन ये भी सच है की बहुत कुछ हाथ बिल्डिंग के लुक का भी है।

नये तरह के आर्किटेक्चर में बिल्डिंग के एलिवेशन पर बहुत जोर होता है, जहां दीवारों की जगह बड़े-बड़े कांच लगाए जाते हैं ताकि बिल्डिंग का लुक अच्छा लगे। हमने अपनी समृद्ध आर्किटेक्चर परंपरा को छोड़कर यूरोपीय देशों की नकल की। जबकि हमारे और उसकी जीवन पद्धति, प्राकृतिक संरचना अलग अलग है। कोरोना संक्रमण के बाद दो गज की दूरी और आइसोलेशन की स्थिति को देखकर अब हर कमरे में अटैच लेटबाथ तथा घरों के बीच खुला आंगन, खुले-खुले कमरों के निर्माण की ओर लोगों का रूझान हुआ है। बहुत सारे व्यवसायिक और संपन्न परिवारों के लोग छोटी-छोटी संकरी गलियों के अपने पुश्तैनी मकानों को छोड़कर खुली कालोनी में शिफ्ट हुए हैं। कोरोना ने जीवन पद्धती को बदलने में अहम भूमिका निभाई है।
हमने जल्दी और ज्यादा उपज के चक्कर में फसलों के, पौधो के जेनेटिक बदले, रासायनिक खाद का उपयोग किया, अब हमारी जमीने बंजर हो रही है। रासायनिक खाद से उत्पन्न फसल हमारे लिए बहुत सी बीमारियों ला रही है, तब हम अब जैविक खाद की ओर देख रहे हैं। कोरोना संक्रमण के दौर में एक शब्द सबसे ज्यादा प्रचलित हुआ है वह है इंम्युनिटी। बार-बार कहा जा रहा है की जिसकी इम्युनिटी जितनी मजबूत होगी वही इस वायरस से बच पायेंगा। कोरोना वैक्सीन के जरिए हमारी इम्युनिटी मजबूत करने की कोशिशे जारी है। बाजार आज इम्युनिटी के नाम पर बहुत सी वो चीजें बेच रहे जो कभी हमारे खानपान में शमिल थी। हम प्राकृतिक रूप से अपने खान पान, जीवनचर्या से अपनी इम्युनिटी मजबूत करते रहे हैं वह कृत्रिमता के अभाव में धीरे-धीरे कमजोर हुई है।

कोरोना संक्रमण से उपजी स्थिति ने जहां एक ओर घर के महत्व को बताया है वहीं इस सच्चाई से भी दोचार किया है कि यदि आप कोरोना संक्रमित होकर मर रहे हैं, तो आपके क्रियाक्रम, कपालक्रिया और अंतिम श्रद्धांजलि के लिए भी कोई नहीं आयेगा। यदि आप पुत्र मोह में इस तरह का भ्रम पाले की आपकी कपाल क्रिया, अस्थियों का विसर्जन कर आपका पुत्र आपको मोक्ष दिलायेगा, तो आप मुगालते में है। अपने आसपास की सच्चाई, जलती चिताओं और दफनाते लोगों को देखकर समझ लीजिए की आपका भी तो कहीं ऐसी ही अंतिम यात्रा नहीं होगी।
दुनिया के सारे धर्मों में अंतिम संस्कार को सबसे बड़ा संस्कार माना गया है। हिन्दुओं में 13वीं तो मुस्लिमों में चालीसवां। हर धर्म के मानने वाली की यह अंतिम इच्छा रहती है कि उसका अंतिम संस्कार उसके धार्मिक रीति रिवाजों के अनुसार हो। कोरोना संक्रमण से उपजी स्थिति ने उसकी इस इच्छा को भी छिन लिया है।

दुष्यंत कुमार का एक शेर है -
जिएं तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले,
मरें तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिये।