कोरोना वायरस भारतीय राजनीति को किस-किस तरह से प्रभावित कर सकता है?

कोरोना वायरस भारतीय राजनीति को किस-किस तरह से प्रभावित कर सकता है?


हिमांशु शेखर

भारत में कोरोना वायरस का प्रकोप बढ़ता जा रहा है. केंद्र और राज्य सरकारें इससे निपटने के लिए युद्ध स्तर पर काम कर रही हैं. इसकी वजह से आर्थिक गतिविधियां ठप पड़ गई हैं. लोग अपने घरों में बंद हैं. माना जा रहा है कि अगले दो हफ्ते कोरोना वायरस के फैलने के लिहाज से बेहद अहम हैं. हर क्षेत्र पर इसके प्रभाव की चर्चा हो रही है. राजनीति पर भी. क्योंकि वह किसी न किसी रूप में हर क्षेत्र की गतिविधियों से जुड़ी हुई है. अगर दूसरे क्षेत्र प्रभावित होंगे तो वह भी होगी ही. लेकिन जितनी जल्दी कोरोना का प्रभाव स्वास्थ्य क्षेत्र और अर्थव्यवस्था पर दिख रहा है, उतनी जल्दी शायद राजनीति पर नहीं दिखेगा लेकिन देर-सबेर इसका असर उस पर भी पड़ना तय है.

भारत में पहले भी इस तरह की महामारी का असर राजनीति पर पड़ा है. 1918 में स्पैनिश फ्लू नाम की महामारी फैली थी. एक अनुमान के मुताबिक उस महामारी में भारत में 1.8 करोड़ लोगों की जान गई थी. यह उस वक्त की भारत की आबादी का छह प्रतिशत था. वाॅल स्ट्रीट जर्नल के एक लेख में कोरोना की तुलना उसी महामारी से की गई है. हालांकि, यह भी कहा गया है कि तब से लेकर अब तक दुनिया काफी बदली है उतना नुकसान संभवतः अब नहीं होगा. इसी लेख में 1918 की महामारी का भारतीय राजनीति पर पड़े असर का जिक्र भी किया गया है.

ब्रिटिश लेखिका लाॅरा स्पिनी ने 1918 की महामारी के दुनिया पर पड़ने वाले प्रभावों पर एक पुस्तक लिखी है - पेल राइडर: स्पैनिश फ्लू ऑफ 1918 एंड हाउ इट चेंज्ड द वर्ल्ड. वॉल स्ट्रीट जर्नल में लॉरा स्पिनी के हवाले से बताया गया है कि महामारी में हुए भारी नुकसान की वजह से भारत में लोगों का अंग्रेजी शासन से विश्वास उठ गया था. इसके बाद उन्होंने स्वतंत्रता के लिए चल रहे संघर्षों को अपना समर्थन बढ़ाना शुरू किया और तीन दशक बाद भारत को आजादी मिल गई. भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास को देखने पर भी यह पता चलता है कि आजादी से संबंधित बड़ी और निर्णायक गतिविधियां 1918 के बाद ही हुईं. 1917 में चंपारण सत्याग्रह से सक्रिय हुए महात्मा गांधी भी इसके बाद और सक्रिय होते चले गए और उनके साथ बड़े पैमाने पर लोग जुड़ते चले गए.

इस उदाहरण से यह स्पष्ट है कि इस तरह की महामारी और राजनीति को अलग करके नहीं देखा जा सकता है. ऐसे में यह समझना होगा कि कोरोना वायरस की वजह से भारत की राजनीति किस-किस तरह से प्रभावित हो सकती है.

मोदीः नायक या खलनायक?

2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से नरेंद्र मोदी ने कई चुनौतियों का सामना किया है. लेकिन बतौर प्रधानमंत्री कोरोना वायरस उनके लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनौती है. उनकी जगह कोई और प्रधानमंत्री होता तो उसके मामले में भी ऐसा ही होता. इसके पीछे कई वजहें हैं. पहली बात तो यह कि इसे भारत में आने से रोकने और भारत में इसका फैलाव रोकने के मोर्चे पर सीमित विकल्पों का होना. उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के दौर की अर्थव्यवस्था होने के नाते कोई भी देश बगैर पर्याप्त साक्ष्य के रातों-रात विदेशों से हो रही आवाजाही को नहीं रोक सकता. शुरुआत में कोई साक्ष्य नहीं थे तो विदेशों से लोग आ रहे थे लेकिन अब जबकि डब्ल्यूएचओ ने कोविड-19 को महामारी घोषित कर दिया है तो सरकार ने इस पर रोक लगा दी है.

फैलाव और इलाज के मामले में भी केंद्र सरकार के पास विकल्प सीमित हैं. कई दशकों से बीमार स्वास्थ्य क्षेत्र में रातों-रात ऐसी क्रांति नहीं लाई जा सकती कि कोरोना से निपटने के लिए पर्याप्त क्षमताएं विकसित हो जाएं. कोरोना होने के संदेह वाले लोगों की जांच तक की पर्याप्त व्यवस्था देश में नहीं है. गिनी-चुनी जगहों पर जांच हो रही है और उसके लिए भी लोगों को बहुत मशक्कत करनी पड़ रही है. इलाज के मामले भी विकल्प सीमित हैं. लेकिन इसके बावजूद अगर स्थिति खराब होती है तो इसके लिए आम लोग मोदी सरकार को ही जिम्मेदारी ठहराएंगे. बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली भी ऐसी रही है कि वे हर कामयाबी का श्रेय खुद लेते रहे हैं, इसलिए अगर इस मोर्चे पर सरकार नाकाम होती है तो जाहिर सी बात है कि जनता की नजर में उनके खलनायक बनने की बेहद प्रबल आशंकाएं हैं.

लेकिन एक दूसरा पक्ष यह भी है कि भारत अगर कोरोना से प्रभावी ढंग से निपटने में सफल रहा और यहां उसका फैलाव उतना अधिक नहीं हुआ तो नरेंद्र मोदी अभी से कहीं बड़े नायक बनकर उभरेंगे. नायक के तौर पर उनका यह उभार सिर्फ भारत में ही सीमित नहीं रहेगा बल्कि वैश्विक स्तर पर उनकी एक सकारात्मक छवि बनेगी.

चुनावों में स्वास्थ्य सुविधाओं को अहमियत

उदारीकरण के दौर में पूरी दुनिया की सरकारों ने जिन क्षेत्रों को सबसे अधिक निजी क्षेत्र के हवाले छोड़ा है, उनमें शिक्षा और स्वास्थ्य प्रमुख हैं. भारत में भी यही हुआ है. इस दौर में केंद्र में चाहे जिस पार्टी की भी सरकार बनी हो, सबने स्वास्थ्य को निजी क्षेत्र के हवाले छोड़ने की नीति को ही आगे बढ़ाया. राज्य सरकारों ने भी ऐसा ही किया. दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार को एक अपवाद माना जा सकता है. इससे देश में स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा पूरी तरह से चरमरा गया है. गांवों में जो सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र काम करते थे, उनमें से अधिकांश इस वक्त बहुत बुरी हालत में हैं. कुछ अस्पतालों को छोड़ दें तो अधिकांश शहरी सरकारी अस्पताल भी बुनियादी ढांचे के अभाव का सामना कर रहे हैं और यहां निजी अस्पतालों का दबदबा है.

जैसे-जैसे भारत में कोरोना का फैलाव हो रहा है, वैसे-वैसे भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र की कमजोरियां की वजह से इस संकट के और गहराते जाने की बात और स्पष्ट होती जा रही है. स्वास्थ्य क्षेत्र में जिस निजी क्षेत्र को बहुत बढ़ावा दिया गया, आज कोरोना से जंग में उन निजी अस्पतालों की भूमिका न के बराबर है. इसलिए अगर भारत में कोरोना का फैलाव खतरनाक स्तर पर होता है तो जाहिर है कि आने वाले दिनों में जो चुनाव होंगे, उनमें सभी पार्टियों से लोग यह उम्मीद करेंगे कि स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर वे एक स्पष्ट रणनीति सुझाएं. इसका मतलब यह हुआ कि स्वास्थ्य सुविधाएं आने वाले समय में एक चुनावी मुद्दा बन सकती हैं. ऐसी स्थिति में लोगों के स्वास्थ्य को निजी क्षेत्र के अस्पतालों और निजी इंश्योरेंस कंपनियों के हवाले छोड़ने की जो लोक नीति चल रही थी, उसमें स्वाभाविक तौर पर बदलाव होगा और स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकार की भूमिका बढ़ाने की ठोस कोशिशें दिख सकती हैं.

राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आर्थिक मुद्दे

कोरोना का कहर लोगों के स्वास्थ्य और स्वास्थ्य क्षेत्र के अलावा सबसे अधिक कहीं दिख रहा है तो वह अर्थव्यवस्था है. विनिर्माण और सेवा क्षेत्र पर इसका प्रभाव दिखने लगा है. इस वजह से बेरोजगारी का संकट और गहराना तय माना जा रहा है. शेयर बाजार में गिरावट और विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट दर्ज की जा रही है. कुछ क्षेत्रों में अभी मांग बढ़ी हुई जरूर दिख रही है लेकिन यह घबराहट में बढ़ी हुई मांग है. रोजमर्रा के इस्तेमाल वाली वस्तुओं की बढ़ी हुई मांग इसका प्रतीक है. लेकिन जो वस्तुएं और सेवाएं रोजमर्रा में इस्तेमाल नहीं की जाती हैं, उनकी मांग कम या न के बराबर हो गई है. एक तरफ मांग कम और दूसरी तरफ उत्पादन बंद, ऐसे में मांग और आपूर्ति का पूरा चक्र गड़बड़ होने की आशंका है.

इसका मतलब यह हुआ कि पहले से ही सुस्ती की शिकार भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए आने वाले दिन और कठिन हो सकते हैं. ऐसे में राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आर्थिक मुद्दों का आना स्वाभाविक है. आने वाले दिनों में राजनीतिक पार्टियों को जनता को यह भी बताना होगा कि अर्थव्यवस्था की हालत सुधारने के लिए वे क्या ठोस उपाय करने वाले हैं. बेरोजगारी का संकट और उसमें भी विनिर्माण के बाद अब सेवा क्षेत्र में बेरोजगारी का संकट गहराने से इसकी आंच निम्न वर्ग के बाद अब मध्य वर्ग तक पहुंचेगी. एक राजनीतिक वर्ग के तौर पर देखें तो हमारे देश में मध्य वर्ग ही सबसे मुखर वर्ग है. ऐसे में अगर उसे परेशान होगी तो जाहिर सी बात है कि बेरोजगारी और अर्थव्यवस्था का बुरा हाल प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनेगा.

सांप्रदायिक मुद्दों से परहेज संभव

कोरोना वायरस का प्रकोप बढ़ने और इससे होने वाला नुकसान बढ़ने की स्थिति में एक संभावना यह हो सकती है कि कुछ समय तक सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने वाले मुद्दों को राजनीतिक विमर्श में थोड़ा पीछे किया जाए. क्योंकि एक तरफ वे परिवार होंगे जो कोरोना से सीधे तौर पर प्रभावित होंगे और वहीं दूसरी तरफ वे परिवार होंगे जो इसकी वजह से अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों से बुरी तरह प्रभावित होंगे. इन लोगों के सामने अगर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण वाले मुद्दों को उठाया जाएगा तो इनमें और दूसरे लोगों में ऐसे मुद्दे उठाने वालों के खिलाफ गुस्सा बढ़ सकता है. इसलिए संभव है कि ऐसे मुद्दों की राजनीति करने वाली पार्टियां एक रणनीति के तहत कुछ समय के लिए उनसे बचने की कोशिश करें.

सहयोगात्मक संघवाद

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर सहयोगात्मक संघवाद की बात करते हैं. वे केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को मिलाकर ‘टीम इंडिया’ की बात कहते आए हैं. कोरोना वायरस से निपटने के मामले में यह सहयोगात्मक संघवाद दिख रहा है. केंद्र सरकार और राज्य सरकारें आपसी समन्वय के साथ इससे निपटने की कोशिश करती दिख रही हैं. अगर भारत में कोरोना का और फैलाव होता है और इससे होने वाला नुकसान काफी बढ़ता है तो उस स्थिति में कोरोना के फैलाव पर नियंत्रण पाने के बाद के दिनों में भारतीय राजनीति में सहयोगात्मक संघवाद दिख सकता है. क्योंकि जिस तरह के नुकसान दूसरे प्रभावित देशों में हुए हैं, अगर वैसा नुकसान भारत में होता है तो इससे निपटना न तो अकेले केंद्र सरकार के वश की बात होगी और न ही किसी राज्य सरकार के लिए यह संभव होगा कि वह अपने राज्य में स्थितियों को ठीक कर सके. ऐसे में केंद्र और राज्यों के सामने मिलकर काम करते हुए सहयोगात्मक संघवाद के रास्ते पर आगे बढ़ना एक मजबूरी होगी.