II केन्द्र और राज्य सरकारों के लिए पार्टी लाईन से हटकर सोचने का समय : प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की विशेष टिप्पणी

II केन्द्र और राज्य सरकारों के लिए पार्टी लाईन से हटकर सोचने का समय : प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की विशेष टिप्पणी
  • सुभाष मिश्र

कोरोना कालखंड से पहले CAA (नागरिकता संशोधन कानून) NRC (राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर)

NPR (राष्ट्रीय जनसँख्या रजिस्टर) के मुद्दे पर बहुत से राज्य जहां भाजपा का शासन नहीं था उन्होने अपने यहाँ NRC से मना कर दिया । पिछले सालों में हमने दिल्ली, पश्चिम बंगाल सहित बहुत सी राज्य सरकार को अलग-अलग मुद्दों पर लड़ते देखा। केन्द्र की जाँच एजेन्सी CBI और NIAके कार्य क्षैत्र राज्य सरकार की अनुमति को लेकर भी विवाद की स्थिति बनी। अब जब कोरोना का संक्रमण पूरी दुनिया में फैल रहा है, तब यह समस्या किसी एक देश, राज्य या ज़िले की नहीं रही। कोरोना वायरस के होने वाले संक्रमण को रोकने के लिए देश के प्रधानमंत्री ने अब तक तीन बार सीधे तौर से देश की जनता को संबोधित कर राष्ट्रव्यापी लॉग डाउन, प्रतिबंध की घोषणा की, जरूरी हिदायत और संदेश दिया।

प्रधानमंत्री ने कोरोना वायरस संक्रमण को लेकर सभी प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों से चर्चा की। लॉकडाउन के दूसरे दौर में 3 मई तक पूरे देश में एक साथ लाकडाउन की घोषणा के साथ प्रधानमंत्री ने 20 अप्रैल से कुछ क्षेत्रों में रियायत की घोषणा भी की है। साथ यह भी कहा कि वे इस बात की समीक्षा करेंगे कि राज्य सरकारें लागडाउन का कड़ाई से पालन करें और नये हॉट स्पाट ना बढ़ने पायें, यदि ऐसा नहीं किया गया तो दी गई छूट वापस ले ली जायेगी। प्रधानमंत्री के अलग-अलग राष्ट्रीय संबोधनों के बाद, उनकी बातों और की जाने वाली कार्यवाही को लेकर तरह तरह की प्रतिक्रियाएँ आई। छत्तीसगढ़ जहां कांग्रेस की सरकार है, उसके मुख्यमंत्री भूपेश बधेल ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से आग्रह किया है कि 14 अप्रैल को लॉकडाउन हटने के बाद यदि परिवहन व्यवस्था शुरु हुई और बगैर ठोस उपाय के शुरु किए गए तो राज्यों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमनसिंह ने वर्तमान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को पत्र लिखकर छत्तीसगढ़ में कोरोना से निपटने की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल खड़े किये थे जिसके जवाब में मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार रूचिर गर्ग ने प्रधानमंत्री केयर्स फंड को लेकर सवाल उठाते हुए कहा है कि मुख्यमंत्री सहायता कोष या राज्य राहत कोष में दिए जाने वाले दान को कार्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी में शमिल किया जाये। इसके जवाब में भाजपा के पंकज झा ने भी एक सार्वजनिक पत्र लिख दिया लेकिन बात जरा इससे आगे की है. भाजपा के सांसदों का राज्य सहायता कोष में मदद नहीं करके पीएम केयर्स फंड में अपनी सांसद निधि देने का मामला भी इस आग में घी का काम कर रहा है। इस वैश्विक महामारी के समय जरूरी ये है कि केन्द्र और राज्य की सरकारें पार्टी लाईन और सोच से हटकर, सरकारी तंत्र का इस तरह से सरलीकरण करें कि वह त्वरित निर्णय लेकर राहत सामग्री, दवाई, कीट उपलब्ध करा सके। सब मिलकर जितनी जल्दी हो सके, कोरोना की दवा के खोज कार्य में सहभागी होकर एक दूसरे को सहयोग करें। यह समय फ़ाईलों के अनावश्यक चलन और एक दूसरी की कमियाँ निकाल उलझाने का नहीं है।

लॉकडाउन को लेकर पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी और केन्द्र के प्रतिनिधि के रूप काम करने वाले राज्यपाल जगदीप घनखड़ के बीच तनातनी हो रही है। वे कोरोना लॉगडाउन को मुस्तैदी से लागू कराने केन्द्रीय अर्धसैनिक बल की तैनाती चाहते हैं। केन्द्र और राज्य सरकारों के संबंधों को संतुलित रखने के उद्देश्य से भारत सरकार द्वारा जून 1982 में सरकारिया आयोग का गठन किया गया था। इसके अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायधीश न्यायमूर्ति राजिन्दर सिंह सरकारिया थे। इसका कार्य भारत के केन्द्र-राज्य सम्बन्धों से सम्बन्धित शक्ति संतुलन पर अपनी संस्तुति देना था। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एस.आर. बोम्मई ने अपनी सरकार की बर्खास्तगी को 1989 में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी और राज्य विधानसभा में शक्ति परीक्षण कराने के उनके आग्रह को राज्यपाल द्वारा ठुकरा देने के निर्णय पर सवाल उठाया था।

सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय एक पीठ ने बोम्मई मामले में मार्च, 1994 में अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया और राज्यों में केंद्रीय शासन लागू करने के संदर्भ में दिशा-निर्देश तय कर दिये थे। विशेष करके राज्यपाल के सम्बंध में यह सिफ़ारिश की गई कि राज्यपाल के रूप में नियुक्त किये जाने वाले व्यक्ति को राज्य, जिसमें वह नियुक्त किया जाए, के बाहर का व्यक्ति होना चाहिए तथा उसे राज्य की राजनीति में रुचि नहीं रखना चाहिए। उसे ऐसा व्यक्ति होना चाहिए, जो सामान्य रूप से या विशेष रूप से नियुक्त किये जाने के पहले राजनीति में सक्रिय भाग न ले रहा हो। आज अधिकाँश जगह केन्द्र में सत्तारूढ़ पार्टी से जुड़े या उनके कहे अनुसार काम करने वाले व्यक्ति चाहे वो राजनीतिक हो या ग़ैर राजनीतिक, वे ही इस पद को सुशोभित करते हैं.

जब पूरा देश एक नये तरह के संकट, तालेबंदी और सामाजिक और आर्थिक स्तर पर जूझ रहा हो तब केंद्र सरकार की भूमिका समन्वयक की होनी चाहिए जो संसाधनों को न सिर्फ़ उपलब्ध कराए बल्कि उनका न्यायसंगत ढंग से उचित वितरण करे। महामारी का प्रबंधन निहायत ही स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार समुचित रणनीति बनाकर किया जाना चाहिए। इसलिए विभिन्न ज़िलों की आवश्यकता के अनुरूप संसाधन प्रदान किए जाने चाहिए। बहुत सारे राज्यों से कामकाज की तलाश में दूसरे राज्यों के महानगरो और औद्योगिक क्षैत्रों में काम के लिए जाने वाले प्रवासी मज़दूरों की समस्या बहुत गम्भीर है। इसे समान रूप से प्राथमिकता देते हुए उनके राहत के लिये ठोस काम किए जाने चाहिए। कोरोना से निपटने के लिए जो भी रणनीति बनाई जा रही है, उस रणनीति का विकेंद्रीकरण किया जाना चाहिए।

कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए आयोजित अपनी पत्रकार वार्ता में कहा है कि यह आलोचना का वक्त नहीं है लिहाजा सरकार को रचनात्मक सुझाव देने का वक्त है। अभी मोदी से नहीं, कोरोना से लड़ने का वक्त है. अगर हिंदुस्तान एक होकर लड़ा तो इस वायरस को हरा देंगे। अगर हम बंट गए तो वायरस जीत जाएगा। उन्होंने केन्द्र सरकार से टेस्टिंग बढ़ाने और गरीबों, किसानों व उद्योगों को प्रोटेक्शन देने की मांग की। उन्होंने भी रिसोर्सेज को स्टेट के हाथ में देने, राज्यों को जीएसटी देने, राज्यों के मुख्यमंत्रियों, ज़िला कलेक्टरों से चर्चा कर उनकी माँग की प्रतिपूर्ति करने कहा। कोरोना से निपटने केन्द्र सरकार को राज्यों के मुख्यमंत्रियों से खुलकर बात करनी चाहिए। राज्यों को दिये जाने वाले पैसों की रफ़्तार बढ़नी चाहिए। उन्होंने कहा कि राज्यों को वित्तीय संरक्षण, लोगों को फूड सिक्यॉरिटी, उद्योगों के प्रोटेक्शन और फाइनैंशल पैकेज देना होगा।

महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्री, झारखंड के मुख्यमंत्री, मंत्री सहित बहुत से राज्य पैसों के साथ केन्द्र से स्वास्थ्य संबंधित कीट आदि नहीं मिलने की बात कह रहे हैं। वहीं दूसरी ओर लॉकडाउन लगाते समय नहीं पूछे जाने और चार घंटे की अवधि में कालडाउन का निर्णय लेने से अलग-अलग राज्यों के यहाँ—वहाँ फँसे नागरिकों को लेकर भी केन्द्र के फ़ैसले की आलोचना कर रहे हैं। ये सही है कि प्रधानमंत्री द्वारा घोषित 21 दिन के लाँकडाउन के बाद सैकड़ों लोगों के सड़क पर आ जाने से, पैदल मार्च से सरकार को परेशानी और आलोचना का सामना करना पड़ा। बाद में प्रधानमंत्री ने देश के तमाम राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बातचीत की, मंत्रिपरिषद के लोगों को अलग—अलग जबावदारी सौंपी।

सामान्यतः किसी राज्य में साम्प्रदायिक दंगे, संवैधानिक संकट आने पर ही केन्द्र, राज्य के मामले में सीधे हस्तक्षेप करता है। इधर के कुछ सालों में बहुत से मामलों में, जिसमें राज्यों की विपक्षी सरकारों को बहुमत के बाद गिराने, चुनाव उपरांत बहुमत होते हुए भी सरकार ना बनने देने, सीबीआई, इन्कम टैक्स और अन्य सेंट्रल एजेंसियों की मदद से विपक्षियों को परेशान करने के मामले सामने आये हैं। सुप्रीम कोर्ट को भी इस तरह के मामलों में हस्तक्षेप करना पड़ा है. ऐसे सारे घटनाक्रम के बीच कोरोना ने सारी बातों को भूलाकर राष्ट्र के बारे में सोचने पर विवश किया है। कोरोना की महामारी ऐसी है कि इसने राज्य और राष्ट्र की सीमा का अतिक्रमण करके पूरी दुनिया को ही अपने घेरे में ले लिया। सभी देश एक दूसरे की ओर मदद का हाथ बढ़ा रहे हैं। अमेरिका ने ज़रूर चीन और WHO को कठघरे में खड़ा किया है परन्तु हर कोई इस अदृश्य शत्रु से डरा हुआ है, परेशान है।

( लेखक दैनिक आज की जनधारा तथा वेब मीडिया हाउस के प्रधान संपादक हैं )