संघर्ष कलाकारों के सम्मान काः क्या सरकार कलाकारों के लिए कोई घोषणा करेगी

संघर्ष कलाकारों के सम्मान काः क्या सरकार कलाकारों के लिए कोई घोषणा करेगी

 कलाकारों को तालियों की गड़गड़ाहट की आदत होती है। उनकी अपनी पहचान होती है। कोरोना के समय में इस पहचान और उससे जुड़े सम्मान को बचाए रखने की खातिर ये कलाकार अपने लिए मदद भी नहीं मांग पाए। निशुल्क बांटे जा रहे राशन की कतार में खड़ा होना शर्मिंदगी का सबब था। घर में हारमोनियम था, ढोल था, संगीत के साजो-सामान थे, लेकिन लॉकडाउन के चलते काम नहीं था, तो राशन का इंतज़ाम नहीं था।

वे कलाकार जो सरकार की नीतियों-योजनाओं का प्रचार करने के लिए सुदूर गांवों तक नुक्कड़ नाटक के लिए जाते हैं। सरकारी मेलों में जनता को इन योजनाओं के बारे में समझाते हैं। कोरोना के मुश्किल समय में इन तक कोई सरकारी योजना नहीं पहुंची। ये किसी योजना के दायरे में नहीं आए।

कलाकारों के सामने भी कोरोना चुनौती बन कर खड़ा हो गया चाहे हम छत्तीसगढ़,बिहार की बात करें या उत्तराखंड या किसी अन्य राज्य की सभी जगह ये ही हाल है। 

उत्तराखंड के कलाकार-लोक कलाकार इस समय अपनी सरकार से नाराज़ हैं। 19 जून को लोक-कलाकारों के लिए मुख्यमंत्री राहत कोष से एक बार एक हज़ार रुपये की आर्थिक मदद का एलान किया गया। ये एक हजार रुपये भी जिलाधिकारियों के ज़रिये मिलेंगे। इसके लिए जिलाधिकारी कार्यालय में आवेदन करना होगा। इस घोषणा के बाद राज्य के अलग-अलग कलाकारों के समूहों-समितियों ने आहत होकर ज्ञापन भेजा। 25 जून को राज्य के अलग-अलग हिस्सों से लोक कलाकारों ने अपनी तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा कर विरोध दर्ज कराया था इसी प्रकार से बिहार में कला संस्कृति विभाग की उपेक्षा ने इन्हें आंदोलनरत कर दिया. नतीजतन सरकारी ऐलान ने इन्हें और उद्वेलित कर दिया. प्रदेश की कला संस्कृति विभाग ने एक ऐलान किया. सरकार की आलोचना कलाकारों ने जमकर की. इस दौरान कई समाजसेवी संगठनों ने इन्हें मरहम लगाया और आर्थिक मोर्चे पर कमजोर कलाकारों की मदद की. खैर अब चुनावी साल है. कला जगत से जुड़े कलाकार यह सवाल  पूछने लगे हैं. क्या कलाकारों से जुड़े जनहित के मुदृदे भी चुनावी फिजाओं में गूंजेंगे. मसलन वर्षों से रंगकर्म कर रहे कलाकार अपनी भलाई की राह तक रहे हैं. अब तक प्रदेश में नाट्य विद्यालय का सपना अधूरा है. प्रदेश के कई ​जिलों में प्रेक्षागृह तक  नहीं. राजधानी में भी जो प्रेक्षागृह हैं. उसका देखरेख नहीं हो पा रहा.

इसके लिए नीति की जरूरत होगी। सरकार को सबके लिए सोचना होगा। संस्कृति और सूचना के अलावा बहुत से ऐसे कलाकार हैं जो कहीं सूचीबद्ध नहीं हैं लेकिन कोरोना से उपजी पीड़ा से सब गुज़रे। ये फ्रीलांस कलाकार होटलों में, कार्पोरेट घरानों के कार्यक्रमों में, ऑकेस्ट्रा, शादी-ब्याह, जागरण तक काम करते हैं। ये किसी गिनती में शामिल नहीं हुए। वहीं कलाकारों का कहना है कि इस विधा से जुड़े लोगों को प्रशिक्षण कार्यों में लगाया जाना चाहिए। 

वरिष्ठ रंगकर्मी तरवीर अख्तर ने बताया कि कालाकारों के मुदृदे सरकारी घोषणापत्र में जगह नहीं ले पाते. उन्हें वोटर नहीं माना जाता. किसानों नौजवानों का मुदृदा सामने रहता है. कलाकार सरकारी योजनाओं का विरोध भी करते हैं. यह भी एक वजह है. उन्होंने सवाल उठाया कि जिस प्रकार सरकार अन्य योजनाओं का बखान करती है. वह वास्तविक में होता नहीं. प्रदेश में शिक्षा व संस्कृति का हाल सुधरना चाहिए. कई कलाकार चाहते हैं. प्रदेश में संस्कृति का विकास हो. अब  चुनावी साल है. क्या सरकार कलाकारों के लिए कोई घोषणा करेगी. क्या बिहार में लंबित उनकी योजनायें आगे भी इन्हें सुविधा देगी.