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तस्करी का सामान नहीं भावी पीढ़ी

तस्करी का सामान नहीं भावी पीढ़ी


- कैलाश सत्यार्थी, नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित 

सीमा (बदला हुआ नाम) को महज 13 साल की उम्र में उनके गांव के कुछ लोगों द्वारा चुराकर दिल्ली की एक प्लेसमेंट एजेंसी में बेच दिया गया था। फिर प्लेसमेंट एजेंसी से एक दंपति ने उन्हें घरेलू कामगार के रूप में केवल 20,000 रुपये में खरीद लिया। लेकिन वहां से मजदूरी के नाम पर उनको एक रुपया भी नहीं मिला। इतना ही नहीं, नियोक्ताओं और ट्रैफिकर (तस्कर) द्वारा उनका बार-बार बलात्कार और शोषण किया जाता रहा। अपनी बेटी के लापता होने से निराश और घनघोर पीड़ा झेलने के बाद सीमा के मजदूर पिता हमारे पास आए। हमने सीमा को दिल्ली के एक घर में ढूंढ़ लिया। लेकिन, हमारे लिए यह हैरानी की बात थी कि गुलामी और शोषण से आजाद होने के बाद भी वह दुखी थीं और हमारे सामने नहीं आ रही थीं। पिता से मिलने के बजाय वह रोते हुए दीवार के पीछे छिप गईं। बहुत कुरेदने पर उन्होंने रोते हुए कहा, ‘मैं पिता को अपना चेहरा नहीं दिखा सकती। मैं अब गंदी हो चुकी हूं। मैं खुद को मार डालना चाहती हूं।’ यह सुनकर मेरा सिर शर्म से झुक गया।

यह केवल सीमा की कहानी नहीं है। यह हमारे समाज के सबसे गरीब, पिछड़े और हाशिये पर रहने वाले हजारों बच्चों और लड़कियों की कहानी है। दुनिया का कोई भी देश जब तक अपनी बेटियों की खरीद-फरोख्त को चुपचाप सहते जा रहा है, तब तक वह खुद को सभ्य नहीं कह सकता। किसी राष्ट्र की संपत्ति, शक्ति या प्रगति का कोई मतलब नहीं है, यदि उसके बच्चों को मध्ययुग की दास प्रथा की तरह जानवरों से भी कम कीमत में खरीदा और बेचा जाता है! चार दशक पहले 1980 में जब हमने पंजाब के सरहिंद के एक ईंट भट्ठे से वर्षों से कैद वासल खान और उनकी मासूम साबो को बंधुआ मजदूरी व गुलामी से मुक्त कराकर अपना अभियान शुरू किया था, तभी हमें समझ में आ गया था कि बाल श्रम और ट्रैफिकिंग (मानव तस्करी) एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। बचपन बचाओ आंदोलन (बीबीए) सहित तमाम सिविल सोसायटी समूहों ने मानव व्यापार के इस खतरे को समाप्त करने हेतु एक मजबूत कानून के लिए दशकों से अभियान चला रखा है। वर्ष 2017 में सीमा और उनके जैसे बाल दासता से मुक्त हजारों बच्चों और युवाओं ने इस कानून की मांग को लेकर देश के कोने-कोने में सरकारों, न्यायपालिका, धर्मगुरुओं, कॉरपोरेट घरानों, छात्रों और सिविल सोसायटी के लोगों के साथ ‘भारत यात्रा’ में कदम से कदम मिलाकर मार्च किया। इस देशव्यापी यात्रा में 12 हजार किलोमीटर की दूरी तय की गई और 12 लाख से अधिक लोगों ने भाग लिया। सबकी जुबान पर एक ही मांग थी कि भारत को बच्चों की खरीद-फरोख्त और शोषण रोकने के लिए एक व्यापक मानव तस्करी विरोधी कानून पारित करना चाहिए। ‘भारत यात्रा’ में शामिल बाल दासता और मानव व्यापार से मुक्त बहादुर नौजवानों के मन को छू लेने वाले गीत अब भी मेरे कानों में गूंजते रहते हैं- बिकने को तैयार नहीं हम, लुटने को तैयार नहीं हम।

केंद्र सरकार ने व्यक्तियों की तस्करी (रोकथाम, देखभाल और पुनर्वास) विधेयक, 2021 प्रस्तावित किया है। इसे संसद को पारित करना है। बिल का उद्देश्य अपराध के सामाजिक और आर्थिक कारणों, तस्करों को सजा, पीड़ितों की सुरक्षा व पुनर्वास सहित मानव व्यापार के सभी पहलुओं से निपटना है। यह एक व्यापक और मजबूत विधेयक है। कोविड-19 महामारी और इससे उपजी परिस्थितियों ने इस कानून की आवश्यकता को और ज्यादा बढ़ा दिया है। लंबे समय तक स्कूलों के बंद रहने और आर्थिक संकट के चलते देश के लाखों गरीब परिवारों के पास आजीविका का कोई साधन न रहने का फायदा तस्कर उठा रहे हैं। बीबीए के आंकडे़ बाल तस्करी बढ़ने के स्पष्ट संकेत दे रहे हैं। संगठन ने पहले लॉकडाउन से लेकर अब तक सरकारी एजेंसियों के सहयोग से 9,000 से भी ज्यादा बच्चों को मानव तस्करों से मुक्त कराया है। इसकी तुलना में महामारी से पहले 14 महीने की समान अवधि के दौरान करीब 4,700 बच्चों को मुक्त कराया गया था। ये आंकड़े स्थिति की गंभीरता का एहसास कराते हैं। इसीलिए यदि हमें महामारी के प्रभाव से उबरना है, तो इसके मानवीय पहलू को भी ध्यान में रखना होगा। इसलिए तस्करी विरोधी कानून को फौरन पारित कराने के साथ ही हमें बच्चों के लिए सालाना बजटीय आवंटन में भी वृद्धि करनी होगी। मानव व्यापार अपने आप में एक संगठित अपराध है। लेकिन यह कई अन्य अपराधों को भी जन्म देता है। यह एक समानांतर काली कमाई वाली अर्थव्यवस्था को जन्म देता है, जो बाल श्रम, बाल विवाह, वेश्यावृत्ति, बंधुआ मजदूरी, जबरन भिक्षावृत्ति, नशीली दवाओं से संबंधित अपराध, भ्रष्टाचार, आतंकवाद और अन्य अवैध व्यवसायों को बढ़ावा देता है। हमारे संविधान निर्माताओं ने अस्पृश्यता के अलावा तस्करी के अपराध को भी भारत के संविधान के तहत दंडनीय बनाया। लिहाजा, एक मजबूत ‘एंटी ट्रैफिकिंग’ कानून हमारे निर्वाचित नेताओं की नैतिक और सांविधानिक जिम्मेदारी है और राष्ट्र-निर्माण और आर्थिक प्रगति की दिशा में एक आवश्यक कदम भी। दरअसल, बच्चों की गरीबी, मजदूरी, अशिक्षा और सुरक्षा हमारी राजनीतिक और आर्थिक प्राथमिकताओं में नहीं रहे हैं। लेकिन, हमारे बच्चे अब और इंतजार नहीं कर सकते। अब समय आ गया है कि एक पूरी पीढ़ी को बचाने के लिए इस मुद्दे को राजनीति और विकास के केंद्र में लाया जाए। आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय में संतुलन बनाया जाए। भारत अपनी आजादी के 75वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है, जिसे भारत सरकार अमृतोत्सव के रूप में मना रही है। इस अवसर पर भारतमाता के लिए उसके बच्चों की आजादी से बड़ा तोहफा भला और क्या हो सकता है? हमारे नीति-निर्माता बाल तस्करी के खिलाफ एक मजबूत कानून बनाकर हमारे बच्चों को आजादी, सुरक्षा व गरिमा का अमृत प्रदान कर सकते हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)