breaking news New

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -हिन्दी सिनेमा के साम्राज्य का राजकुमार नहीं रहा

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  -हिन्दी सिनेमा के साम्राज्य का राजकुमार नहीं रहा

-सुभाष मिश्र

भारतीय सिनेमा में अब धीरे-धीरे स्टारडम, सुपरस्टारर्स का दौर खत्म हो रहा है। आज के सिनेमा में कहानी, कथ्य और नयापन ही सिनेमा में असली हीरो है। सिनेमा की यात्रा के 125 साल में करीब 75 साल दिलीप कुमार यानि यूसुफ खान की उस छाया के भी हैं जिससे हिन्दी सिनेमा का अभिनय जगत, स्टार, कलाकार बेहद प्रभावित रहे। यदि सब कुछ अनुकूल होता और गुणवंतलाल शाह की मृत्यु नहीं हुई होती तो हमें अमृतलाल नागर की अमर साहित्यिक कृति मानस का हंस के रुप में तुलसीदास के रुप में दिलीप कुमार उसी तरह देखने को मिलते जैसे शरदचन्द्र के उपन्यास देवदास के रुप में दिलीप कुमार याद किए जाते हैं।
सन् 1944....आजादी अभी 3 बरस दूर थी और भारत में राजनीतिक उथल-पुथल का ज्वार भाटा आया हुआ था। इसी बरस यानि 1944 में फिल्म ज्वार भाटा से ही एक नये अभिनेता ने भारतीय सिनेमा की दुनिया में कदम रखा जो आगे चलकर हिन्दी सिनेमा का एक बड़ा नाम बना। इस अभिनेता का नाम था-दिलीप कुमार जो ट्रेजडी किंग के नाम से भी मशहूर हुए।  

आदमकद आईने के सामने खड़े होकर एक-एक संवाद को दस बार बोलने वाले दिलीप कुमार अपने सिनेमाई चरित्र में इतने घुल मिल जाते थे कि उन्हें उससे निकलने के लिए चिकित्सकों की और नये तरह की स्क्रिप्ट चुननी पड़ती। ज्वार भाटा फिल्म से अपने अभिनय की यात्रा शुरु करने वाले दिलीप कुमार ने अपने पूरे जीवनकाल में 62 फिल्में की जिनमें चार अतिथि भूमिका वाली फिल्में भी थीं। 1940 से 60 के फिल्मी दशक के इस सफल हीरो को सुनहरे पर्दे पर 1980 में एक पिता के रुप में सुभाष घई द्वारा निर्देशित फिल्म में वापस आना पड़ा। 8 बार फिल्म फेयर सर्वश्रेष्ठ फिल्म अभिनेता अवार्ड, 1994 में दादा साहेब फाल्के सम्मान, पद्मभूषण के साथ पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशाने इम्तियाज से सम्मानित किया गया। इस अभिनेता का पिछला एक दशक स्मृति विहिनता में गुजरा। बीमारी की वजह से उन्हें लोगों को पहचानना मुश्किल होने लगा था। पेशावर के यूसुफ खान को देवीरानी द्वारा दिये नाम दिलीप कुमार ने भारतीय सिनेमा जगत ने एक नई पहचान दी। अपनी नेचुरल एक्टिंग के जरिये भारतीय सिनेमा में अपनी अमिट छाप छोडऩे वाले दिलीप कुमार की नकल उनके बाद के बहुत से अभिनेता करते हुए देखे गए। देवदास जैसे समान चरित्र की वजह से गुरुदत्त की प्यासा जैसी फिल्म को मना करने वाले दिलीप कुमार की हरदम कोशिश होती कि वे कुछ नया करें। दिलीप कुमार ने स्वयं अपने बारे में एक साक्षात्कार में कहा है कि जब कोई निर्देशक मेरे पास 30 वर्षीय चरित्र के साथ आता है तो मैं स्क्रिप्ट अपने जीवन के पहले 29 वर्षों को खोजने और बनाने की कोशिश करता हूं ताकि मैं चरित्र के साथ पहचान शुरु कर सकूं। अक्सर निर्देशक चरित्र की व्याख्या करने के लिए मुझ पर छोड़ देते हैं।

हमारा सिनेमा संचार क्रांति और उदारीकरण के बाद बहुत बदला। ओटीटी प्लेटफार्म आने के बाद तो मानो उसमें क्रांति आ गई। अब सच का सिनेमा या सनसनी का सिनेमा प्रमुख हो गया है। स्वयं दिलीप कुमार ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि औद्योगिकीकरण ने हमें संकीर्ण सोच वाला बना दिया है। वे कहते थे कि विकसित होना और सभ्य होना दो अलग चीजें हैं।
दिलीप कुमार के बाद के आज के हिंदी सिनेमा ने तमाम तरह की रूढिय़ों को तोड़ा है। इसने अपने समय की नब्ज को पहचाना और नया दर्शक वर्ग भी तैयार किया है। इसने विषय, भाषा, पात्र, प्रस्तुति सभी स्तरों पर अपने को बदला है। भारतीय दर्शक ने भी सिनेमा के इस परिवर्तित और अपेक्षाकृत समृद्ध रूप को स्वीकार किया है।

हम जब आज दिलीप कुमार साहब को उनके जाने के बाद याद कर रहे हैं तो हमें उन्ही की फिल्म आग का गाना अनायास याद आ जाता है-
ए मेरे दिल कहीं और चल
गम की दुनिया से दिल भर गया
ढूंढ ले अब कोई घर नया।
सत्यजीत रे ने उन्हें मैथड एक्टिंग वाला अग्रणी अभिनेता कहा था। उन्हें ट्रेजडी किंग कहा जाता था। 11 दिसम्बर 1922 को किस्सा ख्वानी बाजार पेशावर में पैदा हुए। मो. यूसुफ खान ने 1944 में 22 साल की उम्र में फिल्म ज्वार भाटा से शुरुआत की। दिलीप कुमार द्वारा अभिनीत फिल्म गंगाजमुना को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। इसके अलावा बोस्टन अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में पॉल रीविअर सिल्वर बाउल, प्राग स्थित चेकेस्लोवाकिया एकेडमी आफ आर्ट्स द्वारा स्पेशल ऑनर डिप्लोमा और कारलोवी वैरी इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल देकर सम्मानित किया गया।

1962 में ब्रिटिश निर्देशक डेविडलीन ने उन्हें लॉरेंस ऑफ अरेबिया में शेरिफ अली की भूमिका निभाने का निमंत्रण दिया था लेकिन दिलीप कुमार ने मना कर दिया। ये भूमिका बाद में आमर शरीफ ने निभाई थी। इसी तरह डोविडलीन की एक और फिल्म ताजमहल में उन्हें एलिजाबेथ टेलर के साथ लाना चाहते थे लेकिन प्रोजेक्ट रद्द हो गया।

1966 में उन्होंने अब्दुल रशीद किरदार के साथ संयुक्तरुप से दिल दिया दर्द लिया का निर्देशन किया लेकिन क्रेडिट्स में उनका नाम ही दिया गया।  80 के बाद उनकी कुछ और महत्वपूर्ण फिल्में आई ये थी विधाता, क्रांति, कर्मा, मशाल, दुनिया, मजदूर, सौदागर, धर्म अधिकारी, शक्ति और कानून अपना-अपना। 1992 में सुधाकर बोकाड़े ने उन्हें लेकर फिल्म कलिंगा बनानी चाही। जिसका निर्देशन भी वो दिलीप कुमार से करवाना चाहते थे किन्तु ये फिल्म अधूरी रह गई।
आज सिनेमा ने मनोरंजन के अर्थ और पैमाने बदले हैं। सिनेमा ने समझ लिया है कि बदला हुआ यह दर्शक केवल लटकों-झटकों से तुष्ट नहीं होने वाला, उसे कुछ ठोस देना होगा। 80 के बाद के दशक की लटके झटके से उब चुके दर्शकों की बेचैनी को नया सिनेमा बनाने वालों ने समझा है, उसे आवाज दी है। अनुराग कश्यप, दिवाकर बनर्जी, इम्तियाज अली जैसे युवा निर्देशकों और जोया अख्तर, रीमा कागती, किरण राव जैसी सशक्त महिला फिल्मकारों ने हिंदी सिनेमा को तीखे तेवर दिए हैं। उसके रंग-ढंग बदले हैं। सिनेमा में आई नई स्त्री अपने लिए जीने के नए रास्ते और उडऩे को नया आसमान ढूंढ रही हैं। दर्शक भी रोते-बिसूरते, हर वक्त अपने दुखड़े सुनाते चरित्रों पर कुछ खास मुग्ध नहीं हो रहा। उसे भी पात्रों के सशक्त व्यक्तित्व की खोज है। वह अब किसी ट्रेजडी किंग को नहीं स्वीकारेगा उसे नये किस्म का देव डी वाला देवदास चाहिए।

दिलीप कुमार ने छह दशकों तक चले अपने फि़ल्मी करियर में मात्र 63 फि़ल्में की थीं लेकिन उन्होंने हिंदी सिनेमा में अभिनय की कला को नई परिभाषा दी।
मशहूर कहानीकार सलीम कहते हैं, दिलीप कुमार ने सबसे पहले भूमिका को अंडरप्ले करना शुरू किया और सूक्ष्म अभिनय की बारीकियों को पर्दे पर उतारा। उदाहरण के लिए उनके पॉज़ और जानबूझ कर मौन रहने की अदा ने दर्शकों पर ज़बरदस्त प्रभाव छोड़ा।

मुग़ल-ए-आज़म फि़ल्म में पृथ्वीराज कपूर का चरित्र ख़ासा प्रभावी और लाउड था। शहज़ादा सलीम की भूमिका में कोई और अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के सामने उतना ही लाउड होने का लोभ संवरण नहीं कर पाता लेकिन दिलीप कुमार ने जानबूझकर बिना अपनी आवाज़ ऊँची किए हुए अपनी मुलायम, सुसंस्कृत, लेकिन दृढ़ आवाज़ में अपने डायलॉग बोले और दर्शकों की वाहवाही लूटी। दिलीप कुमार, राजकपूर और देवानंद को भारतीय फि़ल्म जगत की त्रि-मूर्ति कहा जाता है लेकिन जितने बहुमुखी आयाम दिलीप कुमार के अभिनय में थे उतने शायद इन दोनों के अभिनय में नहीं। दिलीप कुमार के साथ ही हिन्दी सिनेमा के एक अध्याय का समापन हो गया। दिलीप साहब हमेशा अपने नेचुरल अभिनय के लिए याद किये जायेंगे। हम कह सकते हैं कि मुगले आजम का सलीम यानी हिन्दी सिनेमा के साम्राज्य का राजकुमार अब नहीं रहा।