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कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः विश्व तरंग जाल

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः  विश्व तरंग जाल


ट्वीटर वीर

वाट्सएप के योद्धा

फेसबुकिया सेनापति

फुग्गे-से फूले और फटते

अपने-अपने पाले में

आगे बढ़ते ,पीछे हटते

अपने ताने-बाने में

बढ़ते-घटते


लेपटाप और मोबाइल पर

झूमते , हिलते-डुलते

अपनी-अपनी आवेग-लहर में

ढोल पीटते, भजते

लहराते-फहराते ध्वज-से

अपनाते और तजते


भन्नाते भँवरे-से फँसे हुए

मकड़ी के जाले में

यह विश्व तरंग जाल

कोई पथ नहीं

किसी के पाले में


दूर किसी के हाथों में

इस आवेग-लहर की डोर

जिस पर बनती -मिटती रहती

मन की तरंग, तन की हिलोर