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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - माननीयों की चुप्पी और निष्क्रियता

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - माननीयों की चुप्पी और निष्क्रियता

-सुभाष मिश्र
हम जिन्हें अपना सांसद, विधायक चुनते हैं उनसे यह अपेक्षा रहती है कि वे जनता के मुद्दे पर सदनके भीतर और सदन के बाहर प्रमुखता से उठायेंगे, बोलेंगे। जनता की आवाज का प्रतिनिधित्व करने वाले मूकदर्शक की भूमिका में नहीं होंगे। अभी हाल ही में लोकसभा, राज्यसभा तथा राज्य की विधानसभा में सांसद, विधायक ने कितने प्रश्न पूछे, कौन खामोश रहा यह ब्यौरा सामने आया तो लोगों को थोड़ी हैरानी हुई।
पूरे देश के बहुत से राज्यों में बहुत तेजी के साथ कोरोना की दूसरी लहर का संक्रमण फैला। हम छत्तीसगढ़ की बात करें तो केंद्र सरकार में यहां से एक केंद्रीय राज्यमंत्री है। 11 सांसद है व 5राज्यसभा सदस्य है। इसके अलावा कांग्रेस, भाजपा और दूसरी पार्टियों और संगठनों के राष्ट्रीय पदाधिकारी यहां है किन्तु इनमें से कितने सक्रियता के साथ कोरोना संक्रमण से निपटने के अभियान में सक्रिय है। यह सोचने की बात है। अभी हाल ही में कांग्रेस की 35 लोकसभा सांसद ऐसे में जिन्होंने एक भी प्रश्न नहीं पूछा, इनमें बहुत से ऐसे सांसद भी शामिल है जो अपनी पार्टी के सुप्रीमो है। छत्तीसगढ़ की पिछली विधानसभा में 2014 से 17 के बीच 30 विधायक मौन रहे। जबकि हमारे माननीयों को लोकसभा, विधानसभा के लिए भत्ते आदि मिलते हैं, ज्यादा सक्रिय रहते हैं तो श्रेष्ठता का पुरस्कार भी मिलता है।
केन्द्रीय राज्यमंत्री रेणुका सिंह सरगुजा से सांसद हैं, केन्द्र सरकार में आदिवासी मामलों की मंत्री हैं, रमन सरकार में भी मंत्री रह चुकी हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में कोरोना महामारी की चिंता करने, राज्य सरकार की मदद करने या केन्द्र सरकार की ओर से कोई मदद दिलवाने का कोई प्रयास उनकी ओर से हुआ नहीं दिखता। इतने लोगों की मौत हो गई लेकिन उन्होंने सांत्वना के दो टिवट तक नहीं किए।
राज्य ने केन्द्र को 11 लोकसभा सांसद चुनकर दिए हैं जिनमें से 9 भाजपा के हैं और दो कांग्रेस के। लेकिन कोई भी छत्तीसगढ़ की मदद करने के लिए प्रयास करता नहीं दिख रहा है। यहां रायपुर लोकसभा के सांसद सुनील सोनी की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने जनहित में आवाज उठाई और प्रेस कांफ्रेंस करके बड़ा दिल दिखाते हुए कहा कि हम राज्य सरकार का सहयोग करने को तैयार हैं। हम महामारी पर राजनीति नहीं करना चाहते। लेकिन बाकी सांसद क्या कर रहे हैं! मानो सब हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। अगर सब मिलकर प्रयास करें तो राज्य सरकार को मदद भी मिलेगी और जनता को राहत भी।
इसी तरह छत्तीसगढ़ से कुछ राज्यसभा सांसद भी चुनकर भेजे गए हैं लेकिन कोरोना महामारी से निबटने में किसी का कोई योगदान नहीं दिख रहा। भाजपा की राज्यसभा सांसद सरोज पाण्डे ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री से चर्चा जरूर की लेकिन वह बेमतलब ही रही। वैसे भी सुश्री पाण्डे ने इस चर्चा को दुर्ग तक ही सीमित रखा। इसी तरह एक राज्यसभा सांसद हैं के टी एस तुलसी। कांग्रेस से छत्तीसगढ़ कोटे से राज्यसभा सांसद चुने गए हैं। उन्हें भी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल सहित राज्य सरकार की मदद के लिए आगे आना चाहिए। अन्यथा छत्तीसगढ़ की जनता अपने को छला हुआ महसूस करेगी।
जिस तरह राज्य के सभी विधायकों और जनप्रतिनिधियों ने एक महीने की सैलेरी मुख्यमंत्री आपदा राहत कोष में देने की पहल की है, इसी तरह छत्तीसगढ़ के लोकसभा, राज्यसभा सांसदों को भी चाहिए कि वे एक महीने की सैलेरी मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा करें ताकि कोरोना आपदा से जूझते छत्तीसगढ़ के जख्मों पर कुछ तो मलहम आपकी तरफ से लगे।
पार्टी लाईन के चलते या किसी अन्य राजनीतिक आर्थिक दबाव की वजह से ही सही हमारे बहुत से जन प्रतिनिधि खामोश रहते हैं। उनकी यह खामोशी तब बहुत खलती है, जब उनका मुखर होना जरूरी है। कोरोना संक्रमण की इस आपदा के समय भी बहुत से लोगों की चुप्पी खटने वाली है। राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कांग्रेस पदाधिकारियों की आनलाईन बैठक लेकर कोरोना के हालात जाने। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार राज्यों के मुख्यमंत्री से बात की है। अब उपराष्ट्रपति के साथ मिलकर राज्यपालों से कोरोना की खोज खबर लेने जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ नेताप्रतिपक्ष के नेता धरमलाल कौशिक के नेतृत्व में विधायकों का दल जिनमें बृजमोहन अग्रवाल, अजय चंद्राकर आदि शामिल थे, राज्य के मुख्य सचिव तथा राज्यपाल से मिला और उनसे कोरोना नियंत्रण को लेकर विस्तार से चर्चा की।
सरकार में लालबत्ती की अभिलाषा रखने वाले या पा चुके लोगों से लेकर आये दिन छोटी-छोटी बातों पर ट्वीट करने वाले, विज्ञप्ति ट्वीट नेता कोरोना संक्रमण के दौर में आइसोलेशन में चले गये हैं।
इस बीच में कांग्रेस के सभी मंत्रियों, विधायकों, महापौर और पार्षद ने अपने एकमाह का वेतन मुख्यमंत्री सहायता कोष में देने का निर्णय लिया है। शायद भाजपा से जुड़े नेता पीएम केयर फंड में अपना अंशदान जमा कराएं। राज्य की ब्यूरोक्रेसी ने भी अपना एक दिन का वेतन देने की बात कही है। छत्तीसगढ़ राजपत्रित अधिकारी संघ सहित बहुत से संगठनों ने भी स्वेच्छा से एक दिन का वेतन देने का निर्णय लिया है। सवाल यहां एक दिन या एक माह का वेतन देने का नहीं है, सवाल यह है कि हम ऐसी संकट की घड़ी में कितनी मानवीयता और सक्रियता के साथ लोगों की सहायता करते हैं, उनके हौसले को बढ़ाते हैं। कोरोना की पहली लहर में समाज के हर वर्ग से जिस तरह की सहायता का जज्बा दिखा था, वह इस समय नदारद है। उल्टे कोरोना की इस दूसरी लहर में अस्पताल से लेकर दवाई दुकान वाले तक और रोजमर्रा का सामान बेचने वाले तक अधिकतम मुनाफा कमाने के जुगाड़ में लगे हैं।
बिलासपुर में एक पत्रकार को खाली आक्सीजन सिलेंडर लगाने से हुई मौत से लेकर निजी अस्पतालों में मरीजों के साथ हो रही लूट, अस्पतालों में बेड के लिए भटकते लोगों को देखकर नहीं लगता की इनका कोई प्रतिनिधित्व करता है। गर्मियों के सीजन में पानी के टैंकर सप्लाई के नाम पर राजनीति करने वाले, आर्थिक लाभ कमाने वाले पार्षदों की चुप्पी भी देखते बनती है। कोरोना के दौरान बिगड़ते हालातों को देखते हुए लोगों का शासन-प्रशासन, नेताओं पर विश्वास के बजाय ईश्वर पर ज्यादा विश्वास होने लगता है। जिन्हें फील्ड पर होना चाहिए वे अपने-अपने सुरक्षित आरामगाह में बैठे हैं। जनता का क्या है। जब चुनाव आयेंगे तब नये-नये नारों, आश्वासन और धर्मजाति का सहारा लेकर कुछ न कुछ हो जायेगा। फिलहाल आइसोलेशन ठीक है। जनप्रतिनिधियों, समाज के सजग रहने वालों और बात बेबात मुखर रहने वालों की चुप्पी अखरती है। ये चुप्पी अवतार सिंह संधु पाश की कविता की याद दिलाती है -

मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती
गद्दारी और लोभ की मुठ्टी सबसे खतरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना, बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना, बुरा तो है
पर सबसे खतरनाक नहीं होता
कपट के शोर में
सही होते हुए भी दब जाना, बुरा तो है
जुगनुओं की लौ में पढऩा, बुरा तो है
मुठ्टियां भींचकर बस वक्त निकाल लेना, बुरा तो है
सबसे खतरनाक नहीं होता
सबसे खतरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना सब सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर जाना
सबसे खतरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
सबसे खतरनाक वो घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी नजर में रुकी होती है
सबसे खतरनाक वो आंख होती है
जो सबकुछ देखती हुई जमी बर्फ होती है
जिसकी नजर दुनिया को मोहब्बत से चूमना भूल जाती है
जो चीजों से उठती अंधेपन की भाप पर ढुलक जाती है
जो रोजमर्रा के क्रम को पीती हुई
एक लक्ष्यहीन दोहराव के उलटफेर में खो जाती है