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अलिखित है ईमान - ध्रुव शुक्ल

अलिखित है ईमान - ध्रुव शुक्ल

जिनके पास सत्ता है, वे अपनी सत्ता को बचाये रखने और जिनके पास नहीं है, वे अपनी सत्ता को किसी तरह फिर से पाने के लिए एक-दूसरे पर बे-ईमान होने का आरोप लगाकर देश के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में प्रतिदिन अविश्वास के बीज बोते रहते हैं। उनका यह व्यवहार देश के लोगों के मन को इन तीनों क्षेत्रों के प्रति रोज़ गहरे संदेह से भरता रहता है।

हम यह क्यों भूलते जा रहे हैं कि ईमान की मर्यादा अलिखित है, वह ख़ुद अपने जीवन में निजी तौर पर लाना पड़ता है। एक-दूसरे पर विश्वास के बिना लोकतंत्र में सहयोग और सहकार की कर्मकुशल अभिव्यक्ति भी नहीं हो सकती। यही कारण है कि देश का सार्वजनिक क्षेत्र सिकुड़ रहा है और देश की भूमि पर वैश्विक निजी क्षेत्र अपने पाँव पसारता चला आ रहा है।  

अपनी राजनीतिक सत्ता के विस्तार की बढ़ती हवस देश के सांस्कृतिक और आर्थिक ढाँचे को लगातार कमजोर कर रही है। जनता के मन में बचे रह गये सर्वधर्म समभाव को विखण्डित करके सभी राजनीतिक दल अपने-अपने गठबंधनों को पाल-पोस रहे हैं और बाज़ार की वैश्विक अनीति को ही मान्यता देकर देश के जीवन को बदहाली में धकेल रहे हैं।

वे दबे-पिछडे़ जीवन की शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और रोज़गार पर कुछ थिगड़े लगाकर अपनी सत्ता को समृद्ध तो करते जाते हैं पर इस असहाय जीवन की समृद्धि की उस कार्य-योजना से हमेशा दूर बने रहते हैं जो महात्मा गांधी ने प्रस्तावित की थी। हम स्थानीय जीवन और साधनों की क़द्र किए बिना वैश्विक उधारी में फँसकर सार्वभौमिक आर्थिक ग़ुलामी की ओर जा रहे हैं। 

भारत को दक्षिण-वाम का सांप्रदायिक विद्वेष उस सम्यक् जीवन के मार्ग से लगातार दूर कर रहा है जिसका प्रतिपादन महात्मा बुद्ध ने किया। देश का दुख इस मार्ग के बिना दूर नहीं किया जा सकता।