II प्रधान संपादक सुभाष मिश्र कोरोना संकट में नागरिक अज्ञानता के उन खतरों से अवगत करा रहे हैं जिनसे निबटना देश के लिए बड़ी चुनौती है!

II प्रधान संपादक सुभाष मिश्र कोरोना संकट में नागरिक अज्ञानता के उन खतरों से अवगत करा रहे हैं जिनसे निबटना देश के लिए बड़ी चुनौती है!
  • सुभाष मिश्र


देश में कोरोना संक्रमण से निपटने के लिए 14 अप्रैल 2020 तक लाकडाउन है, जिसे 30 अप्रैल तक बढ़ाये जाने का फैसला लगभग हो चुका है। चूंकि कोरोना वायरस एक मानव श्रृंखला के रूप में फैला है इसलिए सर्वाधिक जोर सोशल डिस्टेसिंग और डाक्टरों द्वारा बताएं गये ऐतिहायत पर है। कोरोना के संभावित भय के साथ-साथ गरीबी, बेकारी और भूखमरी से लड़ रहे लोगों को जब भी सरकार की ओर से किसी भी प्रकार की राहत, आर्थिक मदद की पेशकश होती है तो ऐसे लोगों की बहुत बड़ी संख्या उन स्थानों पर भीड़ के रूप एकत्र हो जाती है, जहां से ये मदद मिलती है, चाहे वो बैंक हो, सहकारी समिति हो, राशन दुकान हो या कोई सरकारी दफ्तर। आज मध्यप्रदेश के मुरैना जिले में जनधन योजना से पैसे निकालने के लिये बड़ी संख्या में महिलाएं एकत्र हो गईं. हंगामा हुआ है- महिलाओं को गिरफ्तार कर बाद में रिहा किया गया।

छत्तीसगढ़ के गांवो में भी इसी प्रकार के हालात हैं। यह एक घटना है, ऐसी अनेकों घटनाएं हमें दिखाई देंगी, उसकी वजह नागरिक अधिकारों के बोध का अभाव है। हमारे देश के नागरिकों के भीतर संयम की बहुत कमी है। हमारी उत्सवधर्मिता और नागरिक बोध का अभाव हमें किसी भी भीड़ का असंयमित हिस्सा बनने पर मजबूर कर देता है। जहां कहीं भी सरकार द्वारा लाकडाउन, कर्फू में ढील दी गई, वहां कोरोना की परवाह किये बगैर भीड़ लग गई जिन्होंने यह भी ध्यान नहीं रहा कि हमारी वजह से पूरे समुदाय को यह बीमारी हो सकती है। आज हम जिन ठंडे देशों में मरने वालों की संख्या हजारों, लाखों में देख रहे हैं, यदि हम वहां होते तो हमारी संख्या चार गुना ज्यादा होती जिसकी वजह हमें अपने नागरिक अधिकारों का ज्ञान, दायित्वों का बोध नहीं होना है।

छत्तीसगढ़ के बहुत लोगों को इधर के दिनों में यह लगने लगा है कि हमारे यहां चूंकि संक्रमित लोग नहीं हैं इसलिये हम सोशल डिस्टेंसिंग की परहाह किये बगैर, बिना किसी सावधानी के खुले में घूम सकते हैं. हमारी अज्ञानता हमें कितनी भारा पड़ सकती है, अभी हमें इसकी कल्पना नही है। दुर्भाग्य यह है कि हम अपने पढ़े—लिखे नागरिकों को भी जिम्मेदार नागरिक नही बना पाये हैं। हमारा नागरिक नियम को तोड़ने में गौरवान्वित होता है। हमारी सरकार और प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए जरूरी मदद कैसे पहुंचाए क्योंकि हमारे यहां नागरिक सुविधाओं को पहुंचाने वाली संख्याओं का बुनियादी ढांचा उतना मजबूत और बड़ा नहीं है कि वहां पर लोगों की लाईन न लगे।

हमने सामान्य दिनों में बैंकों में सामाजिक सुरक्षा पेंशन, मनरेगा की मजदूरी, छात्रवृत्ति और राशन दुकानों में लंबी-लंबी लाईन लगते देखा है, उसे ऐसे दिनों में हम कैसे कम कर पायेंगे, ये चुनौती हमारे सामने है। हमारे यहां जनसंख्या का दबाव इतना अधिक है कि हम चाहकर भी भीड़ को रोक नहीं पाते हैं। वहीं दूसरी ओर हमने अपने नागरिकों को शिक्षित, संस्कारित भी नहीं किया है कि वे एक—दूसरे के नागरिक अधिकारों का सम्मान करें। हम मोहल्लों में उत्सव मनाते, तेज-तेज लाउड स्पीकर लगाते हैं, सड़क रोककर उस पर सामाजिक धार्मिक उत्सव करते हैं। जहां भी जगह मिलती है, वहां थूक देते हैं, पेेशाब करते हैं। जो भी नियम बनाते हैं, उनका उल्लंघन सबसे पहले सबसे सक्षम पावरफुल लोग करते हैं।