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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -खेला होबे...किस तरह का खेला होबे

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -खेला होबे...किस तरह का खेला होबे

-सुभाष मिश्र
पश्चिम बंगाल के चुनाव के दौरान हमें एक शब्द बहुत बार सुनाई दिया है। वो है खेला होबे।  देबांग्शु भट्टाचार्य के लिखे बोल हैं, ''बैरे ठेके बरगी ऐशे नियम कोरे प्रति माशे आमियो आची, तुमियो रोबे। बंधु एबर खेला होबे। (हर महीने बाहर से आये लुटेरे राज्य में आ रहे हैं, लेकिन हम उनका सामना करने को तैयार हैं, खेल चालू है) आज खेला होबे नारा बंगाल चुनाव का सबसे मशहूर स्लोगन बन गया है। टीएमसी के प्रवक्ता देबांग्शु भट्टाचार्य का लिखा यह खेला होबे को सबसे पहले बंगाल टीएमसी के नेता अनुब्रत मंडल ने गाया था। वहीं बीजेपी इस स्लोगन के खिलाफ चुनाव आयोग में शिकायत भी करा चुकी है। देबांग्शु भट्टाचार्य ने जनवरी में मूल रूप से यह गीत लिखा था और यूट्यूब पर अपलोड किया था।

बंगाल में चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा 'दीदी, ओ, दीदी, भ्रष्टाचार का खेला चोलबे ना दीदी।
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि अरे दीदी आप हमें क्या डराती हो, खेला होबे से हम डर जाएंगे क्या दीदी आपको मालूम नहीं है, बंगाल का छोटा बच्चा भी फुटबॉल खेलता है, आपके खेला होबे से कोई नहीं डरता।

 'खेला होबेे के संदर्भ में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा, 'उनका खेला हो चुका अब 'विकास होबे और 'डेवलपमेंट होबे की बारी है।
एक जनसभा में ममता बनर्जी ने कहा, ''खेला होबे, आमी गोलकीपर। देखी के जेते (खेल चल रहा है, मैं गोलकीपर हूं, देखते हैं कि कौन जीतता है)।
प्रशांत किशोर ने कहा है कि खेला होबे का सीधा मतलब है कि बंगाल में इस बार खेल होगा।   बीजेपी जब चुनाव लड़ती है, तो अपने सामने वाली पार्टी को तोड़ती है। इसके बाद जीत का गलत दावा करने लगती है, जिससे माहौल खराब हो जाए खेला होबे का नारा इसलिए दिया है कि तुम कुछ भी कर लो, लेकिन तुम्हारे साथ खेला होगा।

इस समय पूरे देश में अलग-अलग तरह का खेला हो रहा है। खेल की जब बात आती है तो उसमें एक अनुशासन होता है, एक नियम होता है, एक प्रक्रिया होती है और टीम भावना होती है। खेल में एक दूसरे को नीचा दिखाने की कहीं कोई गुंजाईश नहीं होती किन्तु ये जो खेला होबे की बात हो रही है तो इसमें राजनीतिक पार्टियां एक अलग तरह का खेल खेल रही है और ये खेल अलग-अलग स्तर पर जारी है। जहां भाषा और आचरण की कोई मर्यादा नहीं है। इन दिनों मीडिया के जरिये गंभीर से गंभीर आंदोलन मुद्दे को हल्के-फुल्के मनोरंजक खेल में तब्दील करने की कोशिशें की जा रही है। टीवी डिबेट के जरिये डब्ल्यू डब्ल्यू ई वाली फाइटिंग दिखाई जाती है।

कोरोना संक्रमण के चलते आज से एक साल पहले लॉकडाउन लगा था जिस पर बहुत खेला हुआ और अभी भी हो रहा है। कभी केन्द्र सरकार ने इसका क्रेडिट लेने का खेल खेला, कभी राज्यों के पाले में बॉल डाल दी गई फिर प्रशासन के लोगों ने भी इस दौरान मनचाहा खेला। कोरोना संक्रमण से बचाव और उससे उत्पन्न स्थितियों से निपटने के लिए जो गंभीरता होनी चाहिए थी वह नहीं दिखी। इसके नियम होने चाहिए थे उसका पालन भी नहीं हुआ और सर्वाधिक इसका उल्लंघन जिम्मेदार लोगों ने ज्यादा किया। बहुत से अस्पताल, होटल, दवा कंपनियों ने भी इस दौरान बहुत खेला किया।

पिछले दिनों केन्द्र सरकार ने आप पार्टी की दिल्ली सरकार को परेशान करने के लिए उपराज्यपाल के माध्यम से बहुत से उपाय किए। अरविन्द केजरीवाल के मफलर से लेकर उनके खांसने को लेकर सोशल मीडिया पर मजाक बनाया और उनकी छवि मसखरे की बनाने की कोशिश की। जिस तरह की कोशिश राहुल गांधी और बहुत सारे नेताओं की छवि धूमिल करने के लिए की गई थी। यह भी एक सुनियोजित तरीके का खेल था। इसके बाद एक नये तरीके का खेल आया जब कोरोना वायरस दिल्ली पहुंचा तो इसे फैलाने का आरोप अल्पसंख्यक समुदाय पर लगाकर देश को हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर लड़ाने का खेल खेला गया। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपनी कृत्रिम छवि को तोड़ते हुए लगातार अच्छा काम किया और वे जीत कर आ गए तो केंद्र सरकार ने एक बार फिर उपराज्यपाल के साथ टकराहट की स्थिति पैदा कर दी। सुप्रीम कोर्ट में पांच जजों की बैंच ने ये फैसला दे दिया कि उपराज्यपाल एडमिनिस्ट्रेटर हैं और वो चुनी हुई सरकार को नहीं डिस्टर्ब कर सकते। तो थोड़े दिन चुप रहने के बाद केन्द्र की ओर से एक और खेल संसद में कानून लाकर खेला जा रहा है। जिसमें उपराज्यपाल को दिल्ली का सर्वेसर्वा बताकर चुनी हुई सरकार को हाशिए पर डालने की कोशिश हो रही है, ये भी एक तरह का खेला है। दूसरी तरफ हम देखते हंै कि मुंबई में जब शिवसेना और भाजपा का गठबंधन था तो सब कुछ ठीक था और जब ये गठबंधन टूट गया और एनसीबी कांग्रेस और शिवसेना ने गठबंधन बनाकर सरकार बना ली तो केन्द्र सरकार की बहुत सारी एजेंसियां एक अलग तरह का खेला खेलने लगी। केंद्र सरकार की ओर से खेले जाने वाले दांव-पेंच से भरे इस खेल में केंद्रीय एजेंसियां गोदी मीडिया भी सरकार की तरफ से खेल का हिस्सा बन गई। केंद्र सरकार की टीम की ओर से कभी सीबीआई ने तो कभी ईडी ने भी रोल अदा किया। सुशांत सिंह राजपूत की मौत होती है उसको लेकर भी मीडिया सारी जरूरी मुद्दों को दरकिनार कर लंबे समय तक इसे ही मुद्दा बनाती है और जब इस खेल की धार कमजोर होने लगती है तो वह फिल्मी लोगों के नशे का खेल चालू कर देती है। देश में जरूरी मुद्दों पर जो गंभीरता दिखाई जानी चाहिए वह मीडिया से गायब हो रही है और बयानबाजी का खेल जारी है। यह एक दूसरे को नीचे दिखाने का दौर है। मीडिया देश के मूल मुद्दों को भटकाकर जनता को भरमाने के काम में लगा हुआ है। हालिया घटनाक्रम में  मुंबई के पुलिस कमिश्नर ने अपने पद से हटने के बाद जो चिट्ठी लिखी और जिस तरह के ऑपरेशन और वसूली की बातें बताई वह भी एक तरह से सत्ता का खेल ही है। सत्ता किसी भी पार्टी की हो, पूरे देश में तबादला पोस्टिंग सत्ता का प्रिय खेल होता है और ये खेल पूरे देश में एक सिस्टम के तहत खेला जाता है। इस खेल को अधिकांश लोग जानते हैं और चुप रहते हैं। सब जानते हैं कि जो सरकार आती है तबादला, पोस्टिंग को अपना औजार समझती है ये उपयोग धंधे के रूप में बहुत सालों से फल-फूल रहा है ये कोई नई बात नहीं है।

जो ताकतवर है वो खेल के नियम अपने हिसाब से बना रहा है कभी वो उन लोगों के विरोध में बात करता है तो कभी उनको लगता कि नई ये मुझे शूट करता है तो वे नये नियम के पक्ष में बात करता है जो संविधान को अपने तरह से व्याख्यायित करता है। अब नये तरह का खेल टीवी स्क्रीन के जरिए बिना दर्शकों के क्रिकेट में खेला जा रहा है। स्टेडियम खाली है पर मैच हो रहा है। यह मैच दर्शकों से ज्यादा विज्ञापनदाताओं का है, कार्पोरेट कंपनियों का है जिन्हें मैच के बहाने अच्छी खासी कमाई हो रही है।

पूरी दुनिया में तबाही मचाने वाले कोविड-19 वायरस को लेकर जितनी हाय तौबा मची, उसके पहले भी बहुत सारी बीमारियां आई इससे अधिक लोग इबोला से मरे पर उतना शोर नहीं मचा क्योंकि मरने वाले गरीब और अश्वेत थे। जब यह बीमारी अमेरिका और यूरोपियन देश के माध्यम से फैली तो इसका खेल भी विश्वव्यापी हो गया। जब कोरोना की वैक्सीन आ गई तो लोगों को लगा कि अच्छे दिन आ गए हैं। यह अच्छे दिन ज्यादा दिन नहीं रहे और इस बीच में कोरोना की सेकंड लहर आई जो पहले से ज्यादा खतरनाक है। अभी 20 राज्य इसकी चपेट में हैं और यह तेजी से फैल रहा है। हम पिछले साल इन दिनों जहां थे उससे भी खराब स्थिति में आज खड़े हंै। यह खेल भी किसी के समझ में नहीं आ रहा है। सब अपने-अपने ढंग से इससे निपटना चाहते हैं। सरकार को कोरोना के मामले में जो संजीदगी दिखानी चाहिए थी, वो नहीं दिखाई।

आने वाले समय में हो सकता है कि नये तरह का खेला हो। प्रजातंत्र में जिसमें मतदाता की कोई भूमिका ना हो जैसा कि इन दिनों दिख रहा है। चुनी हुई सरकार की कोई भूमिका नहीं है, उपराज्यपाल खुद सरकार है। ऐसे समय बर्तोल्त ब्रेख्त की एक कविता याद आती है-
अखबार का हॉकर सड़क पर चिल्ला रहा था कि
सरकार ने जनता का विश्वास खो दिया है
अब कड़े परिश्रम, अनुशासन और दूरदर्शिता के अलावा
और कोई रास्ता नहीं बचा है
एक रास्ता और है कि
सरकार इस जनता को भंग कर दे
और अपने लिए नई जनता चुन ले