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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - असहमति और विरोध को दबाने की कोशिश

 प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - असहमति और विरोध को दबाने की कोशिश

-सुभाष मिश्र
हमारा संविधान हमें अभिव्यक्ति की आजादी के साथ विरोध-प्रदर्शन का भी अधिकार देता है। सरकारें अपने खिलाफ होने वाले विरोध-प्रदर्शन को दबाने अंग्रेजों के समय कानून की धारा जिसे भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए (देशद्रोह) के रूप में सहजकर रखा गया है, उसका इस्तेमाल करके विरोध का स्वर दबाना चाहती है। सूचना तकनीक का नया कानून भी विरोध के बढ़ते स्वर को दबाने बना है। इस कानून में जिस साइबर क्राईम की बात हुई है। वैसे क्राईम करने वालों से यह कानून दूर है। सोशल मीडिया पर छोटी-मोटी टिप्पणी करने वालों पर तो कार्यवाही हो जाती है किन्तु इस मीडिया के जरिए धोखाधड़ी, जालसाजी करने वाले पुलिस की गिरफ्तारी दूर रहते हैं। सोशल मीडिया के जनतांत्रिक प्लेटफार्म ट्विटर के खिलाफ जिस मुस्तैदी से उत्तरप्रदेश से पहली रिपोर्ट दर्ज कर पूछताछ हो रही है काश ऐसी मुस्तैदी धोखाधड़ी, जालसाजी के प्रकरणों में भी दिखाई गई होती।

पिछले साल जेएनयू, जामिया मिलिया विश्वविद्यालय, अलीगढ़ विश्व विद्यालय आदि में छात्र आंदोलन हुए, दिल्ली में दंगे हुए इसे लेकर पुलिस ने पक्षपात पूर्ण कार्यवाही कर कुछ लोगों पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा दर्ज कर लिया। दिल्ली हाईकोर्ट में ऐसे ही विद्यार्थियों को जमानत देते हुए कहा है कि जनतंत्र में असहमति और विरोध जताना मौलिक अधिकार है। यदि नागरिक किसी मुद्दे पर अपनी राय जाहिर करते हैं तो इससे देश को कोई खतरा नहीं है। देश के नागरिक किसी विरोध-प्रदर्शन में हिस्सा ले, सरकार से असहमत हो तो उसे आतंकी गतिविधि जैसा करार नहीं दिया जा सकता है। इस पूरे मामले में सबसे मजेदार बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने 1962 में पत्रकार केदारनाथ सिंह के मामले में पांच जजों की बेंच के जरिए कहा है कि धारा 124ए आईपीसी के तहत कथित रूप से देशद्रोही भाषण और अभिव्यक्ति को तभी दंडित किया जा सकता है जब भाषण हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था के लिए उकसाने वाला हो।

द्रोह या राजद्रोह, देशद्रोह वह होता है जिससे देश की अखंडता और संप्रभुता को खतरा होता है लेकिन असहमति इसके ठीक विपरीत लोकतंत्र में संवैधानिक अधिकार है। जब कोई सत्ता असहमति से डरने लगे इसका स्पष्ट अर्थ है कि वह लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास नहीं रखती है। जब सत्ता असहमति के स्वर को देशद्रोह के नाम पर दबाने लगे या मिटाने लगे तब सत्ता का तानाशाही चेहरा लोकतंत्र की ओट में छुप नहीं पाता है। यह पहला मौका नहीं है जब उच्च न्यायालय ने सरकार को टोका या याद दिलाया कि असहमति का प्रदर्शन लोकतांत्रिक अधिकार है। इससे राजद्रोह कहकर दबाया या मिटाया नहीं जा सकता है। यह चेतावनी एक लोकतांत्रिक सरकार के लिए बहुत लज्जा की बात है लेकिन किसी भी देश का तानाशाह हो वह लज्जा के लिहाज में तानाशाही के मार्ग से विचलित नहीं होता है। खुद के लिए एकमात्र और अखंड सत्ता का सपना उसे असहमति के तमाम स्वरों को मिटाने के लिए उत्साहित करता रहता है। कमजोर विपक्ष हमेशा किसी भी देश की उद्दंड और अराजक सत्ता को तानाशाही का सपना पूरा करने के लिए परोक्ष में मार्ग प्रशस्त करता है। किसी भी देश का तानाशाह विपक्ष रहित सत्ता का सपना देखता है और इसे पूरा करने के लिए वहां विरोध और असहमति के तमाम स्वर चाहे वे कितने भी लोकतांत्रिक हों, मिटाने में क्रूर और हिंसक तरीके अपनाने में भी नहीं हिचकता है। देश में एकदलीय सरकार का ध्येय लेकर चलने वाली सरकारें लोकतंत्र में भरोसा रखने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं को अपना परम शत्रु समझती है। न्यायालय उनकी व्यवस्था होती है लेकिन वैसे हरचंद कोशिश करते रहते हैं कि लोकतांत्रिक विरोध को मिटाने की उनकी कोशिशों में ऐसे पेंच डाल दिया जाएँ कि न्यायालय भी संवैधानिक व्यवस्था के चलते उनके रास्ते में ना आए। कहते हैं कि अपराधी कानून से खेलते हैं लेकिन जब सरकारें कानून से खेलने लग जाए और निरपराध लोगों को ऐसे कानून के अंतर्गत जेल में डाल दिए जाएं जिन्हें खुद को निरपराध प्रमाणित करने में बरसो लग जाए या फिर जीवन खत्म हो जाए ऐसी स्थिति लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक है।

केंद्र सरकार से सोशल मीडिया प्लेटफार्म ट्विटर की लड़ाई में उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद की एक घटना को लेकर जो एफआईआर दर्ज की है उसमें द वायर की पत्रकार सबा नकवी सहित ट्विटर से जुड़े दो पत्रकार और कांग्रेस के तीन नेताओं को नामजद किया गया है। सूचना प्राद्यौगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद का कहना है कि ट्विटर ने दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया। देश में 28 मई से नए दिशा निर्देश लागू हो गए हैं। सूचना प्रौद्योगिकी कानून के अनुच्छेद 79 के तहत ट्विटर को बतौर सोशल मीडिया इंटरमीडियरी या मध्यस्थ मिला संरक्षण रद्द कर दिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट व्यवस्था के बावजूद अलग-अलग राज्यों में पुलिस द्वारा धारा 124ए के तहत लोगों पर विशेषकर पत्रकारों पर प्रकरण दर्ज किये जाते हैं। हाल की घटना में वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ के खिलाफ हिमाचल के शिमला जिले के कुमारसैन थाने में 6 मई 2020 को भाजपा के एक नेता ने शिकायत दर्ज की। विनोद दुआ पर राजद्रोह, सार्वजनिक उपद्रव आदि की धाराएं लगाकर उन्हें बयान के लिए उपस्थित होने कहा गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस एफआईआर को निरस्त किया। टूलकिट मामले में छत्तीसगढ़ में पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया। जिस पर हाईकोर्ट बिलासपुर ने रोक लगाई। आंध्र प्रदेश में सत्तारूढ़ वाईएसआर कांग्रेस पार्टी से बगावत करने वाले एक सांसद के बयान को प्रसारित करने के मामले में तेलगु भाषा के दो चैनलों के खिलाफ इसी तरह की दंडात्मक कार्यवाही की गई। जिन अंग्रेजों ने भारत मे राज करने के लिए 1940 के दशक में राजद्रोह कानून को लागू किया था उन्ही अंग्रेजों ने अपने देश में इस कानून को खारिज कर दिया। हमारे यहां कहावत है अंग्रेज चले गये, औलादें छोड़ गए। अंग्रेजों की भारतीय औलादें उनसे भी ज्यादा क्रूर और निर्मम है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व के फैसलों में खलिस्तान जिंदाबाद, भारत तेरे टुकड़े-टुकड़े होंगे इंशा अल्लाह, तक के नारों को देशद्रोह नहीं माना, उसी देश में इतने सालों बाद भी छोटी-छोटी बातों पर इस राजद्रोह की धारा का उपयोग कर कार्यवाही शर्मनाक है। राजद्रोह के कानून का जिस तरह से बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है वह हमें गुलामी के दिनों की याद दिलाता है जहां विरोध का मतलब राजद्रोह होता था।
प्रसंगवश भवानी प्रसाद मिश्रा की कविता
बहुत नहीं सिर्फ चार कौए थे काले,
उन्होंने यह तय किया कि सारे उडऩे वाले
उनके ढंग से उड़े, रूकें, खायें और गायें,
वे जिसको त्यौहार कहें सब उसे मनाएं,
कभी-कभी जादू हो जाता दुनिया में,
दुनिया भर के गुण दिखते हैं औगुनिया में
ये औगुनिए चार बड़े सरताज हो गये,
इनके नौकर चील, गरुड़ और बाज हो गये।