कोरोना.काल: प्रधान संपादक सुभाष मिश्र उन हालातों को समझा रहे हैं जो 'लॉकडाउन के चलते देश में उभरे हैं. यह रिश्तों की अग्निपरीक्षा का दौर है

कोरोना.काल: प्रधान संपादक सुभाष मिश्र उन हालातों को समझा रहे हैं जो 'लॉकडाउन के चलते देश में उभरे हैं. यह रिश्तों की अग्निपरीक्षा का दौर है

सुभाष मिश्र

दुनिया के 50 से अधिक देश कोरोना वायरस की चपेट में हैं जिनमें हमारा देश भी शामिल है. दूसरी ओर इस कोरोना संक्रमण की चैन को रोकने के नाम पर पूरे देश में लॉकडाउन है नतीजन लोग घरों में बंद हैं. प्रधानमंत्री के संदेश के बाद से—जिनके पास संसाधन, रहने को घर और आवश्यक सामग्री एकत्र करने का माद्दा था, उन्होंने अपने गुजर—बसर के लिए सब एकत्र कर लिया और कर रहे हैं. इंटरनेट टीवी के ज़रिए मनोरंजन के साथ सोशल नेटवर्किंग बनाए हुए हैं किन्तु जिनके पास संसाधन, घर, रूपया—पैसा नहीं था जो शटडाउन की वजह से बेकार, बेघर हो गये हैं या जिनके मालिक ने काम से निकाल दिया है, ऐसे लोग कहाँ जायें!

जिस भगवान, अल्लाह पर उन्हें सबसे ज़्यादा भरोसा था, उसके दरवाज़े भी बंद हैं. ये लोग अब सड़कों पर लंबी—लंबी पैदल यात्रा करके, कहीं सायिकल तो कहीं रिक्शा, कहीं मालगाड़ी, ट्रक में बैठकर अमानवीय हो चुके महानगरों, शहरों से अपने-अपने गाँव—घर की ओर निकल पड़े हैं. ये जानते हुए भी कि घर का ताला उन्हें ही खोलना है और ख़ाली कनस्तरों के लिए अन्न भी उन्हें ही जुटाना है. अलग-अलग जगह फँसे और निकलने की छटपटाहट में यहाँ—वहाँ कूच करते लोगों को देखकर भारत-पाकिस्तान विभाजन का दृश्य सजीव हो रहा है. लोग सपरिवार या अकेले ही अपना झोला टंगे हुए भूखे—प्यासे निकल पड़े हैं.

कोरोना' बीमारी के संभावित ख़तरों से आगाह करते हुए देश के मुखिया सहित बहुत से लोग एक साथ समवेत स्वर में कह रहे हैं कि घर में रहो, घर में रहें, घर में रहो. सवाल तो ये है कि जिनके पास घर नहीं, खाने को अनाज नहीं, ख़रीदने को पैसे नहीं, वे कहाँ रहे, क्या ख़रीदें ! अब ऐसे लाखों लोग सारी समझाईश लॉकडाउन, कर्फ़्यू को धता बताकर, भय के बावजूद बिना किसी ऐहतिहात के झुंड के झुंड में निकल पड़े हैं अपने—अपने गाँव या घर पहुँचने की चाहत में. इन्हे कोरोना से ज़्यादा चिंता अपने भूखे, प्यासे, बिना आश्रय और बिना पहचान के मारे जाने की है.

सरकारी स्तर पर, फ़ौरी तौर पर जो भी उपाय, राहत के इंतज़ाम किये गये, वे एक खाते—पीते, घर में रह रहे व्यक्ति के लिए हैं जिसके पास अपना स्थानीयता का पहचान—पत्र है. लॉकडाउन' करते समय शायद किसी ने देश के करोड़ों लोगों के बारे में नहीं सोचा जो रोज कमाते रोज खाते हैं जिनके पास खुद के रहने की जगह नहीं है. केवल एक भरोसा है कि शहर में काम मिलेगा, पैसा मिलेगा और रहने को कोई ना कोई नारकीय खोली मिलेगी पर अब तो वो भी नहीं हैं. हमारे देश के अंत्योदय की बात करने वाले सियासतदानों की नज़र और सोच, शायद यहाँ तक नहीं पहुँची. वे सरकारें बनाने, राज्यसभा में अपनी सीटें बढ़ाने की क़वायद में लगे रहे और कोरोना चालीस दिन की गफ़लत के बाद चालीसवें की तरह पूरे देश में फैल गया. इस वायरस को आकाश मार्ग से लाने वाले हवाईयात्रियों की पहचान तो देर से करके उन्हें कवारेंटाइन' करकें सुरक्षित कर लिया गया पर उनके ज़रिये प्रभावित हो सकने वाले करोड़ों बेक़सूर ग़रीबों के बारे में लॉकडाउन' करते समय शायद किसी ने इस अमानवीय त्रासदी, पलायन के बारे में नहीं सोचा.

आज जब देश को कोरोना वायरस के तीसरे और चौथे चरण से बचाने के लिए बस, रेल, हवाई जहाज़ सेवाएं बंद कर दी गई हैं और देश, प्रदेश, ज़िले, शहर यहाँ तक की गाँव की सीमाएँ सील कर दी गई हैं तो जिस भगवान भरोसे बहुतों का जीवन चल रहा था, उसके दरवाज़े भी बंद कर दिये गये हैं, ऐसे में उन करोड़ों लोगों का क्या होगा जो अलग-अलग फँसे हैं जिनके पास खोने के लिए अपनी जान के अलावा कुछ नहीं है. ज़रा हमें ऐसे लोगों के बारे में सोचने की ज़रूरत है. समाज का रसूख़दार तबका, सिनेमा, खेल और उद्योग—धंधों के ज़रिये करोड़ों रूपये और नाम कमाने वाले लोग कहाँ हैं? क्या ऐसे समय यदि समाज का सम्पन्न तबका, कथित राष्ट्रभक्तों का, ग़रीबों के मसीहा बनने का दावा करने वाले आगे नहीं आकर अपने-अपने सुरक्षित दड़बो में बैठकर केवल बाँग देते रहेंगे तो सोचो उन ग़रीबों, मज़दूरों का क्या होगा जो अपना क़स्बा, गाँव छोड़कर शहरों, महानगरों में रोज़गार की तलाश में गये थे. जिन्होंने अपनी मेहनत मशक्त से हमारी दुनिया को बेहतर बनाया था. उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि ऐसा कठिन और अमानवीय समय आयेगा, जब उन्हें असहायता की स्थिति में इस तरह अपने क़स्बे गाँव की ओर, वापस जान हथेली पर रखकर पैदल ही पलायन करना पड़ेगा. जिन महानगरों, औघोगिक संस्थानों, उद्योग धंधों, सेवाओं को ये अपना आश्रय स्थल समझ रहे थे, वे इतने निर्दयी निकलेंगे, ऐसा इन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था.

वे शायद ऐसा सोच रहे होंगे—
“धूप के एक ही मौसम ने जिन्हें तोड़ दिया
इतने नाज़ुक तो ये रिश्ते ना बनाये होते.


आज सबको एक अदृश्य बीमारी और उससे होने वाली मृत्यु के भय ने जकड़ लिया है. सबको लग रहा है कि हम बचे तो सब बचेगा. ऐसे लोग ये भूल जाते हैं कि मुक्ति कभी भी अकेले की नहीं होती. सरकारों की अपनी सीमाएँ हैं, दायरा है, नियम प्रक्रिया है. ग़रीबों को राहत देने की लाख घोषणा के बाद भी उन्हें ही बमुश्किल मदद पहुँचेगी जोकि सरकारी योजनाओं के रजिस्टर, दस्तावेज़ों और अर्हताओं को पूरा करते हैं. आज लाखों लोग ऐसे हैं जिनके पास आधार कार्ड, राशन कार्ड नहीं है. वे फ़िलहाल कहीं के नागरिक नहीं हैं. उनकी नागरिकता उनका काम, उनकी रोज़ी रोटी थी पर उनसे यह भी छिनकर उन्हें विस्थापित कर दिया गया है और वे सड़कों पर हैं. ये संख्या धीरे-धीरे लाखों, करोड़ों में पहुँचने वाली है. कोरोना के डर से गाँव-गाँव में सीमाएँ सील करके वहाँ बाहर से किसी को नहीं आने दिया जा रहा है। जो पहुँच रहे हैं, उनके साथ टकराहट शुरू हो गई है. ऐसे बेघर, बेदर, बेसहारा हो चुके लोगों को बार-बार घर में रहने की, जहां हैं वहीं रूके रहने की समझाईश दी जा रही है. 

ये देखकर दुष्यन्त कुमार का एक शेर याद आ रहा है-
उनकी अपील है कि, हम उनको मदद करें
चाकू की पसली से गुज़ारिश तो देखिए.

केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा जनहित के नाम पर, अचानक बिना किसी तैयारी के लिए गये निर्णयों की वजह से आज बहुत से लोग अलग-अलग इलाक़ों या तो फँसे हुए हैं या फिर सड़कों पर पैदल मार्च करते दिख रहे हैं. इस भवसागर को पार कराने के लिए कोई प्रभु और प्रभु वर्ग के लोग आगे नहीं आ रहे हैं. मुसीबत में फँसे अथवा पलायन करते लोग सोच रहे हैं कि जिनकी हमने दिन—रात सेवा की, अपनी मेहनत से अपना घरबार छोड़कर जिनके साथ लगे रहे, ऐसे लोग रातोंरात कैसे बदल गये. वे ऐसे कथित शहरी और सभ्य लोगों  का आचरण, व्यवहार देखकर ये हतप्रभ हैं. सड़कों पर पैदल चलते, कहीं भूखे—दुबके बैठे लोग समझ गये हैं कि “कोई प्रभु किसी के पार नहीं उतारते, प्रजा ही उन्हें पार उतारती है और उनसे कोई उतराई भी नहीं लेती.