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नए कानून किसानों के लिए मौत का परवाना बनेंगे : हन्नान मोल्ला

नए कानून किसानों के लिए मौत का परवाना बनेंगे : हन्नान मोल्ला

रायपुर, 30 दिसंबर। हाल ही में पारित नए विवादास्पद कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमाओं पर किसान पिछले एक माह से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। सरकार द्वारा इस आंदोलन को खत्म करने के सभी प्रयास विफल हो गए हैं, क्योंकि आंदोलनरत किसान इन कानूनों की वापसी से कम पर मानने के लिए तैयार नहीं हैं।वास्तव में, भयंकर शीत लहर के बावजूद सीमाओं पर स्थित प्रदर्शन स्थलों पर उनकी संख्या हर रोज बढ़ रही है। 24 दिसम्बर को केंद्र ने विरोध कर रहे किसानों को पत्र लिखा है और कहा है कि वह सभी मुद्दों पर बातचीत करने के लिए तैयार है। सरकार का यह जवाब किसान संगठनों द्वारा बातचीत के लिए ठोस प्रस्ताव रखे जाने की मांग करने के अगले दिन ही आ गया है।

यह गतिरोध कब खत्म होगा? इसका हल क्या है? नए कृषि कानूनों का किसानों पर पड़ने वाले प्रभावों और किसानों के विरोध को जानने-समझने के लिए  अनुज ग्रोवर ने अखिल भारतीय किसान सभा (एआईकेएस) के महासचिव हन्नान मोल्ला से बात की है, जिनका कहना है कि किसानों का यह प्रतिरोध आजादी के बाद से अब तक का सबसे ज्यादा अनुशासित, लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण आंदोलन है।

उनका कहना है कि यह आंदोलन किसानों द्वारा किसानों के लिए चलाया जा रहा आंदोलन है, जिसकी एक 'धर्मनिरपेक्ष' पहचान है। वरिष्ठ किसान नेता ने सरकार पर अलोकतांत्रिक और फासीवादी होने का आरोप लगाया है। "ये कानून उनके (किसानों के) अस्तित्व के लिए चुनौती है", यह बताते हुए मोल्ला कहते हैं कि किसानों के पास तब तक विरोध करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है, जब तक कि इन कानूनों को सरकार खत्म नहीं करती।

किसानों ने इन कानूनों में संशोधन के केंद्र सरकार के प्रस्ताव को यह कहते हुए ठुकरा दिया है कि इससे ये कृषि कानून और मजबूत होंगे। केंद्र सरकार को किसानों ने जो जवाब दिया है, उसमें एक प्रमुख बिंदु ज्यादा न्यूनतम समर्थन मूल्य देने का है, जो बहुत महत्वपूर्ण है।

 हम पिछले चार सालों से ज्यादा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की मांग कर रहे हैं। वर्तमान एमएसपी एक धोखा है। वर्तमान एमएसपी के दायरे में देश के केवल 6% किसान ही आते हैं। 94% किसानों को एमएसपी नहीं मिलता। अधिकांश फसलों को एमएसपी की श्रेणी में ही नहीं रखा गया है।पंजाब और हरियाणा को छोड़कर, किसानों को कहीं भी एमएसपी के अनुसार भुगतान नहीं मिलता। किसानों को अभी वास्तविक एमएसपी का केवल एक-तिहाई ही मिल रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बार-बार कहा है कि एमएसपी जारी रहेगी, लेकिन कोई भी एमएसपी की वर्तमान प्रणाली नहीं चाहता।

क्या आप ज्यादा एमएसपी के अर्थ को समझा सकते हैं?

 प्रख्यात कृषि विशेषज्ञ एम एस स्वामीनाथन ने सी-2 + 50% फार्मूला (लागत + 50% समर्थन मूल्य देने) की सिफारिश की है, जबकि वर्तमान एमएसपी ए-2 + एफएल (फैमिली लेबर : परिवार का श्रम, जिसका भुगतान नहीं किया जाता) पर आधारित है। यह फार्मूला वास्तविक खर्च और पारिवारिक श्रम के अनुमानित लागत को ही समेटता है। मनमोहन सिंह की सरकार ने ए-2 + एफएल के फार्मूले को स्वीकार किया था। मोदी सरकार इसका ही अनुसरण कर रही है। लेकिन इस फार्मूले को भी केवल पंजाब और हरियाणा में ही लागू किया जा रहा है। उन लोगों के लिए कोई सजा नहीं है, जो इस वर्तमान फार्मूले से भी कम भाव पर फसल खरीद रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इस गतिरोध को तोड़ने के लिए सरकार और किसान संगठनों के प्रतिनिधियों को लेकर कोई कमेटी बनाई जा सकती है। आपके विचार?

सुप्रीम कोर्ट को सरकार से कहना चाहिए कि जब तक इस समस्या का कोई हल नहीं निकल जाता, तब तक वह इन कानूनों का क्रियान्वयन स्थगित रखें। हम किसी कमेटी गठन के पक्ष में नहीं है। स्वामीनाथन कमेटी की ओर देखिए, जिसने काफी पहले 2006 में अपनी सिफारिशें दी थी, लेकिन आज तक उसे लागू नहीं किया गया है। किसी भी कमेटी का गठन मुद्दों को अनिश्चितकाल तक लटकाए रखेगा। देश के किसान समुदाय के लिए ये तीन कृषि कानून मौत का परवाना है। ये कानून किसानों से खेती-किसानी छीन लेंगे और इसे कार्पोरेटों को सौंप देंगे।

कानूनों में संशोधन करने के सरकार के प्रस्ताव पर आपकी क्या आपत्तियां हैं?

 इन कानूनों में संशोधन करने मात्र से इनके उद्देश्यों में बदलाव नहीं आएगा। इन कानूनों का उद्देश्य अडानी और अंबानी के हाथों में खेलना है, जिन्होंने पहले ही भंडारण के लिए बड़े-बड़े गोदाम बनवा लिए हैं। इन कानूनों के क्रियान्वयन के बाद वे कृषि उत्पादों की सट्टाबाजारी शुरू कर देंगे। वे भारतीय खाद्य निगम को बर्बाद कर देंगे। आम जनता जिस कीमत पर आज खरीद रही है, उससे कई गुना ज्यादा कीमत पर खरीदने के लिए बाध्य हो जाएगी।

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के भारत मे अधिशासी निदेशक सुरजीत भल्ला ने एक साक्षात्कार में कहा है कि इन कानूनों से सभी किसानों को फायदा पहुंचेगा, केवल चंद किसानों को नहीं।

 यह सही नहीं है। जिन बुद्धिजीवियों को कार्पोरेटों से तनख्वाह मिलती है, वे कार्पोरेटों के पक्ष में बात करेंगे, न कि गरीबों और आम जनता के पक्ष में। वे इन कानूनों के खिलाफ हमारी लड़ाई में मददगार नहीं हो सकते।

श्री भल्ला ने किसानों के आंदोलन को मात्र विवाद पैदा करने वाला बताया है और कहा है कि ये कानून 1991 के कृषि सुधारों जितना ही महत्व रखते हैं। आपकी प्रतिक्रिया?

 यह मत भूलिए कि 1991 के सुधारों के कारण पांच लाख किसानों को आत्महत्या करनी पड़ी है। हर रोज औसतन 52 किसान आत्महत्या कर रहे हैं। हम कॉर्पोरेट दलालों का कहा मानकर मरने के लिए तैयार नहीं है। ये कानून कृषि को बर्बाद कर देंगे।

कौशिक बसु भारत के श्रेष्ठ अर्थशास्त्रियों में से एक हैं, जिन्होंने नए कृषि कानूनों को "दोषपूर्ण" और "किसानों के लिए नुकसानदेह" बताते हुए आलोचना की है। ये वही बसु हैं, जो संप्रग सरकार के समय भारत के प्रमुख आर्थिक सलाहकार थे और जिन्होंने ऐसे ही सुधारों का पक्ष लिया था, हालांकि वर्तमान सुधार ठीक वैसे ही सुधार नहीं है।

 अंततः वे इन कानूनों के दुष्परिणामों को समझ पाए हैं, भले ही इसमें उन्हें देर लगी है। जब आप किसानों के बारे में नीतियां तय करते हैं, तो आपको किसानों को केंद्र में रखना होगा।लेकिन इस सरकार ने किसानों को परिधि पर रखा है और मुनाफा, बाजार, आयात-निर्यात को केंद्र में रखा है। यह सरकार कृषि के क्षेत्र को कार्पोरेट घरानों को सौंपना चाहती हैं। बिना किसी दंडनीय कार्यवाही के सट्टेबाजी को बढ़ावा मिलेगा। जिनके पास ज्यादा भंडारण क्षमता होगी, उनका एकाधिकार स्थापित होगा।

अब आपकी मांगें क्या हैं?

 जनता की संसद में हमने दो विधेयक तैयार किये हैं। ये विधेयक लोकसभा और राज्य सभा में निजी सदस्य के रूप में पेश किए गए थे। ये विधेयक थे : किसानों को ऋणग्रस्तता से मुक्त करने संबंधी विधेयक, 2018 तथा किसानों को कृषि उत्पादों का न्यूनतम समर्थन मूल्य पाने का अधिकार संबंधी विधेयक, 2018। हमने सरकार से अनुरोध किया था कि वह इन पर ध्यान दें, लेकिन उसने कुछ नहीं किया। दो सालों के बाद, इस सरकार ने तीन अध्यादेश जारी किए, जो इस देश के किसानों को बर्बाद कर देंगे। भारत में कृषि जीवन जीने का तरीका है। इसलिए, ये नीतियां हमारे देश की विशेष परिस्थितियों के अनुकूल होना चाहिए। लेकिन यह सरकार आईएमएफ के निर्देशों पर चल रही है। सरकार को किसानों की भलाई के लिए सुधारों को लाना चाहिए, न कि उनके विनाश के लिए।

सुप्रीम कोर्ट को सरकार से कहना चाहिए कि जब तक इस समस्या का कोई हल नहीं निकल जाता, तब तक वह इन कानूनों का क्रियान्वयन स्थगित रखें। हम किसी कमेटी गठन के पक्ष में नहीं है। स्वामीनाथन कमेटी की ओर देखिए, जिसने काफी पहले 2006 में अपनी सिफारिशें दी थी, लेकिन आज तक उसे लागू नहीं किया गया है। किसी भी कमेटी का गठन मुद्दों को अनिश्चितकाल तक लटकाए रखेगा। देश के किसान समुदाय के लिए ये तीन कृषि कानून मौत का परवाना है। ये कानून किसानों से खेती-किसानी छीन लेंगे और इसे कार्पोरेटों को सौंप देंगे।

कानूनों में संशोधन करने के सरकार के प्रस्ताव पर आपकी क्या आपत्तियां हैं?

 इन कानूनों में संशोधन करने मात्र से इनके उद्देश्यों में बदलाव नहीं आएगा। इन कानूनों का उद्देश्य अडानी और अंबानी के हाथों में खेलना है, जिन्होंने पहले ही भंडारण के लिए बड़े-बड़े गोदाम बनवा लिए हैं। इन कानूनों के क्रियान्वयन के बाद वे कृषि उत्पादों की सट्टाबाजारी शुरू कर देंगे। वे भारतीय खाद्य निगम को बर्बाद कर देंगे। आम जनता जिस कीमत पर आज खरीद रही है, उससे कई गुना ज्यादा कीमत पर खरीदने के लिए बाध्य हो जाएगी।

अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के भारत मे अधिशासी निदेशक सुरजीत भल्ला ने एक साक्षात्कार में कहा है कि इन कानूनों से सभी किसानों को फायदा पहुंचेगा, केवल चंद किसानों को नहीं।

 यह सही नहीं है। जिन बुद्धिजीवियों को कार्पोरेटों से तनख्वाह मिलती है, वे कार्पोरेटों के पक्ष में बात करेंगे, न कि गरीबों और आम जनता के पक्ष में। वे इन कानूनों के खिलाफ हमारी लड़ाई में मददगार नहीं हो सकते।

श्री भल्ला ने किसानों के आंदोलन को मात्र विवाद पैदा करने वाला बताया है और कहा है कि ये कानून 1991 के कृषि सुधारों जितना ही महत्व रखते हैं। आपकी प्रतिक्रिया?

 यह मत भूलिए कि 1991 के सुधारों के कारण पांच लाख किसानों को आत्महत्या करनी पड़ी है। हर रोज औसतन 52 किसान आत्महत्या कर रहे हैं। हम कॉर्पोरेट दलालों का कहा मानकर मरने के लिए तैयार नहीं है। ये कानून कृषि को बर्बाद कर देंगे।

कौशिक बसु भारत के श्रेष्ठ अर्थशास्त्रियों में से एक हैं, जिन्होंने नए कृषि कानूनों को "दोषपूर्ण" और "किसानों के लिए नुकसानदेह" बताते हुए आलोचना की है। ये वही बसु हैं, जो संप्रग सरकार के समय भारत के प्रमुख आर्थिक सलाहकार थे और जिन्होंने ऐसे ही सुधारों का पक्ष लिया था, हालांकि वर्तमान सुधार ठीक वैसे ही सुधार नहीं है।

 अंततः वे इन कानूनों के दुष्परिणामों को समझ पाए हैं, भले ही इसमें उन्हें देर लगी है। जब आप किसानों के बारे में नीतियां तय करते हैं, तो आपको किसानों को केंद्र में रखना होगा।लेकिन इस सरकार ने किसानों को परिधि पर रखा है और मुनाफा, बाजार, आयात-निर्यात को केंद्र में रखा है। यह सरकार कृषि के क्षेत्र को कार्पोरेट घरानों को सौंपना चाहती हैं। बिना किसी दंडनीय कार्यवाही के सट्टेबाजी को बढ़ावा मिलेगा। जिनके पास ज्यादा भंडारण क्षमता होगी, उनका एकाधिकार स्थापित होगा।

अब आपकी मांगें क्या हैं?

 जनता की संसद में हमने दो विधेयक तैयार किये हैं। ये विधेयक लोकसभा और राज्य सभा में निजी सदस्य के रूप में पेश किए गए थे। ये विधेयक थे : किसानों को ऋणग्रस्तता से मुक्त करने संबंधी विधेयक, 2018 तथा किसानों को कृषि उत्पादों का न्यूनतम समर्थन मूल्य पाने का अधिकार संबंधी विधेयक, 2018। हमने सरकार से अनुरोध किया था कि वह इन पर ध्यान दें, लेकिन उसने कुछ नहीं किया। दो सालों के बाद, इस सरकार ने तीन अध्यादेश जारी किए, जो इस देश के किसानों को बर्बाद कर देंगे। भारत में कृषि जीवन जीने का तरीका है। इसलिए, ये नीतियां हमारे देश की विशेष परिस्थितियों के अनुकूल होना चाहिए। लेकिन यह सरकार आईएमएफ के निर्देशों पर चल रही है। सरकार को किसानों की भलाई के लिए सुधारों को लाना चाहिए, न कि उनके विनाश के लिए।