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स्व. दाऊ दुलार सिंग मंद्राजी छत्तीसगढ़ी संस्कृति के प्रथम ध्वजवाहक

स्व. दाऊ दुलार सिंग मंद्राजी छत्तीसगढ़ी संस्कृति के प्रथम ध्वजवाहक
  • एक अप्रेल छत्तीसगढ़ के लिए विशेष दिन

 योग मिश्र

नाचा ने कला जगत को विश्वस्तरीय कलाकार दिए हैं। उनकी अभिनय क्षमता किसी भी सर्वश्रेष्ठ कलाकार से जरा भी कम नही आँकी जा सकती, लेकिन नाचा के न जाने कितने कलाकार उच्चकोटि की कला क्षमता रखते हुए भी व्यापक रूप में नहीं जाने जाते और गुमनाम रह जाते हैं या अपने क्षेत्र तक ही जाने जाते हैं। लोकप्रियता और कीर्ति के नागर प्रतिमानों से वे परखे नहीं जा सकते। उनकी गुमनाम रचनाशीलता इतिहास के अँधेरे में गुम जाने के लिए अभिशप्त है। सदियों से ऐसे अनगिनत कलाकार हमारे समाज में जन्म लेते रहे हैं पर हम उन्हें नही जानते जिन्होंने अपना सर्वस्व कला और संस्कृति की सेवा में होम कर दिया। हमारे संस्कृति बोध को जिन्होंने परिष्कृत किया है, हमें परम्पराएँ दी हैं। सच कहा जाए तो हमारी परम्परा हमारे पुरखों का दान है। और हमारी लोक कलाएँ और लोक परम्पराएँ मंद्राजी दाऊ जैसे अज्ञात पुरखों की देन है। नाचा के अनगढ़ स्वरूप को रूप देने वाले और छत्तीसगढ़ी नाचा के खड़े-साज परम्परा के जनक स्व. मंदराजी दाऊजी की 1 अप्रेल को जयंती है। इस अवसर पर उनके गृहग्राम रवेली में उनके साथी कलाकार हर साल प्रदेश भर से जुटते रहे हैं और अपने कार्यक्रम के जरिए दाऊजी का पुण्य स्मरण करते हैं।करोना त्रासदी की वजह से इस वर्ष मंद्राजी महोत्सव स्थगित रहने वाला है। यह महोत्सव से लौटकर इस सालों बाद भी मैं भूल नहीं पाता हूँ ऐसा अद्भुत जन सहयोग से संचलित महोत्सव मैंने पहले कहीं नहीं देखा था।

छत्तीसगढ़ी नाचा के पितृ पुरूष दाऊ मंदराजी की स्मृति में प्रति वर्ष 1 अप्रेल उनके जन्म दिवस पर उनके गृह ग्राम रवेली में लोक कलाकारों मेला जुटता है। मंदराजी महोत्सव में प्रदर्शन करना छत्तीसगढ़ के हर छोटे-बड़े कलाकारों का सपना होता है। छत्तीसगढ़ से जुड़े महाराष्ट्र और उड़ीसा तक की लोक मंडलियाँ यहाँ प्रदर्शन करने आती रही हैं। छत्तीसगढ़ के एक मात्र बहुप्रतिष्ठित नाचा महोत्सव में प्रदर्शन का निमंत्रण पाना कलाकारों के बीच बड़े गौरव और प्रतिष्ठा का अवसर माना जाता है।

छत्तीसगढ़ी संस्कृति की बहुआयामी छटा के दर्शन कराने वाले इस एक मात्र महोत्सव के नियम कायदे अनुशासन बड़े ही सख्त हैं। और उतनी ही सख्ती से उसका पालन किया जाता है। यहाँ भौंड़े और उत्तेजक वेषभूषा वाले फूहड़ और स्तरहीन प्रदर्शन पूरी तरह प्रतिबंधित हैं। कभी इत्तेफाक से ऐसी स्थिति निर्मित हो भी जाती है तो प्रस्तुति फौरन रूकवा दी जाती है। मंद्राजी महोत्सव में प्रदर्शित कार्यक्रमों का एक निश्चित मापदण्ड है, जिसे छत्तीसगढ़ी संस्कृति के परम्परा के अनुरूप मनोरंजक कला संस्कृति के कलात्मक विस्तार को लक्षित करने के लिए निर्धारित किया गया है। जो इस गाँव की प्रतिष्ठित रवेली नाचा पार्टी के पुरोधा मंद्राजी दाऊ ने कभी अपने साँस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप तय किये होंगे। उसी तयशुदा कठिन अनुशासन पर पूरा रवेली ग्राम आज भी अमल करता है। क्या कार्यकर्ता, क्या दर्शक, क्या कलाकार सब नाचा परम्परा का पालन उसी तरह करते हैं जैसा कि रवेली नाचा पार्टी ने अपने दर्शकों और कलाकारों के लिए तय किये होंगे। महोत्सव में प्रस्तुति देने वाली मंडलियों को उनके कार्यक्रम के पूर्व भुगतान कर दिया जाता है। यहां किसी भी मंडली की प्रस्तुति बिना पारिश्रमिक कभी नहीं कराई जाती। यह मैंने एक बारा स्वयं अनुभव किया था जब खुमान गुरुजी मंद्राजी महोत्सव में प्रस्तुति का निमंत्रण देने एक कलाकार के पास पहुँचे थे, वहाँ मैं भी था। कलाकार उनसे अपना परिश्रमिक लेने में संकोच करता रहा, तब खुमान साव ने तपाक से कह दिया- "जा फेर मैं तोला नई बुलावंव। मोर कार्यक्रम में आना हे बाबू तो तोला मेहनताना लेना पड़ही मैं बिना पैसा वाले वाले मन ला अपन कार्यक्रम मा बुलावंव नहीं। जऊन भी थोड़ा बहुत हम दे सकथन कलाकार मन के हक के पैसा हम देथन। जब हम बिना पैइसा के खुदेच प्रोग्राम मा नई जान तो दुसर के प्रोग्राम फोकट मा कैइसे करा सकथन? महू ला अऊ तहू ला, हम सब ला ऊपर जाना हे एक दिन वोला मुँह देखाना हे।" ऐसी अख्खड़ विचारधारा वाले सीधी साफ बिना लाग लपेट के अपनी बात कहने वाले खुमान साव अपने स्वयं के खर्चे पर यह कार्यक्रम करते रहे। सरकारी अनुदान का भरोसा उन्होंने कभी नहीं पाला। मिला तो ठीक नहीं मिला तो ठीक। वे अनुदान के लिए कभी चक्कर नहीं लगा पाये। ऐसे में महोत्सव के लिए सरकारी अनुदान जुटाना उनके बस में रहा भी नहीं। और पैसे के आभाव में मंद्राजी महोत्सव की तैयारी में स्व. खुमान साव ने अपने रहते तक कोई कमी होने भी नहीं दी। 

आप विश्वास नहीं करेंगे मंद्राजी महोत्सव जिस रवेली गाँव में होता है वह शहर से पुरी तरह कटा पहुँच विहिन गाँव रहा है। लेकिन इस कार्यक्रम की भीड़ किसी बड़े मेले से कम नहीं। ग्रामीण अपने संसाधनों से यहाँ पहुँचते हैं। मंद्राजी दाऊ का यह ग्राम राजनाँदगाँव के नजदीक पड़ता है। ग्राम रवेली की नाचा पार्टी अपने नाम से कभी पूरे छत्तीसगढ़ और आसपास के प्रदेशों में खूब विख्यात रही। मंद्राजी दाऊ इस नाचा पार्टी के संस्थापक, संचालक व्यवस्थापक, चिकारावादक, संगीत मास्टर, पीर-भिस्ती-बावर्ची सब कुछ थे। उन्होंने छत्तीसगढ़ में प्रचलित खड़े साज की नाचा की लोक परम्परा में अनेकों सुधार किये और छत्तीसगढ़ी नाचा को लोकप्रिय बनाया था। छत्तीसगढ़ी नाचा को खड़े साज से बैठक साज में लाने का श्रेय मंद्राजी दाऊ को जाता है। बताया जाता है कि मंद्राजी दाऊ नाचा में हारमोनियम लेकर जब आए उस समय नाचा में खड़े होकर साजिन्दे साजा बजाया करते थे इसलिए इसे खड़े साज का नाचा कहा जाता था। मंद्राराजी नवाचार के अपने प्रयोगों से नाचा को लगातार लोकप्रिय बनाने में लगे हुए थे। उसी दौर में आजादी की चिन्गारी छत्तीसगढ़ के ग्रामों तक पहुँचने लगी थी। आजादी की बात पहुँचाने की जरूरत स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को पड़ी तो मंद्राजी दाऊ ने आजादी के संग्राम से नाचा को जोड़ लिया। 

दाऊजी अपने नाचा कार्यक्रम में तत्कालीन समाजिक बुराइयों को गम्मत के माध्यम से मनोरंजक तरीके से समाज के सामने उजागर करते थे। उनके गम्मत में प्रमुख गम्मत हैं -

 "मेहतरीन" जो छूआछूत पर आधारित था जिसे बाद में हबीब तनवीर साहब ने "पोंगा पंडित" के नाम से किया था,  जिस पर ग्वालियर में काफी विवाद भी मचा था। 

"बुढ़वा विवाह" नकल में में वृद्ध और बालिका विवाह रोकने का संदेश था। बाद में हबीब साहब ने इसे "बुढ़वा बिहाव" और "देवारिन" नकल को मिलाकर "मोर नाम दमाद गांव के नाम ससुराल" नाटक बनाया था। 

"ईरानी" गम्मत में हिन्दू-मुस्लिम एकता का संदेश होता था। "मरारिन" गम्मत में देवर-भाभी के पवित्र रिश्ते को समाज के सामने माँ-बेटे के रूप में रखा जाता था। 

दाऊजी ने १९४२ के स्वतंत्रता आन्दोलन के समर्थन में भी कुछ राष्ट्र भक्ति के गीतों को अपने कार्यक्रमों में शामिल करना शुरू कर दिया था । उनकी नाचा पार्टी में तत्कालीन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के आंदोलन का प्रभाव दिखने लगा था। इसलिए कई स्थानों पर इनके 'नाचा' पर प्रतिबंध भी लगाया गया था। मँदराजी दाऊ ने खड़े-साज की नाचा परम्परा  को बैठक-साज में तब्दील कर, हारमोनियम और चिकारा को नाचा में शामिल कर नाचा के संगीत पक्ष को सबल कर दिया था और नाचा को समय-समय पर परिष्कृत कर एक नई ऊंचाई पर ला खड़ा कर दिया था। नाचा में उनके प्रयोगों को व्यापक लोक स्वीकृति मिलने लगी थी।

उनके साथी बताते थे कि उनकी पार्टी का नाचा देखने आस पास के गांव के गांव उमड़ पड़ते थे ऐसे में चोरों की बन आती थी । 

एक बार दाऊजी को भी चोरों से सांठगांठ के संदेह में पकड़ा गया फिर असलियत सामने आने पर उन्हें छोड़ भी दिया। दाऊजी के नाचा पार्टी के कार्यक्रमों की पूर्व सूचना पुलिस को देनी पड़ती थी और गांवों में पुलिस गस्त लगाई जाती थी ताकि सूने गांव का फायदा चोर न उठा सकें। नाचा के विकास पुरूष मंदराजी दाऊ ने अपनी सारी धन-संपत्ति नाचा के जुनून के भेंट कर दी थी। 

नाचा की लोकप्रियता स्वतंत्रता संग्राम में संचार के जरिए के रूप में इस्तेमाल की जाने लगी थी। अग्रेजों की हंसी उड़ाने के लिए गढ़ा गया पात्र अंग्रेजी का 'जोकर' अब छत्तीसगढ़ी नाचा के हास्य पात्र गम्मतिहा की जगह लेकर जोकर से 'जोक्कर' हो गया। बताया जाता है रवेली नाचा पार्टी के प्रदर्शन के दौरान जहाँ नाचा होता था उसके आसपास के गाँव विरान हो जाते थे। और चोरों की बन आती थी। सूने गाँवों में नाचा देखने गये लोगों के घरों की सुरक्षा के लिए पुलिस गस्त लगानी पड़ती थी। वह समय नाचा के कलाकारों की स्टार वैल्यु का समय था। नाचा की शोहरत गाँव से निकल कर शहरों प्रदेशों और पूरे देश में फैलने लगी थी। छत्तीसगढ़ के गाँव-गाँव में अपनी-अपनी नाचा पार्टी बनने लगी। रवेली नाचा पार्टी के कई प्रमुख कलाकार ज्यादा पारिश्रमिक के लालच में मंद्राजी दाऊ का साथ छोड़ते चले गये। लेकिन जो लोग अपनी बेहतरी के लोभ में पार्टी बदलते रहे उन कलाकार ने बेहतर प्रस्ताव के लोभ में मंद्राजी दाऊ का साथ छोड़करा गये थे वहाँ भी ज्यादा दिन तक अपनी वफादारी नहीं निभाई। 

रिंगनी-रवेली नाचा पार्टी के बहुत से कलाकार रामचंद्र देशमुखजी के नाचा पार्टी से होते-होते हबीब साहब के साथ नया थियेटर में चले आये थे। मैने एक लंबा वक्त नया थियेटर में इन लोक कलाकारों के साथ गुजारा है। उन्हीं कलाकारों की जुबानी मंद्राजी दाऊ की दरियादिली और नाचा के जुनून में अपना सर्वस्व लुटाने की और उनकी फक्कड़ता की कई कहानियाँ मैंने सुनी हैं। कैसे मंद्राजी दाऊ को छोड़ गये कलाकार दाऊजी का सामना होने पर दाऊजी से संकोच करते थे? लेकिन दाऊजी फौरन उनकी दुविधा ताड़ जाथे थे। एक बार का किस्सा सुनाते हुए भुलवा राम ने बताया था कि "हमन दिल्ली से छुट्टी में अपन घर गये रेहेन। एक प्रोग्राम मा मोर आमना-सामना दाऊजी से होगे।" हमन नजर बचाके निकल जाना चाहत रहेन कि दाऊजी का कही? हमन तो ओला दू दू बेरा धोखा दे  हन। वो हमर दुविधा ला तुरतेच चीन्ह डारिस और बोलिस"- 

"दौलत तो कमाती है दुनिया पर नाम कमाना मुश्किल है।" 

"तुमन मोर चेला हव तुम्हर नाम आगू-आगू हे तो मोर नाम तुम्हर पाछू-पाछू हे।" 

बहुत से किस्से थे उनके हारमोनियम खरीदने के। टाटानगर में उनके जेल जाने और जेल में हारमोनियम बजाना सीखने और फिर नाचा कि अनेक रोचक घटनायें थीं जिसमें नाचा के स्वरूप के बदलाव के अनेक छोटी-छोटी बातें किस्से कहानियाँ की तरह उन लोगों की स्मृति से जुड़ी हुई थी। वो लोग जब गाँजे के दम के साथ धीरे-धीरे अपनी यादों की पतंगे उड़ाने लगते तो नाचा के उस दौर के किस्से मेरे सामने लहराते यादों के धागों से छूट-छूटकरा आते रहते। मैं उनकी यादों को अपनी स्मृति की चकरी में लपेटता रहता। तभी से मंद्राजी दाऊ का आकर्षण मेरे मन में जम सा गया था। पर कभी उनसे मिलने का अवसर मुझे न मिला। एक बार वो राजकुमार कालेज आये थे अपने साथियों से मिलने। "मेचका हासिस गा के" समय 1982-83 की बात होगी। नाटक के रिहर्सल के दौरान उनके जाने के बाद देवी लाल नाग ने हबीब साहब को बताया कि मंद्राजी दाऊ साईकल चलाकर 65-70 किलोमीटर राजनाँदगाँव से रायपुर अपने साथियों से मिलने चले आये थे।

काफी वक्त बाद मुझे मंद्राजी दाऊ द्वारा स्थापित छत्तीसगढ़ नाचा की कीर्ति का असर देखने जाने का अवसर प्राप्त हुआ। उनके गाँव रवेली में उनकी स्मृति में आयोजित मंद्राजी नाचा महोत्सव था। जिसमें सुनील तिवारी अपना कार्यक्रम देने जाने जा रहा था। उसने मुझे इस महोत्सव के बारे में बताया था।मैंने उससे कहा था मैं जरुर चलूँगा। मंद्राजी महोत्सव से लौटकर वाहाँ बीते समय का असर मेरे जहन में आज भी उतना ही और वैसा का वैसा बचा हुआ है। मुझे वहाँ जाकर लगा मैं कलाकारों के किसी तीर्थ स्थल में पहुँच गया हूँ। वहाँ का कड़ा अनुशासन देखकर मैं काफी हैरत में पड़ गया था। वह सब मैंने कल्पना में भी नहीं था जो मैं देख रहा था। वहाँ कलाकारों की जरूरत का मामूली से मामूली समान आयोजकों ने स्थानीय ग्रामीणों के सहयोग से जुगाड़ कर रखा था। कलाकारों की जरूरत की पूरी परवाह इस आयोजन में हर जगह व्याप्त थी। मैं इस आयोजन में साँझ से भोर तक रहा पर किसी कलाकार को मैंने किसी जरूरत के लिए भटकता नहीं पाया। सब कुछ जैसे यंत्रवत घट रहा था। एक सच्चे कलाकार की व्यवस्था में किसी कलाकार को दिक्कत हो भी कैसे सकती थी भला?

स्व खुमान साव की चाक चौबंद व्यवस्था में यह महोत्सव चलता था। जहाँ हरेक छोटे बड़े कलाकार का समान महत्व था। एक आत्मिक संतोष का वातावरण। किसी तीर्थ में प्रदर्शन का अनुभव कलाकारों और दर्शकों के लिए रवेली ग्राम में निर्मित होता था। हजारों की संख्या में दर्शक सब के सब इतने उत्साह में दिख रहे थे। जैसे पुण्य कमाने सब रवेली में जुटे हैं। इस आयोजन में कोई वीआईपी कल्चर नहीं दिखाई दिया। इस महोत्सव के आयोजक खुमान साव स्वयं बोरा पोता बिछाए नीचे मंच के सामने नाचा सीखने वाले अपने नवजवान विद्यार्थियों के साथ बैठे दिखाई दे रहे थे। खुमान साव की सारी व्यवस्था में एक समर्पित कार्यकर्ता के भाव झलकता था। वे कलाकारों की जरूरत का खुद ध्यान रख रहे थे। बीच-बीच में लोगों को निर्देश देते भी दिखाई दे जाते। रवेली में मंद्राजी महोत्सव का इंतजाम देखकर मुझे लगने लगा ऐसा इंतजाम उसी के बस में है जिसकी आत्मा कला से बहुत गहरे तक जुड़ाव रखती है।

कहने को तो हमारे शासकीय कला मर्मज्ञ भी हैं बड़े पारखी, कला के बड़े गहरे जानकार हैं। उनके मार्गदर्शन में सारे सरकारी आयोजन संपन्न किये जाते रहे हैं। जिसमें शासन का लाखों रूपया,बड़ी बेदर्दी से फूंकने के बाद भी केवल कला का मजमा लगाने के अलावा कोई ठोस कलादृष्टि अभी तक नजर नहीं आई है। इन सरकारी आयोजनों में कलाकारों की परवाह के नाम मामूली से मामूली व्यवस्था के लिए कलाकारों को जूझते देखना आम बात है। और इधर मैने मंद्राजी महोत्सव में देखा कि ये लोग अपने सीमित साधनों के बावजूद मात्र अपने कला के गहरे अनुभव और मात्र जन सहयोग के दम पर कलाकारों के प्रदर्शन के लिए सारे जरूरी आवश्यकताओं का इंतजाम बहुत बेहतय तरीके से किया था। उन्होंने कलाकारों की हर छोटी से छोटी जरूरत का ख्याल रखा था। वे सब स्वयं कलाकार हैं तो कलाकारों की जरूरत की उन्हें पहचान है। यह सब देखकर सचमुच मन को सुकून मिलता है कि अभी पृथ्वी में बेहतर करने की गुँजाईश बची हुई है। यदि मन निर्मल है और कला के प्रति सच्चे भाव का समर्पण है तो यह सब संभव है। 

मंद्राजी महोत्सव के माध्यम से छत्तीसगढ़ की कला संस्कृति को सस्ते और भौंड़े प्रदर्शन से मुक्त करने का खुमान साव का यह हठी प्रयास आगे भी वैसे ही अनुशासन के साथ जारी रहे यही मेरी कामना है। यह महोत्सव आगे भी जारी रहे हम प्रयास हम सबको भी करना होगा। खुमान साव की अनुपस्थिति में अब इस महोत्सव का स्वरूप कैसा रहेगा? आगे जारी रहता है या नहीं यह कहना अभी मुश्किल है। लेकिन रवेली ग्राम की स्वतःस्फूर्त तैयारी में जनभागीदारी का वैसा ही उत्साह कायम रहता है जैसा खुमान साव ने यहाँ तैयार कर गये हैं तो जरूर इस महोत्सव की प्रतिष्ठा वर्षों तक कायम रह सकती है। इस आयोजन की निरंतरता को बनाए रखने में आर्थिक सहयोग देकर छत्तीसगढ़ी संस्कृति के प्रमुख ध्वजावाहक मंद्राजी दाऊ की स्मृति को बरकार रखने में छत्तीसगढ़ सरकार अपन भी योगदान दे सकता है। यह संस्कृति के प्रथम व प्रमुख ध्वजावाहक के प्रति इस कृतज्ञ प्रदेश की एक सच्चे कलाकार की सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

(रंगकर्मी अभिनट फिल्म एण्ड नाट्य फाउण्डेशन छत्तीसगढ़ )