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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - देर से ही सही महिलाएं भी चुनावी मुद्दा तो बनी

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - देर से ही सही महिलाएं भी चुनावी मुद्दा तो बनी

-सुभाष मिश्र
 
प्रियंका गांधी को इस बात के लिए धन्यवाद दिया जाना चाहिए कि उन्होंने तीज-त्यौहार, नवदुर्गा और महिला दिवस और कुछ खास अवसरों पर पूछी और पूजी जाने वाली देश की आधी आबादी को उत्तरप्रदेश सहित बाकी राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव के बहाने चर्चा में लाकर मुख्य चुनावी मुद्दा बना दिया है। अब तक चुनाव में जाति, धर्म, संप्रदाय, अमीरी, गरीबी, आरक्षण, भ्रष्टाचार, राष्ट्रभक्ति, पड़ोसी देशों से युद्घ और सर्जिकल स्ट्राईक जैसे मुद्दे हुआ करते थे। महिलाओं को हमेशा से दोयम दर्जे का नागरिक समझकर कभी पति तो कभी बेटे या परिवारजनों का टिकिट कटने पर टिकिट देना या सत्ता सौंपने का श्वांग करना हमारे देश के अधिकांश राजनेता और पार्टियों का चरित्र रहा है। देश की राजनीति में ममता बैनर्जी जैसे कम ही नेता हैं जिन्होंने जमीनी स्तर पर संघर्ष करके अपनी राह चुनी हो। अधिकांश महिलाएं राजनीतिक परिवार या राजनीतिक पृष्ठभूमि या किसी ऐसे व्यक्ति का संरक्षण प्राप्त करके आगे बढ़ी है जो प्रभावशाली रहा है। महिलाओं में गजब का धैर्य और साहस होता है। उनकी नेतृत्व क्षमता घर के भीतर दिखाई देती है किंतु घर की बाहर की दुनिया से अक्सर दूर रखा जाता है। जो लोग राजनीति की गंदगी से वाकिफ हैं वे अपने घरों की औरतों को वहीं जाने से रोकते रहे हैं। ऐसे कम ही अवसर आये हैं जहां पर औरतों की नेतृत्व क्षमता और संघर्षशीलता को लेकर उन्हें टिकिट दिया जाता हो। उन्हें किसी न किसी बैशाखी की जरुरत होती है। यह बैशाखी परिवार जाति या आरक्षित सीट के रुप में होती है। ऐसे में एवजी रुप से नहीं बल्कि सीधे तौर पर महिलाओं को सत्ता सौंपने, आरक्षण देने और उन्हें एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाये जाने से स्त्री विमर्श को एक नई ताकत मिली है। इधर के चुनाव में मुफ्त में चीजें देने का चलन बढ़ा है। हर राजनीतिक पार्टी अपने चुनावी घोषणा पत्र में ऋण माफी, मुफ्त के चावल से लेकर बिजली बिल माफ जैसे वादे करती रही हैं। इधर के दिनों में अब लैपटॉप, कम्प्यूटर, टेबलेट जैसी चीजें युवाओं में बांटी जा रही हैं।

प्रियंका गांधी ने उत्तरप्रदेश में हो रहे चुनाव के लिए कांग्रेस का घोषणा-पत्र महिलाओं के लिए जारी किया है। शक्ति विधान नाम से जारी इस घोषणा में प्रियंका गांधी ने कहा है कि जब महिलाएं राजनैतिक तौर पर सशक्त होंगी, अपने अधिकारों के लिए जागरुक होंगी, जब संसद और विधानसभाओं में उनका प्रतिनिधित्व बढ़ेगा, समाज के हालात भी बदल जाएंगे। प्रियंका गांधी ने चुनावों में 40 प्रतिशत टिकटें महिलाओं को देने का ऐलान करते हुए कहा है कि कांग्रेस यह चाहती है कि टिकटों की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत हो। इस घोषणा-पत्र में महिलाओं को मनरेगा में प्राथमिकता, सरकारी पदों पर 40 प्रतिशत महिलाओं की नियुक्ति, महिलाओं के लिए 10 आवासीय खेल अकादमी, लड़कियों के लिए सांध्य विद्यालय,  महिलाओं के लिए मुफ्त बस सेवा, सस्ता ऋण,  कामकाजी महिलाओं के लिए 25 शहरों में छात्रावास, 10 हजार मानदेय, सहायता समूह को 4 फीसदी पर ऋण, राशन दुकानों में 50 प्रतिशत का संचालन महिलाओं के द्वारा, हर साल तीन गैस सिलेंडर मुफ़्त, स्नातक में नामांकित लड़कियों को स्कूटी, बारहवीं की छात्राओं को स्मार्ट फोन, प्रदेश मेंवीरांगनाओं के नाम पर 75 विद्यालयों का निर्माण, परिवार में पैदा होने वाली प्रत्येक बालिका केलिए एक एफडी और पुलिस बल में 25 प्रतिशत महिलाओं को नौकरी जैसे महत्वपूर्ण वादे किए गए हैं। ऐसा नहीं है कि महिलाओं को लेकर पहले वादे ना किये गये हों किन्तु इस तरह उन्हें प्रमुखता कभी नहंी मिली। यहां यह सवाल सालों से है।

देश में गर बेटियां मायूस हैं ,नाशाद हैं
दिल पे रखके हाथ कहिये, देश क्या आज़ाद है
आधी शिक्षा, आधी सेहत, आधी मजदूरी मिली
सब हुए आजाद पर इनको न आजादी मिली
इनकी हालत तो अभी तक, हर तरफ़ बर्बाद है

 
दरअसल, हमारे देश के पितृसत्तात्मक ढांचे में स्त्री के लिए जगह घर की चारदीवारी, चौके-चूल्हे तक और संतति को आगे बढ़ाने तक सीमित रही है। कुछ ही औरतों ने घर की दहलीज और सदियों से बनाए गए नियमों को तोड़कर अपने लिए जगह बनाई है। औरतों की आजादी का संघर्ष बहुत ही कठिन और अदृश्य है जिसे देखने के लिए एक संवेदनशील दृष्टि चाहिए। यदि हम देश की राजनीति के मौजूदा हालात और औरतों की उपस्थिति की बात करें तो फिलहाल देश की लोकसभा के सांसदों की कुल संख्या 552 में से संसद में सिर्फ 87 महिलाएं हैं। प्रदेशों की विधानसभा, विधान परिषदों की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं है। देश में महिलाओं को आरक्षण देने की तमाम कवायद के बावजूद उन्हें अभी पंचायत और नगरीय निकायों तक ही सीमित होना पड़ा है। लोकसभा, विधानसभा में आरक्षण का मामला कोई न कोई पेंच फंसाकर रोक दिया जाता है। इस बीच इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी, मीरा कुमार, नजमा हेपतुल्ला, जयललिता, सुषमा स्वराज, शीला दीक्षित, ममता बैनर्जी मायावती, वसुधंरा राजे, उमा भारती जैसी कद्दावर महिलाएं राजनीति में सक्रिय रही किन्तु महिला आरक्षण लागू नहीं हो पाया।

अब तक केवल धर्म, जाति, सोशल इंजीनियरिंग, बाहुबल, माफिया यही सारी बातें राजनैतिक चर्चा में छाई रहती थीं। अयोध्या, मथुरा, काशी करते रहते हैं। औरतें कहीं की भी हों सभी वर्गों में, स्थानों में महिलाओं के संघर्ष, उनकी  तकलीफें लगभग एक जैसी ही है। अपने अधिकारों के लिए महिलाओं को कदम-कदम पर जूझना पड़ता है। भारतीय संसद और विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व महज 15 फीसदी है। प्रियंका गांधी द्वारा जारी घोषणा पत्र के छह हिस्से हैं- स्वाभिमान, स्वावलंबन, शिक्षा, सम्मान, सुरक्षा और सेहत।  

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में जो प्रमुख मुद्दे महंगाई, बेरोजगारी, किसानों का शोषण और महिलाओं की असुरक्षा है। प्रियंका गांधी कहती हैं कि एक उज्जवला कनेक्शन देकर महिलाओं के प्रति उनकी जि़म्मेदारी ख़त्म हो गई है। महिलाओं को सशक्त करने की बात सिफऱ् कागजों और विज्ञापनों पर होती है। मैं महिलाओं को सशक्त करना चाहती हूं इसका सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि हमने 40 प्रतिशत टिकट महिलाओं को देने का फैसला किया है। क्योंकि राजनीति में पूरी भागीदारी होगी तो महिला लड़ेगी और जवाबदेही तय करेगी। देश की आधी आबादी की शक्ति अपार है, इस शक्ति को राजनीति में लाकर बहुत बदलाव आ सकता है। भूख, गऱीबी, बेरोजग़ारी और महंगाई का कोई धर्म नहीं होता और वास्तव में चुनाव के असल मुद्दे यही है। आज अधिकांश दलों के लिए यह सब दिखावे की बात है, वे सिर्फ अपनी स्वार्थसिद्धि में लगे हुए हैं।

जहां हम महिला अधिकार की बात कर रहे हैं तो ऐसे समय इलाहाबाद हाईकोर्ट का एक अहम फैसला आया है। कोर्ट ने कहा कि आश्रित कोटे से जुड़े मामलों में घर की बहू का बेटी से ज्यादा अधिकार है। कोर्ट ने ये फैसला देते हुए सरकार को आश्रित कोटे के नियमों में जल्द बदलाव करनेके लिए भी कहा है। कोर्ट ने सस्ते गल्ले की दुकान के आवंटन से जुड़े एक मामले में पुत्रवधु (विधवाया सधवा) को परिवार में शामिल करने के लिए राज्य सरकार को निर्देश दिया है। लाइसेंसधारक की मौत के बाद अब इस पर पहला अधिकार बहू का माना जाएगा। कोर्ट ने बेटी को परिवार में शामिल करने और बहू को परिवार में शामिल न करने से जुड़े एक दिशा-निर्देश को भी रद्द कर दिया। इस फैसले में पूर्णपीठ ने कहा है कि बहू को आश्रित कोटे में बेटी से ज्यादा अधिकार है।

एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि दहेज एक सामाजिक बुराई है और इसमें कोई संदेह नहीं है, लेकिन बदलाव समाज के भीतर से आना चाहिए कि परिवार में शामिल होने वाली महिला के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है और लोग उसके प्रति कितना सम्मान दिखाते हैं। शीर्ष अदालत ने इस मुद्दे पर याचिका को विधि आयोग के पास भेज दिया और कहा किसंविधान के अनुच्छेद-32 के तहत उस तरह का कोई उपाय इस न्यायालय के अधिकार क्षेत्र के बाहर है, जिसमें अनिवार्य रूप से विधायी सुधारों की आवश्यकता होती है।

पीठ ने आगे कहा कि कानून में सुधार एक आवश्यकता है, लेकिन समाज के भीतर से एक बदलाव जरूरी होगा कि हम एक महिला के साथ कैसा व्यवहार करते हैं, समाज उस महिला को कितना सम्मान देता है, जो हमारे परिवार में आती है, एक महिला का सामाजिक जीवन कैसे बदलता है। यह एक संस्था के रूप में विवाह के सामाजिक बुनियादी मूल्य से संबंधित है। साल 2020 में भारतीय सेना में महिलाओं को स्थायी कमीशन दिए जाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब तक देश की 577 बेटियां सेना में बतौर अधिकारी स्थायी कमीशन प्राप्त कर चुकी है।  

कामकाज के लिए घर से बाहर निकलने वाली महिलाओं को उनके कार्यस्थल पर विशेष रूप से उनके लिंग के आधार पर ही देखा जाता है। नौकरी के लिए इंटरव्यू में उनसे उनकी योग्यता से जुड़े सवालों से पहले ये सवाल पूछे जाते हैं, क्या नाईट शिफ्ट में काम करने से उनके घरवालों या पति को कोई आपत्ति तो नहीं होगी? क्या परिवारवालों ने उन्हें काम करने की अनुमति दे दी है?

कार्यस्थल पर होने वाली ऐसी ही यौन उत्पीडऩ की घटनाओं को रोकने के लिए साल 2013 में महिलाओं का यौन उत्पीडऩ (निवारण, निषेध एवं निदान) अधिनियम, 2013 लागू किया था जो कि सरकारी दफ़्तरों, निजी कार्यालयों, गैर सरकारी संगठनों और असंगठित क्षेत्रों पर लागू होता है पर इसके बावजूद कार्यस्थल पर होने वाले सामाजिक यौन उत्पीडऩ पर पूरी तरह रोक नहीं लग सकी। महिलाओं को लेकर जब तक हमारी सोच में तब्दीली नहीं आती और जब तक महिलाएं राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक रूप से सक्षम नहीं हो जाती तब तक महिलाओं की स्थिति में बहुत ज्यादा परिवर्तन नहीं होने वाला है।