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नोटिस बोर्ड पर भ्रष्टों की तस्वीरें

नोटिस बोर्ड पर भ्रष्टों की तस्वीरें

ध्रुव शुक्ल

अखबार के मुखपृष्ठ पर खबर है- सरकार ने यह निर्णय लिया है कि अब भ्रष्ट पुलिस अफसरों के फोटो थानों के नोटिस बोर्ड पर लगाये जायेंगे। इस आदेश का अगर विस्तार किया जाये तो पुलिस ही क्यों, पार्लियामेण्ट के नोटिस बोर्ड पर भी भ्रष्ट जन प्रतिनिधियों और मंत्रियों के फोटो लगाये जा सकते हैं। बिकाऊ दलबदलुओं के तो तुरंत लगाने चाहिए।सचिवालयों के नोटिस बोर्ड पर भ्रष्ट सचिवों की तस्वीरें प्रदर्शित की जा सकती हैं। 

कुंभ के मेले में गंगा किनारे भ्रष्ट धर्माचार्यों, स्टाक एक्सचेंज की इमारत पर भ्रष्ट व्यापारियों के चेहरों की प्रदर्शिनी भी लगायी जा सकती है। अगर उन  मतदाताओं की पहचान भी कर ली जाये जो राजनीतिक दलों के लालच में फँसकर किसी जाति और धर्म के नाम पर मतदान करके लोकतंत्र में भ्रष्ट वोटर माने जायेंगे । तो इन मतदाताओं के चित्र भी गाँव,कस्बों और शहरों के सार्वजनिक स्थानों पर लगाये जा सकते हैं।

इस आदेश का विस्तार करने में सबसे बड़ी समस्या यह है कि कौन तय करेगा ....कौन भ्रष्ट है । राज्य व्यवस्था की हालत किसी से छिपी नहीं हैं,... जहाँ अपने पक्ष के भ्रष्टों को बचाकर ही भ्रष्टों को छाँटा जाता हो वहाँ सारे भ्रष्ट चेहरे सामने कैसे आ पायेंगे? बहुत सारे फोटो नोटिस बोर्ड पर लगने से बच जायेंगे।

यह आदेश समस्या का निदान नहीं कर सकता। निदान तो यह होगा कि सरकार ईमानदारी से अपनी शक्तियों का प्रयोग करके भ्रष्ट अफसरों को निकाल बाहर करे। समाज भ्रष्ट धर्माचार्यों के पीठों और बेईमान बाज़ार का बहिष्कार करने का साहस जुटाये। समाज के नाम पर बनी हजारों संस्थाएँ लोकतंत्र के पक्ष में खड़ी होकर मतान्ध और अपराधी राजनीतिक दलों का तिरस्कार करने के लिए आंदोलन छेड़ें और जात-पाँत का बोझ ढोते मतदाताओं को नागरिक धर्म निभाने के लिए संस्कारित करें।

समस्या से मुँह फेरकर किसी का सार्वजनिक अपमान करना निदान कैसे हो सकता है। इससे बदलेगा कुछ भी नहीं,बदले की भावना ही भड़केगी,जो लोकतंत्र के लिए घातक है।