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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - सबको सन्मति दे भगवान

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - सबको सन्मति दे भगवान

-सुभाष मिश्र

जिस तरह हमारे यहां धार्मिक पुस्तकें पढऩे के कम और पूजने के ज्यादा काम आती है, उसी तरह हमारे आदर्श गीत, जीवन में अपनाने के लिए कम, सुनकर बिसरा देने के लिए ज्यादा होते हैं। सरकारी स्कूली शिक्षा के माध्यम से बच्चों को संस्कृति और जागरुक करने के लिए अक्सर पाठ्यक्रमों में ऐसी बातों का समावेश करना चाहती है, जो उनके पार्टी एजेंडों को अप्रत्यक्ष रूप से मदद करें। नई शिक्षा नीति को लेकर कुछ राजनीतिक दल, शिक्षा शास्त्री भाजपा को भगवाकरण के नाम पर घेरना चाहते हैं, वहीं भाजपा से जुड़े लोगों का कहना है कि 1984 में बनाई गई एनईपी में एक बड़ी कमी थी वह यह कि वो भारतीय मूल्यों के अनुरुप नहीं थे। अधिकांश प्रमुख राष्ट्रीय मूल्य पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं थे।

शिक्षा के क्षेत्र में अक्सर जिस तरह के नवाचार प्रयोग होते हैं, शायद ही किसी दूसरे क्षेत्र में होते होंगे। छत्तीसगढ़ सरकार ने फैसला किया है कि स्कूली बच्चों को गांधीजी के मूल्यों से जोडऩे के लिए लक्ष्मण आचार्य द्वारा लिखित उनका प्रिय भजन
रघुपति राघव राजा राम, पतित पावन सीता राम
ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान।।
तथा नरसी मेहता द्वारा लिखित भजन वैष्णव जन तो तेने कहिये जे  पीड़ पराई जाने रे, को स्कूली प्रार्थना में शामिल किया जाये। अभी स्कूलों में तीन और गीत बतौर प्रार्थना गाये जाते हैं। जिनमें एक गीत छत्तीसगढ़ का राज्य गीत है-
अरपा पैरी के धार, महानदी है अपार
एक दूसरा गीत आंतरिक शक्ति को बढ़ाने के नाम पर शामिल किया गया है।
इतनी शक्ति हमें दे ना दाता, मन का विश्वास कमजोर हो न
हम चलें नेक रस्ते पर हमसे, भूलकर भी कोई भूल हो ना
और सबसे महत्वपूर्ण है हमारा राष्ट्रगान जन-गण-मन अधिनायक, जय हे भारत भाग्य विधाता

कोरोना के डर से लगभग दो साल से अपने घर में दुबके बच्चे और उनके माता-पिता जैसे-तैसे अपने आपको समझाकर, कोरोना पर सरकारी बयानबाजी और टीके की ताकत और अपने भीतर की इम्युनिटी को इक_ा करके बच्चों को स्कूल भेजने का साहस जुटा रहे हैं। ऐसे बच्चे जिनके कंधों से बस्ते का बोझ कम करने की तमाम सिफारिशों, कवायदों के बावजूद बस्ते का बोझ बढ़ता गया है, उन्हें स्कूल भेजने की कोशिश जारी है। ऑनलाईन पढ़ाई और घर में उपलब्ध तमाम इलेक्ट्रानिक गजट दौर टीवी के जरिए बहुत सारी अनैतिक जानकारी हासिल करने वाले बच्चे, स्कूल में प्रवेश लेते ही सारी नैतिक शिक्षा ग्रहण कर लें यह सवाल मन में है। हमारे देश में बच्चों की पाठ्यपुस्तकें उनकी जरूरतों की ना होकर प्रकाशक, मुद्रक और तत्कालीन सत्ता के एजेंडे के अनुरूप होती है। यही वजह है कि पुस्तक लिखने वाले से पुस्तक छापने वाला बड़ा होता है। छत्तीसगढ़ के स्कूलों में पहले से ही भारतीय संविधान की प्रस्तावना और जरुरी अंश पढ़ाए जा रहे हैं। बच्चे और शिक्षक छत्तीसगढ़ के गांवों से और खास करके छत्तीसगढ़ की महत्वाकांक्षी योजना नरवा, गरवा, घुरवा, बाड़ी से परिचित हो इसके लिए उन्हें गांवों का भ्रमण कराकर गोठान, वर्मी कम्पोज खाद आदि बनने की प्रक्रिया दिखाई जा रही है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ के महान विभूतियों के जीवन दर्शन और संघर्ष से परिचित कराने के लिए छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार गांधीवादी दर्शन और प्रगतिशील, धर्मनिपेक्ष मूल्यों में विश्वास रखने वाले महापुरुषों की जीवनी पर आधारित किताबें स्कूलों में उपलब्ध करा रही है।

महात्मा गांधी कहते थे कि कोई पिता अपने सभी बच्चों को यदि कोई वास्तविक संपत्ति बराबर-बराबर हस्तांतरित कर सकता है तो वह है उसका चरित्र और शैक्षिक सुविधाएं। यदि हमें इस संसार में सच्ची शांति प्राप्त करनी है और युद्ध के खिलाफ सच्ची लड़ाई लडऩी है तो हमें बच्चों से शुरुआत करनी होगी और अगर बच्चे अपने सहज भोले-भाले रूप में बड़े हो सकें तो न हमें संघर्ष करना पड़ेगा और न व्यर्थ के प्रस्ताव पास करने पड़ेंगे। तब हम एक प्रेम से दूसरे प्रेम और एक शांति से दूसरी शांति तक बढ़ते चले जाएंगे, यहां तक कि विश्व में सर्वत्र शांति और प्रेम का साम्राज्य छा जाएगा जिसके लिए आज सारी दुनिया तरस रही है।
शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे बदलाव और नवाचार के बीच मैदानी स्तर पर तैनात टीचर, प्राचार्य का कहना है कि ऊपरी स्तर से बिना सोचे-समझे एक के बाद एक आदेश जारी होते हैं जिनका ग्राउंड लेबल पर क्रियान्वयन जीरो है। अभी स्कूलों को ठीक से खुले एक सप्ताह भी नहीं हुआ और शिक्षा के स्तर का आंकलन शुरू कर दिया गया। नैतिकता कोई डिब्बे में रखी चीज नहीं है। जिसे निकाला और बच्चों को दे दिया। बच्चे जो कुछ समाज जीवन में आसपास देखते सुनते हैं। उसी से चीजें, संस्कार ग्रहण करते हैं।

पाठ्यक्रम में हो रहे बदलाव को लेकर आप पार्टी का आरोप है कि मोदी सरकार भारत की धर्मनिरपेक्ष पहचान, उर्दू और अरबी शब्दों, साहित्य के गैर-हिंदू कार्यों के किसी भी संदर्भ की पाठ्यपुस्तकों को सफाई करना चाहती है।

आरएसएस-बीजेपी का हस्तक्षेप और शिक्षा पर प्रवचन धर्म के साथ शुरू और समाप्त होता है। शिक्षा सुधार के बारे में उनकी समझ भारत के इतिहास की पाठ्यपुस्तकों को उनके आख्यान के अनुरूप बदलने तक सीमित है। स्कूली शिक्षा में उनकी रूचि इस हद तक है कि वे इसके माध्यम से अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ा सकते हैं। केंद्र सरकार को स्कूलों में गिरते पढ़ाई के स्तर की चिंता नहीं है। उसे पाठ्यक्रम में बदलाव चाहिए। बीजेपी शासित राज्य शिक्षा के मामले में विशेष रूप से खराब प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन भारत सीखने के स्तर पर वार्षिक एएसईआर सर्वेक्षण डेटा में यह बात सामने आई है कि कक्षा 2 के स्तर का औसत 59 प्रतिशत बच्चे हिंदी पाठ नहीं पढ़ सकते। हरियाणा 46 फीसदी, गुजरात में 48, मध्यप्रदेश 70, महाराष्ट्र 38, उत्तरप्रदेश 77 फीसदी, राष्ट्रीय औसत 59। शिक्षा प्रशासन की बात करें तो भाजपा शासित राज्य लगातार खराब स्थिति में है।  

भाजपा से जुड़े शिक्षाविद कोठारी कहते हैं नैतिक मूल्यों के बिना कोई भी शिक्षा प्रणाली सफल नहीं हो सकती है। नई नीति उन नैतिक मूल्यों पर बनेगी जो भारत में अंतर्निहित है। छात्रों को न केवल मौलिक अधिकार बल्कि मौलिक कर्तव्यों को भी शिक्षा प्रणाली के माध्यम से सिखाया जाएगा जो प्राचीर ग्रंथों और सांस्कृतिक प्रथाओं से उधार लेता है। भारतीय ज्ञान प्रणाली को पूरी तरह से नजर अंदाज कर दिया, जो वे कहते हैं कि हजारों साल से अधिक पुरानी है। इन सब बातों के बीच जमीनी हकीकत यह है की बच्चों को इस साल जो किताबें मिली हैं वे दो वर्ष पुरानी है। अभी पाठ्यक्रम में कोई बदलाव नहीं हुआ है।

पूरी दुनिया में बढ़ रही हिंसा की घटनाओं, दिखावा पसंद संस्कृति के बीच ेमहात्मा गांधी की प्रिय प्रार्थना हो, भजन हो या दर्शन उसे किसी न किसी रूप में देश के हर कोने में पहुंचना चाहिए। नैतिकता के साथ अहिंसा का पाठ सबसे ज्यादा कोई पढ़ाता है या बताता है वो वह है गांधी जी का दर्शन। दो व्यक्तियों के बीच में कई बातों पर असहमति हो सकती है और अगर उनमें सन्मति है तो असहमति के बावजूद दोनों में एक शालीन मर्यादा युक्त व्यवहार होगा। असहमति होने के बावजूद व्यवहार में उग्रता और आक्रामकता नहीं होगी। सन्मति से सहिष्णुता आती है क्योंकि जब हमें सत्य का ज्ञान हो जाता है तो अज्ञान से उपजी उग्रता सौम्यता में बदल जाती है और व्यक्ति का व्यवहार संयत और संयमित हो जाता है। कुमति होने पर ही व्यक्ति उग्र और अराजक होता है। सन्मति के अभाव में वो संदेही, उदंड, उपद्रवी और विद्वेषी हो जाता है। कुमति वाले व्यक्ति को सद्आचरण और ईमानदारी में भी स्वार्थ नजर आता है। हर रिश्ते को वो संदेह की दृष्टि से देखता है। ऐसा व्यक्ति चाहे घर, समाज, प्रदेश या देश की कोई जिम्मेदारी संभाले तो वो लोगों का बहुत प्रिय नहीं हो पाता। सन्मति से हम जीवन में सतुलित रहना भी सीखते है। सन्मति संपन्न व्यक्ति कुछ कहने के पहले विवेक पूर्व विचार करता है। भारत जैसी वैविध्यपूर्ण संस्कृति, बहुभाषी समाज और विभिन्न संप्रदायों मान्यताओं वाले देश में कुमति कहर ढा सकती है। लोगों को उकसाने, भड़काने और लड़वाने में सन्मति शून्य व्यक्ति का ही हाथ होता है।

सन्मति के मार्ग में शांति है, संतोष है क्योंकि सन्मति से संपन्न व्यक्ति इस नश्वर जगत की सच्चाई को जानता है और मोहग्रस्त नहीं होता। बापू मोहग्रस्त नहीं थे। वो सत्य की शक्ति को और अहिंसा के प्रभाव से अच्छी तरह परिचित थे। सन्मति के अभाव में समाज और देश का सद्भाव बिगड़ता है। कुमति में तरह-तरह के उपद्रव होते है और सोच व्यक्तिवादी में समग्रता में सोचता है।

बीज को ठीक से खाद और पानी मिले तो वो विकसित होकर एक स्वस्थ फलदार पेड़ बनना है। बाल मन भी ऐसा ही है उसे अच्छे संस्कारों से पोषित करना आवश्यक है। प्रार्थना में बहुत शक्ति होती है और जिस प्रार्थना में सन्मति देने का निवेदन है उसका ये भाव भी विनम्रता पूर्ण है। छात्रों के अवचेतन मन की धरा में प्रार्थना के रूप में जब संस्कारों का बीजारोपण होता है तो यह तय है कि कालांतर में उनके व्यक्तित्व का ये संस्कार अटूट हिस्सा हो जायेंगे। बच्चे केवल छत्तीसगढ़ में ही नहीं पूरे देश में बापू का ना केवल पाठ पढ़े बल्कि उनके जीवन संघर्ष, सत्य के आग्रह और अहिंसा के उनके सिद्घांत को अपनाएं तभी भारत महात्मा गांधी के सपनों का भारत बन पायेगा।