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कल नहीं थी शरद पूर्णिमा, आज है

कल नहीं थी शरद पूर्णिमा, आज है

ध्रुव शुक्ल

अखबार ज्योतिषी भी हो गये हैं। वे दुनिया के स्टैण्डर्ड समय से आधी रात बारह बजे छपते हैं। सुबह जब हमारे घरों में आते हैं तो ताजे दिन में बासे लगते हैं। भारत में तिथि सूर्योदय के साथ उदित होती है, भले ही वह कुछ पलों के लिए ही क्यों न हो। बीच रास्ते में बदली तिथि को भारतीय पंचांग में  उदयातिथि नहीं माना जाता। आधी रात को दबे पाँव दुनिया की तारीख बदलने वाले लोग देश और काल की स्थानीयता का तिरस्कार करते हैं। अखबार  एक दिन पहले ही शरद पूर्णिमा मनवा देते हैं और हम भी तो उनके बहकावे में आकर मना लेते हैं। शायद हम अपना पंचांग देखना भूल गये हैं। हमें तो जल्दी ही खीर खाने की पड़ी है, देश-काल की स्थानीयता भले ही डूब जाये।

शरद पूर्णिमा आज है क्योंकि वह सूर्य के साथ उदित हुई है। इसका प्रमाण यह होगा कि कल चंद्रमा का प्रकाश मध्दिम था। आज वह पूर्ण प्रकाशित होगा। हमारा विश्व अग्नि-सोमात्मक है। सूर्य ( अग्नि ) अंकुरण है और चंद्र ( सोम ) अमृत है। सृष्टि के ये दो नयन हमें पिता और माता की तरह निहार रहे हैं। इनकी पलकें ही समय का निर्माण करती हैं। यही विष्णु और लक्ष्मी हैं जो जीवन को पुष्टि और समृध्दि प्रदान कर रहे हैं। ये नहीं जानते कि पृथ्वी पर देश-काल को बदलने की कौन-सी राजनीति चल रही है और कौन-सी दूकान पर क्या बिक रहा है। किसे शरद पूर्णिमा की खीर खाने की जल्दी पड़ी है।

आधी रात को अखबार के तय करने से शरद पूर्णिमा नहीं होती। वह तो सूर्योदय से निर्धारित है। शरद पूर्णिमा आज है। आज उसकी रौशनी में सुई में धागा डाला जा  सकता है। वे पुरोहित जिनने कल शरद पूर्णिमा की झूठी दक्षिणा पा ली , आज चंद्रमा की तेज रौशनी में किसी को मुँह दिखाने के लायक नहीं रहेंगे।