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संपादकीय : आदर्श सरकार-आदर्श किसान, देश के बाकी किसानों से ज्यादा खुशहाल हैं छत्तीसगढ़ के किसान!

संपादकीय : आदर्श सरकार-आदर्श किसान, देश के बाकी किसानों से ज्यादा खुशहाल हैं छत्तीसगढ़ के किसान!


केन्द्र सरकार का नया कृषि कानून उनका साथ दे या ना दे, भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली सरकार उनके हित का पूरा ख्याल रख रही है.
 

गुजरे दिनों राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बधेल बिहार विधानसभा चुनाव में प्रचार करने पहुंचे थे जहां उनकी चुनावी सभा आयोजित थी. वहां सभा को संबोधित करते हुए बघेल ने कहा कि हमारी सरकार किसानों की फसल यानि धान, समर्थन मूल्य पर खरीद रही है. यदि बिहार में कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनी तो छत्तीसगढ़ की तरह ही यहां के किसानों को भी यह लाभ हासिल हो सकेगा. बघेल के इस आश्वासन पर वहां मौजूद किसानों ने पूरा यकीन किया और तालियां बजाकर स्वागत किया. यह वाकया इसलिए जतलाया गया क्योंकि पूरे देश की तरह छत्तीसगढ़ के किसान दिल्ली में आंदोलन करने नही पहुंचे और ना ही उन्होंने राज्य को अशांत किया. इसकी बड़ी वजह यह कि हमर सरकार, हमर मुख्यमंत्री, हमारी फसल का पूरा दाम देते आए हैं और देंगे. किसानों को उनकी फसल बेचने की पूरी गारंटी मिली हुई है. फिर केन्द्र सरकार का नया कृषि कानून उनका साथ दे या ना दे, भूपेश बघेल के नेतृत्व वाली सरकार उनके हित का पूरा ख्याल रख रही है.
 
क्या यही भरोसा केन्द्र सरकार देश के किसानों में जगा सकी है! पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड सहित कम से कम छह राज्यों से किसान दिल्ली में डेरा डाले हैं. इनमें से तीन राज्यों में भाजपा का शासन है, इन तीनों राज्यों का प्रशासन ही किसानों को दिल्ली आने से रोकता हुआ दिखा है. किसानों ने पहले ही कह दिया था कि हम दिल्ली आ रहे हैं, लेकिन सरकार ने उन्हें मनाने के लिए क्या किया? प्रश्न है, आखिर देश के किसान क्यों इतने उत्तेजित हैं? उसके कुछ कारण हैं, जो बहुत वर्षों से किसानों की उपेक्षा की वजह से पैदा हुए हैं. केंद्र सरकार कोरोना के बीच ही तीन कानून ले आई. उसने कहा, पुराने कानून अच्छे नहीं हैं, नए कानूनों से किसानों का भला होगा. कृषि उत्पादों की जब कीमत बढ़ती है, तब सरकार कीमत को कम रखने के लिए निर्यात रोक देती है, आयात बढ़ा देती है. जब कृषि उत्पादों की कीमत कम रहती है, तब सरकारें किसानों को भुला देती हैं, दोनों ही स्थिति में किसानों को ही नुकसान उठाना पड़ता है.  किसानों को शिकायत है कि सरकार उपभोक्ताओं के बारे में तो सोचती है, लेकिन किसानों के बारे में नहीं. भारत में कोई भी कृषि कानून बनाते समय किसानों की स्थिति को जरूर देखना चाहिए.

जिस तेजी में राज्यसभा से ये विधेयक पारित कराए गए, उस पर भी प्रश्नचिह्न उठे थे. तब जो विरोध हुआ था, उसमें कुछ विपक्षी सांसदों को निलंबित भी कर दिया गया था. सांसदों को समझाने में भी नाकामी हासिल हुई. अव्वल तो किसानों के साथ समन्वय नहीं बनाया गया था, संवाद कायम करने की बात तो भूल ही जाएं. लंबे समय से भाजपा का सहयोगी रहा शिरोमणि अकाली दल विरोध स्वरूप सरकार व गठबंधन छोड़ गया. आप उन्हें मना नहीं पाए। नाराजगी का कारण समझने की गंभीर कोशिशें नहीं हुईं. किसानों की बड़ी शिकायत है कि उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिलेगा. सरकार बोल रही है कि मिलेगा, लेकिन उसने इसके लिए नए कानून में प्रावधान नहीं किए हैं. किसानों को लिखकर आश्वस्त नहीं किया गया है. बहुत सारे किसानों को सरकार पर यकीन है, लेकिन बहुत सारे किसान विश्वास करने को तैयार नहीं हैं. सरकार को गंभीरतापूर्वक किसानों को समझाना चाहिए था कि उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य जरूर मिलेगा. वे तो यहां तक आशंकित हैं कि उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी कम कीमत पर अनाज बेचना पडे़गा.

केन्द्र सरकार कह रही है कि ऐतिहासिक कानून है, किसानों को बिचौलियों से आजादी मिलेगी, आय दोगुनी हो जाएगी, तो किसान आखिर क्यों नहीं इस पर विश्वास कर रहे? क्योंकि ऐसे वादे बहुत सरकारों ने किए, पर ऐसा कभी हुआ नहीं है. आप जो नया कानून लागू कर रहे हैं, किसान समझते हैं कि इससे बड़ी कंपनियों को मदद मिलेगी. इनसे छोटे किसान कैसे लड़ पाएंगे? किसानों को इन बड़ी कंपनियों के सामने मजबूत करने के लिए सरकार ने क्या किया है? कौन से कानूनी प्रावधान किए हैं, ताकि किसानों की आय सुनिश्चित हो सके? क्या किसानों को विवाद की स्थिति में वकील का खर्चा भी उठाना पडे़गा? क्या हमारी सरकारों ने किसानों को इतना मजबूत कर दिया है कि वे बड़ी कंपनियों के हाथों शोषित होने से बच सकें? किसानों के बीच डर है, जिस पर सरकार को ध्यान देना चाहिए.