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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- घटनाओं को धर्म और राजनीति के चश्मे से देखने की कोशिश

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- घटनाओं को धर्म और राजनीति के चश्मे से देखने की कोशिश

-सुभाष मिश्र 

हमारे देश में होने वाली बहुत सी घटनाओं को धर्म और राजनीति के चश्मे से देखकर एक अलग-तरह का रंग देने की कोशिशें लगातार जारी है। हत्यारों की कोई जाति, धर्म, ईमान नहीं होता। वे हत्यारे ही होते हैं। बहुत बार ये हत्याएं धर्म, जाति, मजहब और कथित रूप से आजादी के नाम पर होती है। अभी हाल ही में अलगाववादी ताकतों ने एक बार फिर अंग्रेजों के फूट डालो राज करो के हथकंडे को अपनाकर जम्मू-कश्मीर में जानबूझकर चुन-चुनकर दो हिन्दुओं की हत्या की। ऐसा कृत्य करके उन्होंने देश की कट्टरपंथी ताकतों को एक बार फिर से धर्म, जाति के नाम पर एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करने की साजिश की है, जिसे समझने की जरूरत है। देश के अलग-अलग क्षेत्रों में होने वाली जातीय हिंसा इसी का सबूत है। बहुत सी स्वार्थपरक ताकतें, कथित राजनीति सामाजिक संगठन धर्म-जाति के नाम पर अपनी राजनीति करके ऐसे मुद्दों, घटनाओं की तलाश में रहती है जिससे दो समुदाय, धार्मिक मान्यताओं के लोगों के बीच हिंसा और वैमनस्यता बढ़े। इधर के दिनों में कुछ ज्यादा ही दिखाई देती है। इस काम में राजनीतिक दलों के साथ मीडिया की दुरभि संधि साफ नजर आती है।

कश्मीर में हाल ही में हुई घटना के पश्चात यह बात लोगों को सता रही है कि क्या कश्मीर के हालात फिर से 90 के दशक जैसे हो रहे हैं। इस घटना के बाद कश्मीर पंडित और अन्य अल्पसंख्यक समुदाय के लगभग 150 परिवारों ने जम्मू में शरण ली है। इसे देखकर ही हाल 1997 में राज्य सरकार ने कानून बनाकर विपत्ति में अचल संपत्ति बेचने और खरीदने के खिलाफ कानून बनाया अब तक ऐसे लगभग 1,000 मामलों का निपटारा करते हुए संपत्ति को वापस उनके असली मालिक के हवाले कर दिया गया। जम्मू कश्मीर के उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा के अनुसार घाटी से लगभग 60 हजार कश्मीरी हिन्दुओं या पंडितों का पलायन हुआ था। जिनमें से 44 हजार परिवारों ने राज्य के राहत और पुनर्वास आयुक्त के समक्ष अपना पंजीकरण कराया है। पंजीयन कराने वाले परिवारों के 44 हजार परिवारों में 40,142 परिवार हिंदू, जबकि 1,730 सिख और 2684 मुसलमान परिवार शामिल है। कश्मीर की हालिया घटना के बाद बहुत से राजनीतिक ऐसे प्रावधान किए गए हैं कि नियुक्त किए गए लाभार्थियों को सिर्फ घाटी में ही नौकरी करनी पड़ेगी। यदि वे दूसरी जगह चले जाते हैं तो फिर उनकी नौकरी खत्म हो जाएगी। आज बहुत से लोग कश्मीर की स्वायत्तता, वहां से हटाई गई धारा 370 और उसके बाद के दावों को लेकर सवाल कर रहे हैं। कांग्रेस का कहना है कि मोदी सरकार देश में वोट तो कश्मीरी पंडितों की रक्षा की दुहाई देकर बटोरती है पर उन्हें सुरक्षा देने में फेल साबित हुई है।

हमारे देश में इस समय जिन मुद्दों को लेकर राजनीतिक दलों की प्राथमिकता होनी चाहिए, वे मुद्दे दलों के कार्यकलापों, प्राथमिकताओं और मीडिया की प्रमुख खबरों से गायब है। हमारे देश में व्याप्त बेरोजगारी, महंगाई, गरीबी, निजीकरण, स्वास्थ्य, शिक्षा की स्थिति, महिलाओं के विरुद्घ होने वाले अत्याचार और गांव-गांव में बुनियादी सुविधाओं के विस्तार की जगह तात्कालिक घटनाओं राजनीतिक दलों और मीडिया के लिए मुख्य चर्चा के विषय हैं। बात चाहे सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु से जुड़े मामले की हो या फिर फिल्म स्टारों के बेटे बेटियों के ड्रग लेने से, पार्टीबाजी से जुड़ी बात हो। अधिकांश राजनीतिक दलों के प्रवक्ता टीवी चैनलों पर नूरा कुश्ती करते देखे जाते हैं। मीडिया में खबरों का विश्लेषण, पड़ताल जिस गंभीरता के साथ होनी चाहिए वह नदारद है। मीडिया खबर देने की जगह खबर बना रहा है। वो एक पीआर एजेंसी की तरह एक पार्टी विशेष के लिए कार्य करता नजर आता है। दिल्ली, मुंबई और कुछ खास शहरों में होने वाली घटनाओं, हत्याओं पर ध्यान केन्द्रित रखने वाले मीडिया को शायद नहीं पता है कि वर्ष 2010 से 2021 तक छत्तीसगढ़ में नक्सली हिंसा में 736 लोगों की मौत हो चुकी है। आये दिन सुदूर जंगल में कोई न कोई ताड़मेटला, एडसमेटा, चिंतलनार, सिलेगर जैसी घटना होती है। चूंकि, ये सारी घटनाएं राजनीतिक दलों मीडिया के लिए उस तरह की सनसनी, ब्रेकिंग न्यूज पैदा नहीं करती जैसा दिल्ली, मुंबई और आसपास के शहरों में होने वाली घटनाएं करती हैं। यही वजह है कि देश के उन राज्यों की घटनाएं जो वनों से आच्छादित है, महानगरों से और बड़े-बड़े मीडिया हाउस के पहुंच से दूर है जहां से वोटों की राजनीति को बहुत कुछ हासिल नहीं है, वहां इस तरह की घटनाएं उनके लिए बेमानी है। मामला किसान आंदोलन का हो या फिर हाथरस की घटना का हो या फिर हैदराबाद की घटना का जब भी कोई ऐसी घटना घटती है जिसे मीडिया तेजी से उठाता है उसमें उतनी ही तेजी से राजनीतिक दल बहुत से एनजीओ जुड़ जाते हैं किन्तु जैसे ही और कोई नया मुद्दा, घटना होती है। उनकी प्राथमिकता बदल जाती है। देश समाज के जो मुद्दे स्थायी है जिनसे देश प्रभावित है, उनके बारे में राजनीतिक दल उतना ही हल्ला नहीं करते आंदोलन खड़ा नहीं करते जो करना चाहिए।

हमारे देश का मीडिया, कुछ बुद्घिजीवी और राजनीतिक दल मौतों को भी हिन्दू, मुस्लिम ,सिक्ख, इसाई में बांटने में लगा हुआ है। देश में कहीं भी होने वाली जातीय और धार्मिक हिंसा के बाद जिस तरह का प्रतिरोध होना चाहिए, वह लगभग नदारद है। जो लोग थोड़ा बहुत प्रतिरोध दर्ज कराना चाहते हैं, उनकी आवाज किसी भी तरह नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर रह जाती है।
प्रसंगवश श्रीकांत वर्मा की कविता हस्तक्षेप-
कोई छींकता तक नहीं

इस डर से
कि मगध की शांति
भंग न हो जाए,
मगध को बनाए रखना है, तो,
मगध में शांति
रहनी ही चाहिए
मगध है, तो शांति है
कोई चीखता तक नहीं इस डर से
कि मगध की व्यवस्था में
दखल न पड़ जाए
मगध में व्यवस्था रहनी ही चाहिए
मगध में न रही
तो कहां रहेगी?
क्या कहेंगे लोग?
लोगों का क्या?
लोग तो यह भी कहते हैं
मगध अब कहने को मगध है,
रहने को नहीं
कोई टोकता तक नहीं
इस डर से
कि मगध में
टोकने का रिवाज न बन जाए
एक बार शुरू होने पर
कहीं नहीं रूकता हस्तक्षेप-
वैसे तो मगध निवासिओं
कितना भी कतराओ
तुम बच नहीं सकते हस्तक्षेप से-
जब कोई नहीं करता
तब नगर के बीच से गुजऱता हुआ
मुर्दा
यह प्रश्न कर हस्तक्षेप करता है-
मनुष्य क्यों मरता है?