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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - गड़े मुर्दे उखाड़ने की कोशिश

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - गड़े मुर्दे उखाड़ने की कोशिश

-सुभाष मिश्र
जब रामजन्म भूमि आंदोलन चल रहा था उस समय एक नारा भी चलन में था। अयोध्या अभी बाकी इसके बाद मथुरा काशी है। दरअसल, हमारे अधिकांश देवी-देवता को उत्तरप्रदेश की भूमि ही रास आई। यही वजह है कि चाहे भगवान राम हो, भगवान कृष्ण हो या काशी विश्वनाथ हो, सबका संबंध यूपी से है। इस समय यूपी के मुख्यमंत्री भी योगी आदित्यनाथ हैं, जो स्वयं गोरखपुरमठ के मठाधीश हैं। देवभूमि उत्तराखंड भी कभी उत्तरप्रदेश का ही हिस्सा रही है। सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें भी उत्तर प्रदेश से और देश के अधिकांश प्रधानमंत्री भी यही से चुनकर आते हैं। भविष्य में विधानसभा चुनाव भी होना है, कुछ मुद्दे कुछ चमत्कार, इमोशनल कार्ड की जरूरत सबको है । भाजपा जिस रामरथ पर सवार होकर अपनी लोकसभा की दो सीटों से आज पूरे देश में कांग्रेस मुक्त भारत का सपना देख रही है, उसे इसी धर्मध्वजा के कारण अप्रत्याशित सफलता मिली है। भाजपा और उससे जुड़े संगठन अपनी विरासत, संस्कृति और धार्मिक आस्था के नाम पर अब रामलला के साथ-साथ मथुरा काशी को भी अपने एजेंडे में रखना चाहती है। हिन्दू दिन-प्रतिदिन ज्यादा हिन्दू, ज्यादा धार्मिक हो यह कोशिश लगातार जारी है। इसके पक्ष में तर्क  देने वालों का कहना है कि जब बाकी धर्म के लोग अपनी आस्था, अपने अल्लाह, प्रभु के प्रति उतने कट्टर हैं तो हम क्यों उदार बने रहें। हम कायर नहीं हैं। हम अपने ईश्वर का अपनी धार्मिक आस्थाओं विश्वास और प्रतीकों का अपमान क्यों बर्दाश्त करें। इस समय मामला धर्म का हो या जाति का, सभी जगहों पर कट्टरपन और जातीय, धार्मिक अस्मिता को लेकर एक अलग तरह का माहौल है। संत कबीर के समय जातियों और धर्मों को मानने वालों के बीच जितना वैमनस्य, जितनी तंगदिली नहीं थी उससे ज्यादा आज है।

श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन समिति के अध्यक्ष, अधिवक्ता महेन्द्र प्रताप सिंह ने मथुरा की सिविल अदालत में दायर एक याचिका के संदर्भ में प्रार्थना पत्र देकर कहा है कि आगरा किले के दीवान-ए-खास स्थित छोटी मस्जिद की सीढिय़ों में भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमाएं दबी हैं, उन्हें वहां से निकलवाकर श्रीकृष्ण जन्मस्थान परिसर में सुरक्षित रखा जाए। उन्होंने श्रीकृष्ण जन्मस्थान परिसर से शाही मस्जिद ईदगाह हटाकर पूरी 13 एकड़ जमीन श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट को सौंपी जाए।

हमारे यहां अभी पश्चिम बंगाल, असम, केरल में हो रहे विधानसभा चुनाव के बीच जिस तरह की धार्मिक आस्थाओं का प्रकटीकरण राजनीतिक दलों द्वारा किया है वहां सभी अपने आपको ज्यादा से ज्यादा धार्मिक आस्थावान बताने में जुटे हुए हैं। धर्म की ध्वजा लिए रजनीति की फसल खूब लहलहाती है।  अपने निहित स्वार्थों के चलते आज उदार हिन्दू धर्म को मिथकीय या कर्मकांडी पक्ष में रणनीतिक आवश्यकता के तहत सीमित किया जाता है। इसका हिन्दू धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। यह धर्म के प्रति अति संकीर्ण दृष्टिकोण है जिसमें इतिहास को मिथकों से, अध्यात्म को कर्मकांड से, तर्कबुद्घि को अंध आस्था से और धार्मिक विश्वास को अतार्किक पिछलगुआपन से विस्थापित कर दिया जाता है। जनता को निर्बुद्घि, अज्ञानी और मूढ़ बनाये रखकर उनके भीतर से धर्म के सारतत्व को निकालकर अनुयायियों को एक जनसांख्यिकीय भीड़ में तब्दील कर देने की चाल जब कामयाब होने लगी तब अध्यात्म की चेतना और धर्म के उच्चतर आदर्शों को त्याग कर जनता अंधभक्ति में डूब जाती है। राम की जन्मभूमि की कथित मुक्ति के बाद अब कृष्ण की जन्मभूमि को मुक्त कराने का अभियान शुरु किया जा रहा है। आखिर यह आस्था के दोहन का राजनीतिक अभियान नहीं तो और क्या है। जाहिर है, इस रणनीति के निहितार्थ और उसके व्यवहारिक फायदे बिल्कुल स्पष्ट है। वस्तुत: यह वास्तविक मुद्दों से जनता को अलग कर मिथ्या सरोकरों की ओर मोडऩे की भी कोशिश है।  राजनीति और धर्म का रिश्ता सदियों पुराना है। राजनीति हमेशा ही अपने स्वार्थ के लिए धर्म को सीढ़ी बनाती रही है, धर्म वह कृत्य या कार्य है। संपूर्ण मानव जाति का कल्याण हो और साथ ही किसी दूसरे के हितों को ठेस भी न पहुंचे। धर्म को जीवन जीने का रास्ता बताने वाला भी कहा गया है। धर्म केवल नियम कानूनों में बंधना नहीं बल्कि धर्म इंसान को दूसरे इंसान के साथ इंसानियत का भाव बनाए रखने में मदद करता है लेकिन पिछले कुछ दशक में हम धर्म के नाम पर सियासी ताकतों को लोगों को आपस में लड़ाते देख रहे हैं। हिंदू-मुस्लिम विभाजन की परिणति बाबरी मस्जिद विध्वंस और 1992 में देश भर में हुई हिंसा में हुई। इस दौर में धर्मनिरपेक्षता कोछद्मनिरपेक्षता कहते हुए उसका मज़ाक बनाया गया एवं धर्मनिरपेक्ष ताक़तों को रक्षात्मक रवैया अपनाने को विवश किया। जिस तरह पाकिस्तान में जियाउल हक के समय अहमदिया संप्रदाय के लोगों को पाकिस्तानी मुस्लिमों के लिए एक ख़तरा बताते हुए प्रचारित किया था। भारत में उसी तरह हिंदू-मुस्लिम विभाजन हेतु फूट डालो और राज करो की ब्रिटिश उपनिवेशकालीन नीति कोअपनाने की नीति अपनाई गई है।

श्रीकृष्ण जन्मभूमि और काशी विश्वनाथ मंदिर के मामले में जानकारी के अनुसार, देश कीआजादी के 4 साल बाद 1951 में श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट बनाकर यह तय किया गया कि वहां दोबारा भव्य मंदिर का निर्माण होगा। इसके बाद 1958 में श्रीकृष्ण जन्म स्थान सेवा संघ नाम की एक संस्था बनाई गई। इस संस्था ने 1964 में पूरी जमीन पर नियंत्रण के लिए एक सिविल केसदायर किया, लेकिन 1968 में खुद ही मुस्लिम पक्ष के साथ समझौता कर लिया। हिंदू पक्ष कीतरफ से दायर याचिका में प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 को भी चुनौती दी गई है। इस मांग पर ्रढ्ढरूढ्ढरू पार्टी के प्रमुख और सांसद असदुद्दीन ओवैसी कहा है कि जब कृष्ण जन्मभूमि विवाद 1968 में ही सुलझ गया था तो फिर से इस मुद्दे को क्यों उठाया जा रहा है।

बजरंग दल के संस्थापक विनय कटियार ने दीवानी मुकदमे का स्वागत किया और कहा किअयोध्या जैसे विशाल आंदोलन को कृष्ण जन्मभूमि को मुक्त करने के लिए बनाया जाना चाहिए। अयोध्या, मथुरा और काशी में तीनों मंदिरों को मुक्त करने का हमारा संकल्प है। अब जब राममंदिर का रास्ता साफ हो गया है, हम कृष्ण जन्मभूमि को मुक्त करने की दिशा में काम करेंगे। भाजपा सांसद हरनाथ सिंह यादव ने इसी तरह की भावनाओं को प्रतिध्वनित किया और कहा किमुस्लिमों को कृष्ण जन्मभूमि पर अपना दावा छोड़ देना चाहिए।  

वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद मामले पर अदालत ने सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की उस याचिका को स्वीकार कर लिया था, जिसमें सिविल कोर्ट में इस मुकदमे कोचलाने की चुनौती दी गई है। हिंदू पक्ष ने वाराणसी की उस अदालत में 351 वर्ष पुराना एकमहत्वपूर्ण कागज जमा कराया है जो काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद विवाद कीसुनवाई कर रही है, यह ऐतिहासिक दस्तावेज 18 अप्रैल 1669 को औरंगजेब के एक दरबारी कीतरफ से जारी किया गया था मूल रूप से इसे फारसी में लिखा गया था लेकिन इसका हिंदी मेंअनुवाद करके इसे अदालत में जमा कराया गया है। काशी विश्वनाथ मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है, इसलिए ये हिंदुओं की आस्था के सबसे बड़े केंद्रों में से एक माना जाताहै। यह वही काशी विश्वनाथ का मंदिर है जिसकी ड्योढ़ी पर बैठकर सुप्रसिद्घ शहनाई वादकबिस्मिल्ला खां साहब शहनाई बजाया करते थे।

चाहे मामला नागरिकता कानून का हो या मामला किसी जगत की स्थानीयता का, यह सबसमयकाल से जुड़ा है। आज जब छत्तीसगढ़ राज्य को बने 21 वर्ष हो गये हैं, तब भी कुछ लोग छत्तीसगढ़ी गैर छत्तीसगढ़ी का विवाद खड़ा करने से बाज नहीं आते। देश को आजाद हुए 74 सालहोने को है, उसके बाद भी लोग धर्म-जाति के आधार पर एक दूसरे को देशभक्ति और राष्ट्रीय पहचान ढूंढने में लगे हुए हैं। जिन लोगों को विभाजन के समय पाकिस्तान जाने की आजादी भी, वेउस समय नहीं गये तो अब क्यों जायेंगे और उन्हें कुछ कहीं जाना चाहिए। यदि हम वसुधैवकुटुंबकम की बात करते हैं और टेक्नालाजी के चलते पूरे विश्व को एक ग्लोबल विलेज के रुप में देखते हैं तो हमे अपने आपको छोटे-छोटे दायरों में बांटने का यह सिलसिला खत्म करना चाहिए।मनुष्यों के समूह को एक वोट बैंक में तब्दील करने के खेल को बंद करना होगा? धार्मिक स्थलहमारी आस्था के केन्द्र तक सीमित रहें, उन्हें राजनीति का अखाड़ा न बनने दें, यह भी हमें सोचनाहोगा वरना इतिहास के कालखंड में पीछे जाने का यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होगा। कोरोना जैसे संक्रमण ने पूरे विश्व को बता दिया है कि उसकी चपेट से कोई नहीं बच सकता। हमें अपने देखने, समझने का दृष्टिकोण बदलना होगा। हमें कवि विनोद कुमार शुक्ल की तरह व्यापकता में सोचना होगा-
दूर से अपना घर देखना चाहिए
मजबूरी में न लौट सकने वाली दूरी से अपना घर
कभी लौट सकेंगे की पूरी आशा में
सात समुन्दर पार चले जाना चाहिए
जाते जाते पलटकर देखना चाहिये
दूसरे देश से अपना देश

अन्तरिक्ष से अपनी पृथ्वी
तब घर में बच्चे क्या करते होंगे की याद
पृथ्वी में बच्चे क्या करते होंगे की होगी
घर में अन्न जल होगा की नहीं की चिंता
पृथ्वी में अन्न जल की चिंता होगी
पृथ्वी में कोई भूखा
घर में भूखा जैसा होगा
और पृथ्वी की तरफ लौटना
घर की तरफ लौटने जैसा