breaking news New

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - हताशा के बीच उम्मीद की किरण

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  - हताशा के बीच उम्मीद की किरण

-सुभाष मिश्र
समूचे हताशा भरे माहौल के बीच यह उम्मीद की किरण है कि समाज अभी पूरी तरह असंवेदनशील, मूल्यहीन या लोभी व्यापारी की तरह नहीं हुआ है। रेगिस्तान में झील की तरह इस भयानक समय में बहुत से हाथ जब मदद के लिए सामने आते हैं, तो उन्हें देखकर उम्मीद जागती है। कोरोना संक्रमण के दौरान समाज से ऐसे बहुत से संगठन, लोग आगे आये हैं, जिन्होंने बिना जान-पहचान के अपना हाथ मदद के लिए बढ़ाया है। यह काम किसी सीएसआर, किसी लाभ या समाज जीवन में अपनी परोपकारी छबि निर्मित कर वोट बैंक में बदलने की गरज से नहीं किया जा रहा है। नि:स्वार्थ भाव से समाज के प्रति उपजे दर्द की वजह से बहुत से लोग वैष्णव जन की भावना से यह सब कर रहे हैं।

यह सही है कि मौजूदा दौर के कोरोना महामारी की रोकथाम के लिए किए जा रहे प्रयास संसाधनों की कमी के चलते नाकाफ़ी साबित हुए हैं। हालात इतने बेकाबू हैं कि एक तरफ़ तेज़ी से संक्रमण फैल रहा है, वहीं दूसरी तरफ उससे निपटने में समूचे प्रशासन तंत्र के हाथ-पांव फूल रहे हैं। दवा और ऑक्सीजन का कृत्रिम अभाव और उसके चलते फल-फूल रही निर्मम कालाबाज़ारी, मृतकों की अंतिम क्रिया के लिये लगी कतारें, इलाज के अभाव में मरते लोगों के अस्पताल और चीरघर में पड़े शव और उनके परिजनों की आत्र्त पुकारें, मृत शरीरों की अकल्पनीय दुर्गति, मुहल्लों से लगातार गुजऱते एम्बुलेंस और शव वाहन, श्मशान में अहर्निश जलती चिताएं जिस भयावह दृश्य की रचना करती हैं, वह दु:स्वप्न से कम कम नहीं है।

इस दु:स्वप्न के भीतर हरिद्वार के कुम्भ और पाँच राज्यों के चुनाव में हुई रैलियों में जुटी भारी भीड़ के दृश्य भी शामिल हैं। दोनों को मिलाकर देखें तो एक तरफ़ कोरोना की विभीषिका की गिरफ्त में तड़पती मनुष्यता है तो दूसरी तरफ उससे बेख़बर सत्ता का संवेदनहीन तंत्र है। एक तरफ़ हाहाकार है तो दूसरी तरफ बेसुध निश्चिंतता है, मानो कुछ हुआ ही न हो और जीवन अपनी सहज गति से चल रहा हो। अप्रैल के महीने में भारतीय समाज इस क्रूर अंतर्विरोध का अभागा साक्षी रहा। आज भी हालत बहुत बदले नहीं हैं। देश भर में अस्पताल बनाने की बजाय हमारे सर्वोच्च सत्ता प्रतिष्ठान की प्राथमिकता में लगभग बीस हज़ार करोड़ रुपये की लागत से दिल्ली का निर्माणाधीन सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट है। सत्ता की निर्ममता और संवेदनहीनता की यह पराकाष्ठा है। लोग मर रहे हैं और राजा अपना महल बना रहा है। जनता का इससे बड़ा अपमान और क्या होगा लेकिन सिर्फ सत्ता तंत्र ने अकेले ही इस अमानवीय दृश्य को नहीं रचा है।

हमारे नागरिक जीवन मेंभी इस अमानवीय निष्ठुरता की अनेक परतें छिपी हुई थीं जो इस आपत्काल में उजागर हुई है। रोज़मर्रा की ज़रूरी चीजों से लेकर जीवनरक्षक दवाइयों और ऑक्सीजन की जमाखोरी फिर कई गुना दामों में उनकी बिक्री की जो भीषण खबरें रोज़ सुनाई दे रही है, वे इस बात को सूचित करती हैं कि एक समुदाय के रूप में हम विफल हुए हैं। इस लिहाज से परिदृश्य अत्यंत निराशाजनक है। संकट काल में हमारी मनुष्यता निस्संदेह कलंकित हुई है।
इस निराशाजनक और दुर्भाग्यपूर्ण सचाई का एक उजला पहलू भी है। इस अंधेरे में उजालेके स्रोत अब भी बचे हुए जान पड़ते हैं जब हम देखते हैं कि युवाओं का एक समूह कोरोनाग्रस्त परिवारों के लिए भोजन के इंतजाम में जुटा है या ऑक्सीजन सिलेंडर की व्यवस्था कर रहा है या कुछ नौजवान अपनी कार को एम्बुलेंस के रूप में नि:शुल्क चला रहे हैं। पीडि़त मनुष्यता के लिए दिल में ंसंवेदना का स्रोत सूख नहीं गया है। ऐसे लोग भी हैं जो पीडि़तों की आर्थिक सहायता के लिये भी आगे आये हैं। वे पूंजीपतियों की तरह कॉरपोरेट सोशल रेस्पोंसिबिलिटी (सी.एस.आर.) के तहत ऐसा नहीं कर रहे हैं। दूसरों की तकलीफ को अपने दिल में महसूस कर वे बिना किसी नाम और यश के ऐसा कर रहे हैं। उनकी कहानी मीडिया में अनकही रह जाए, इसकी चिंता उन्हें नहीं है। ऐसे असंख्य अनाम स्वयंसेवियों ने भारतीय समाज में परोपकार की प्राचीन परंपरा को, जिसमें श्रेय और यश का सहज तिरस्कार था, बचाये रखा है। गुप्तदान की परंपरा के पीछे केमानवतावादी दर्शन को उन्होंने सहज ही आत्मसात किया है।

कोरोना संक्रमण काल में हमे समाज के एक साथ दो चेहरे देखने मिल रहे हैं। एक चेहरा वह है जो आपदा को अवसर में बदलकर अनाप-शनाप मुनाफा कमाना चाहता है। ऐसा संवेदनहीन वर्ग नकली जीवनरक्षक दवाईयां, इंजेक्शन बनाता है। ये लोग जीवन रक्षक आक्सीजन महंगी बेचते हैं। यह वर्ग अस्पतालों में भर्ती के नाम पर मरीजों और उनके परिवारजनों को लूटते हैं। ये लोग मरे हुए व्यक्ति की लाश जलाने के लिए लकड़ी से लेकर हर चीज में अधिक दाम लेना चाहते हैं। बाजार में छोटे-बड़े दुकानदार की शक्ल में मौजूद ये लोग कालाबाजारी, मुनाफाखोरी की सारी हदें पार करके ऐसे-ऐसे उदाहरण पेश कर रहे हैं जिससे मानवता शर्मशार है। वहीं समाज का एक दूसरा सकारात्मक पक्ष है जो इस आपदा समय में सामने आया है, वह है उसका संवेदनशील, मानवीय पक्ष। जहां लोग एक दूसरे की मदद के लिए बिना प्रचार प्रसार बिना किसी स्वार्थ या एजेंडे के आगे आ रहे हैं। दरअसल, ऐसे लोग समाज जीवन में कम हो रही आक्सजीन के प्रतीक हैं।

निदा फाजली साहब का मेरा पसंदीदा शेर है-
हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिस को भी देखना हो कई बार देखना।।


गांधीजी का प्रिय भजन है वैष्णव जन तो तेने रे कहिए जो पीर परायी जाणे रे। कोरोनाकाल में नयेवैष्णव जनों दिखाई, सुनाई दिए। बहुत सारे तो ऐसे हैं, जिनका बिना किसी शोर शराबे के गुप्तदानकी परंपरा में विश्वास है। हमारे सामने अक्सर मीडिया में समाज का वीभत्स चेहरा, नकारात्मकता प्रमुखता से आती है किन्तु समाज जीवन का मानवीय चेहरा कम दिखलाई देता है।

हमेशा की तरह देश के गुरुद्वारे मानव सेवा का जो काम कर रहे हैं वह सभी धार्मिक संस्थानों औरउनसे जुड़े लोगों के लिए अनुकरणीय है। अमिताभ बच्चन ने दिल्ली के रकाब गंज गुरुद्वारे को दो करोड़ रुपये कोरोना मरीजों की देखभाल के लिए दिए। कोरोना संक्रमण में मानव सेवा के लिए सिनेमा जगत से जुड़ा एक चेहरा सर्वाधिक चर्चा में आया वह है सोनू सूद। सोनू सूद के जज्बे को देखकर देश के बहुत सारे हाथ मदद के लिए आगे आये। जिनमें सारा अली खान, सलमान खान, अक्षय कुमार, रवीना टंडन उन प्रमुख है। टीम इंडिया के कप्तान विराट कोहली और उनकी पत्नी अनुष्का शर्मा ने इन दिस दुगेदर के नाम से कैंपेन शुरू कर पांच करोड़ इकट्ठे कर और अपनी ओर से 2 करोड़ रुपए दिए हैं। दिल्ली में वॉलेंटियर्स की एक टीम प्लाज्मा डोनर्स के मरीजों कोवेबसाइट के लिए जिम्मेदारी उठा रही है इस टीम में एक प्रतिष्ठित एमएनसी में डाटा मैनेजर केतौर पर काम कर चुकी दिव्या, सविता बिष्ट, रिकित शाही, हिमांशु पंडित, आयुषी सक्सेना, अमितपुंडीर और पद्मिनी हैं। मंदसौर जिले के गांव भुन्या खेड़ी की मुल्तानपुरा सेक्टर की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता श्रीमती अर्चना परमार ने अपने और गांव वालों के सहयोग से जरूरतमंदों को गेंहू और अन्य खाद्य सामग्री वितरित किया है। लखनऊ के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में इन दिनों हाथों में नि:शुल्क शव वाहन की तख्ती लिए वर्षा वर्मा मिल जाएंगी। वर्षा हर दिन न सिर्फ शवों को अस्पताल और घरों से श्मशान घाट लेकर जाती है, बल्कि उनका अंतिम संस्कार भी कराती है। गुडग़ांंव सेक्टर 10 में रहने वाले दो सगे भाई बीपी गोयल व नवीन गोयल ने पिछले दो सालों से अपनी मां की स्मृति को बनाए रखने के लिए स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में अद्भुत काम कर रहे हैं। इसी तरह कानपुर की ग्वालटोली में रहने वाले दो भाई नीरज और संजय मरीजों को खाना खिलाने काकाम करते है उनकी कचौड़ी और मिठाईयों की दुकान है।

कोरोना संक्रमण के दौरान पुलिस का मानवीय चेहरा भी सामने आया है। टिकरापारा थानारायपुर द्वारा जरूरतमंदो को भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है। कुछ पुलिस के जवान कोरोना सेमृतको की अंत्येष्टि में सहयोग कर रहे हैं । नीलकंठेश्वर धाम परिवार की ओर से रोज शाम जरूरतमंदों को खाना बांटा जा रहा है। मंजीत कौर बल और उनकी टीम भी लगातार पिछले साल से कोरोना पीडितो की मदद में लगी हुई है। इसी तरह अग्रवाल समाज, जैन समाज, सिक्खसमाज सभी सहयोगी की भूमिका में है। यही नजारा पूरे देश का है।

द इंडिया इंस्ट्रीट्यूट आफ आर्किटेक्डस छत्तीसगढ़ चैरेटी आक्सीजन सिलेंडर और आक्सीन केसनटेटर मशीन उपलब्ध करा रहा है। इसी तरह का काम जैन समाज, ब्राम्हण समाज भी मदद कर रहा है। ये सब देखकर मन में आशा का नया संसार होता है।