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गणतंत्र में लोक की भागीदारी का उत्सव

गणतंत्र में लोक की भागीदारी का उत्सव

अजित राय

भोपाल के रवीन्द्र भवन परिसर में ईरान से आए दारूश अलंजारी और हमता बागी ने अपनी प्रस्तुति के बाद भाव विभोर होकर कहा कि कोरोना संकट से निपटने के बाद' लोकरंग' ने नया जीवन दिया है। करीब एक साल बाद वे लोग अपनी कला का प्रदर्शन कर पा रहे हैं। दारूश के गिटार एवं एक तार के सूफियाना संगीत पर एमेलिका, डायला एवं ईवा के हैरतअंगेज लोक नृत्य ने सबको अभिभूत कर दिया। दारूश बीस सालों से दुनिया भर में अपनी प्रस्तुति दे रहे हैं। वे संगीत, नृत्य एवं प्रदर्शनकारी कलाओं के प्रति बढ़ती धार्मिक कट्टरता से चिंतित हैं। वे कहते हैं कि कला का धर्म से कोई विशेष नहीं है, उल्टे कलाएं इबादत का माध्यम है।

भारत के आदिवासी और लोक कलाओं को एक मंच पर प्रस्तुत करने की कोशिश हालाकि कई बार कई जगह की जाती रही है, लेकिन ऐसी सबसे बड़ी पहल आज से करीब पैंतीस साल पहले 1986 में मध्य प्रदेश के संस्कृति विभाग की आदिवासी लोक कला एवं बोली विकास अकादमी (भोपाल) ने ' लोकरंग' के नाम से की थी जो आज भी जारी है। अब यह आयोजन अंतरराष्ट्रीय स्तर का हो चुका है जिसमें हर साल करीब 25-50 हजार लोगों की भागीदारी होती है। अकादमी के निदेशक और आदिवासी कला के विशेषज्ञ अशोक मिश्र कहते हैं कि ' लोकरंग' गणतंत्र में लोक की भागीदारी का उत्सव है।


कोरोना के कारण पिछले आठ नौ महीनों से सबकुछ ठप था। लोक कलाकार भी अपने घरों में कैद होकर रह गए थे। 36 वें लोकरंग' (26-30 जनवरी, 2021) ने उन्हें लंबे अर्से बाद मंच पर आकर अपनी कला के प्रदर्शन का अवसर दिया। इससे जमाने के बाद देशभर के लोक और आदिवासी कलाकारों को रोजगार मिला। यह लोक की ही ताकत है कि मध्यप्रदेश का कोई भी मुख्यमंत्री' लोकरंग' में आना नही भूलते। इस बार भी मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लोक और आदिवासी कलाकारों के उत्थान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने दिवंगत हुए दो आदिवासी चित्रकारों की प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। सुप्रसिद्ध गोंड कलाकार स्वर्गीय कलाबाई और भील चित्रकार स्वर्गीय पेमाफात्या के बनाए चित्रों में एक अलग संसार दिखता है। संस्कृति संचालक अदिति त्रिपाठी का कहना है कि कला में शास्त्र और लोक का समन्वय जरूरी है।

लोकरंग में देश भर के आदिवासी और लोक नृत्य की विविध परंपराओं के साथ हस्त शिल्प का भी राष्ट्रीय परिदृश्य देखने को मिलता है। देश भर से आए कारीगर जनता को यह भी बताते हैं कि वे कैसे काम करते हैं।  लोकरंग शुरू होने के पंद्रह साल बाद (2000) किसी एक राज्य की समग्र संस्कृति पर फोकस करने की शुरुआत की गई जो काफी सफल रही। 25 वें साल इसका दायरा दक्षिण एशियाई देशों तक बढ़ा दिया गया और इंडोनेशिया पर फोकस किया गया। शिल्प प्रदर्शनी और बिक्री में कई बार किसी एक विषय पर फोकस किया जाता रहा। मसलन घोड़ा, पंखा, दरी, कालीन, साड़ी, रेशम आदि। कई बार तो बिक्री दो करोड़ रुपए को पार कर गई। भोपाल की जनता साल भर लोक रंग का इंतजार करती है। गृहिणियां साल भर पैसा बचाती है और लोकरंग में खरीदारी करती है। लोक और आदिवासी कला और संस्कृति के जितने रूप हो सकते हैं, जिसमें नृत्य संगीत परिधान चित्रकारी से लेकर खान पान सब शामिल हैं, सभी यहां देखें जा सकते हैं।


36 वें लोकरंग की शुरुआत सागर के मनीष यादव की मंडली के बुंदेलखंडी लोक नृत्य संगीत से हुई और दिल्ली की रूहानी बहनों के सूफी संगीत से समापन हुआ। कश्मीर से कर्नाटक और उत्तराखंड से पश्चिम बंगाल के लोक कलाकारों की प्रस्तुतियों में एक बात सामान्य थी कि आम जनता के दुःख दर्द एक जैसे ही है। छत्तीसगढ़ के जायाराम जांगड़े के निदेशन में पांच -छह डिग्री तापमान और कंपकंपा देने वाली ठंड में भी सतनामी संप्रदाय के आदिवासी कलाकारों को नंगे बदन पंथी नृत्य करते हुए देखना विस्मयकारी है। मथुरा वृन्दावन से आए  दीपक अग्रवाल की मंडली  ने ब्रज की होली प्रस्तुत किया तो कर्नाटक के एच तीर्थप्पा ने ढोलूकुनीता नृत्य से मोहित किया। राजस्थान की गुलाबों और उसकी मंडली ने कालबेलिया नृत्य को वैसे ही अंतरराष्ट्रीय ख्याति दिलाई जैसे छत्तीसगढ़ की तीजन बाई ने पंडवानी को लोकप्रिय बनाया। पर अब जो जगह जगह स्टाइलाइज्ड फार्म में कालबेलिया की प्रस्तुतियां होती है, वह धीरे-धीरे अपनी चमक खोती जा रही है।