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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से,जैसे बोओगे वैसा ही तो काटोगे, बेचोगे

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से,जैसे बोओगे वैसा ही तो काटोगे, बेचोगे

सुभाष मिश्र :

छत्तीसगढ़ में इन दिनों धान की राजनीति चरम पर है। किसान आंदोलन के चलते पिछले पचास-पच्चपन दिनों से केंद्र की सरकार हलाकान है। पता नहीं 26 जनवरी पर कौन सी झांकी निकले? ये ठिठुरता हुआ गणतंत्र है। नये कृषि संशोधन बिल केंद्र सरकार के गले की हड्डी बन गये हैं, जिसे उसे ना तो निगलते बन रहा है और ना ही उगलते। देश के बाकी हिस्सों का किसान धान के साथ-साथ अन्य फसलें भी उगता है, किन्तु छत्तीसगढ़ का

अधिकांश किसान धान का उत्पादन करता है। यही वजह है कि खरीफ विपणन वर्ष 2021 में समर्थन मूल्य पर धान विक्रय हेतु 21 लाख 48 हजार किसानों ने पंजीयन कराया है जो गत वर्ष की तुलना में 1 लाख 93 हजार अधिक है। वर्ष 20-21 में 27 लाख 90 हजार हेक्टेयर धान के रकबे का पंजीयन किया गया, जो गत वर्ष के पंजीकृत रकबे से एक लाख चार हजार हेक्टेयर अधिक है। कहने का मतलब यह है कि धान का रकबा बढ़ रहा है और उसी के साथ धान खरीदी की राजनीति भी।

सरकार किसी की भी रही हो, सभी ने अपने -अपने समय पर धान खरीदी के लिए अच्छी व्यवस्था की। जो शिकायतें, कमियां और व्यवस्थागत त्रुटि हुई वह इतने बड़े प्रबंधन सिस्टम और कार्यप्रणाली और समिति प्रबंधक के रवैये के कारण होनी ही थी। धान के कटोरे के नाम से जाना जाने वाला छत्तीसगढ़ एक बार फिर धान की राजनीति को लेकर सुर्खियों में है।  राज्य बनने के बाद से अब तक पहली बार 20 वर्षों में सर्वाधिक धान इस वर्ष खरीदा गया है। अभी धान खरीदी के लिए 10 दिन का समय बाकी हैं। वहीं दूसरी ओर भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) ने पिछले साल की ही भांति 24 लाख मैट्रिक धान की खरीदी की ही अनुमति दी है। जबकि छत्तीसगढ़ ने 90 लाख मैट्रिक टन धान खरीदी का लक्ष्य रखा है। पता नहीं किसानों को पच्चीस सौ रुपए मैट्रिक टन की बकाया राशि कैसे दी जाएगी? इस बार तो सरकार ने यहां वहां से जुगाड़ करके किसानों को चार किस्तों में राजीव न्याय योजना की राशि उपलब्ध करा दी।

एक ओर जहां राज्य सरकार किसानों से 25 सौ क्विंटल धान खरीदने की बात कहते हुए केन्द्र पर ये आरोप लगा रही है कि उसे सहयोग नहीं मिल रहा है, वहीं दूसरी ओर वह ये भी कह रही है कि भाजपा के नेता जो धान खरीदी का विरोध कर रहे हैं वह खुद धान बेचने के लिए आगे आ रहे।  इस बात को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कांग्रेस पर राजनीति करने का आरोप लगाया है। वही कांग्रेस बीजेपी को घेरने की कोशिश कर रही है। इस मामले में भाजपा के नेताओं ने प्रदर्शन कर गिरफ्तारी भी दी है।

भाजपा किसानों से धान खरीदी के मुद्दे पर जहां कांग्रेस पर जमकर निशाना साधा रही है, वही दूसरी ओर से कांग्रेस ने 28 जिलों के 575 भाजपा नेताओं की सूची जारी की गई है, जिन्होंने हाल फिलहाल में सरकार धान खरीदी केंद्रों में अपना धान बेचा है। यहां सवाल यह है कि छत्तीसगढ़ के ज्यादातर नेता ग्रामीण क्षेत्रों से, कृषि पृष्ठिभूमि से आते हंै, उनके पास स्वयं के खेत हैं।  वे चाहे किसी पार्टी के हो यदि उन्होंने धान उगाया है तो वे धान ही बेंचेगे। धान बेंचने पर कोई रोक या पार्टी का विशेषाधिकार तो नहीं है।

धान बेचने के लिए किसान होना जरूरी है। धान की राजनीति अलग बात है और धान का उत्पादन अलग। सवाल यह है कि हमारे वो नेता जो किसान भी हैं कब बाकी फसलों की पैदावार के लिए आंदोलन करेगें, यह देखना होगा? देश के तमाम भाजपा नेता जहां एक ओर दिल्ली के किसान आंदोलन को गलत ठहराने पर तुले बैठे हैं, वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ में ये नेता किसानों के हितैषी बनकर आंदोलन करने जा रहे है। बस्तर के दंतेवाड़ा से शुरू हुआ जिसमें भाजपा के लोग उसी तरह बढ़कर हिस्सा ले रहे है जैसा कि वे इन दिनों राम मंदिर के लिए चंदा वसूली में या फिर अपने अनुशांगिक संगठनों के साथियों के साथ मिलकर तांडव जैसी वेब सीरिज को प्रतिबंधित कराने में।

देश की जनता इसी बात में उलझी रहे कि कौन उनका सच्चा हितैषी और कौन उन्हें गुमराह कर रहा है। चाहे कांग्रेस हो या फिर भाजपा दोनों ही दलों के नेता जिस धान खरीदी के नाम पर राजनीति कर रहे है, उन्हें यह समझने की जरूरत है कि छत्तीसगढ़ में बिना फसल चक्र परिवर्तन के इस समस्या को निजात नहीं पाया जा सकता।

नेताओं को धान खरीदी पर राजनीति करने की बजाय कृषि श्रम का सम्मान करते हुए किसानों के व्यापक हितों के बारे में सोचना चाहिए। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने फसल चक्र परिवर्तन का अभियान चलाया था किन्तु अधिकांश नेताओं ने उनका मजाक उड़ाया। साल दर साल धान का रकबा और पैदावार बढ़ती गई और उसी के साथ ही धान खरीदी की राजनीति, समर्थन मूल्य से अधिक पर धान खरीदी और बोनस राजनीति पार्टियों के लिए चुनाव जीताओ एजेंडा बन गया है। अब धीरे-धीरे धान के बढ़ते उत्पादन के साथ-साथ यह सरकार के लिए स्थायी समस्या होती जा रही है। नया राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ में किसानों और खेतिहर मजदूरों की खुशहाली के लिए खेती किसानी को फायदेमंद बनाने के लिए ठोस रणनीति बनाई गई है। राज्य सरकार की कृषि विकास योजनाओं और कार्यक्रमों के फलस्वरूप छत्तीसगढ़  में कृषि विकास दर राष्ट्रीय कृषि विकास दर की तुलना में अधिक है। खेती किसानी की लागत को कम करने के लिए अनेक लाभकारी योजनाएं शुरू की गई है। खेती- किसानी की बेहतरी के लिए सिंचाई सुविधाएं बढ़ाना भी सबसे ज्यादा जरूरी है। विगत 13 साल में सिंचाई क्षमता 23 प्रतिशत से बढ़कर 34.63 प्रतिशत हो गई है। इस अवधि में लगभग 10 प्रतिशत अधिक सिंचाई क्षमता विकसित की गई है।

छत्तीसगढ़ को सर्वाधिक चावल उत्पादन के लिए वर्ष 2010 , 2012 और 2013 के लिए राष्ट्रीय कृषि कर्मण पुरस्कार मिला है। दलहन की खेती को फलस्वरूप वर्ष 2014 में दलहन उत्पादन के लिए कृषि कृर्मण पुरस्कार से। समर्थन मूल्य पर खरीदी गए धान में तीन सौ रुपए प्रति क्विंटल बोनस तथा किसानों को ब्याज मुक्त ऋण देने का वायदा घोषणा के साथ राज्य में सिंचाई विकास प्राधिकरण बनाने का फैसला किया है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सिंचाई विकास प्राधिकरण के गठन का आदेश दिया है। वास्तविक सिंचाई क्षमता 10.38 लाख हेक्टेयर है जो कि कुल कृषि योग्य भूमि का 18 प्रतिशत है।

कुल कृषि योग्य भूमि लगभग 57 लाख हेक्टेयर है। वास्ताविक सिंचाई क्षमता केवल 10 लाख 38 हजार हेक्टेयर ही हो पाई है। 137 लाख हेक्टेयर भौगोलिक क्षेत्रफल वाले इस राज्य छत्तीसगढ़ में 47 लाख हेक्टेयर से भी अधिक जमीन पर खेती की जाती है, जबकि सिंचाई का प्रतिशत यहां सिर्फ 23 प्रतिशत है।  भूपेश बघेल की सरकार ने बिना केन्द्र के सहयोग से राजीव न्याय योजना के नाम पर किसानों से 2500 रुपए मैट्रिक टन धान खरीदकर उन्हें सीधे लाभ पहुंचाया।

धान की  फसल के साथ-साथ किसानों को आय के अन्य स्त्रोत विकसित करने के लिए नरवा, गरवा, गुरुवा, बाड़ी योजना भी लाई। पशुपालको और किसानों से गोबर खरीदने का ऐतिहासिक फैसला कर नये आर्थिक स्वोत विकसित किये किन्तु जब तक छत्तीसगढ़ का किसान धान के साथ-साथ अन्य लाभकारी फसलें, सब्जी, आलू उत्पादित नहीं करेगा तब तक केवल धान उससे मिलने वाले बोनस के भरोसे उसका कल्याण संभव नहीं है। 

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नवाचार के लिए जरूरी है कि अन्य फसलों को भी प्रोत्साहित किया जाये, सिंचाई के साधन मुहैया कराए जाये। धान के अलावा इसकी फसले उगाने से समिति स्तर पर जो संग्रहण की दिक्कते आती है, वह भी दूर होगी। केवल एक फसली फसल के आरोप रहने वाले किसान के साथ रवि फसल के अलावा सब्जी, भाजी, मुर्गी पालन, पशुपालन, मछली पालन जैसे नगद आय के दूसरे स्रोत होंगे तो वह भी अपनी माली हालत सुधार सकेगा।