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बिग ब्रेकिंग : आरक्षण पर बड़ा झटका..! सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों की ओबीसी लिस्ट एडहॉक की.. एससी-एसटी की वर्तमान सूचियों पर भी खतरे की तलवार...पदोन्नति में आरक्षण भी प्रभावित होगा

बिग ब्रेकिंग : आरक्षण पर बड़ा झटका..! सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों की ओबीसी लिस्ट एडहॉक की.. एससी-एसटी की वर्तमान सूचियों पर भी खतरे की तलवार...पदोन्नति में आरक्षण भी प्रभावित होगा

जनधारा समाचार
रायपुर. मराठा आरक्षण मुद्दे पर महाराष्ट्र के 2018 के अधिनियम की वैधता पर अंतिम फ़ैसला देते हुए आज सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा उलट-फ़ेर कर दिया है| आज से सभी राज्यों की ओबीसी लिस्ट को खत्म कर दिया गया है| इस मामले में बाम्बे हाई कोर्ट के फ़ैसले के खिलाफ़ अपील स्वीकारते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2020 में इसे 102 वें संविधान संशोधन विधेयक की वैधता से जोड़ दिया था| इसी लिए इस मामले की सुनवाई एक 5-सदस्यीय संविधान पीठ ने मार्च 2021 में की और अपना फ़ैसला सुरक्षित किया था|


संविधान-साक्षरता प्रचारक बी.के. मनीष ने एक बयान जारी करते हुए जन-विधि केंद्र, दिल्ली से इस विषय पर एक स्पष्टीकरण जारी किया है| सवाल यह था कि क्या अनुच्छेद 342क के तहत एससी-एसटी की तर्ज पर सिर्फ़ राष्ट्रपति ही सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की सूची जारी कर सकते हैं| न्यायमूर्तियों अशोक भूषण और एस. अब्दुल नजीर ने माना कि राज्यों को भी ओबीसी सूची जारी करने का अधिकार है, लेकिन न्यायमूर्तियों एल. नागेश्वर राव, रविंद्र भट और हेमंत गुप्ता ने इसके खिलाफ़ मत दिया| नतीजा यह है कि बहुमत के फ़ैसले के मुताबिक आज से सभी राज्यों की ओबीसी सूचियां खारिज और खत्म हो गई हैं| भारत सरकार किसी भी राज्य के राज्यपाल से सलाह करके उस राज्य के लिए ओबीसी की सूची जारी कर सकेगी| लेकिन यही बात तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी.सिंह ने अगस्त 1990 में भी लोकसभा बहस में कही थी, जो कि आज तक हुआ नहीं| अगर राष्ट्रपति द्वारा ओबीसी की नई राज्यवार सूचियां जारी हुईं भी तो उनकी वैधता को एक नई चुनौती का सामना करना पड़ेगा| मंडल आयोग की चालीस साल पुरानी रिपोर्ट को अब आधार बनाना शायद सुप्रीम कोर्ट मंजूर नहीं करेगा|   

इसका एक और भयानक असर यह भी होगा कि ओबीसी की नई सूची बनाने के आधार के साथ ही एससी-एसटी की वर्तमान सूचियों की वैधता को भी चुनौती मिल सकती है| ध्यान रहे कि 1950 में राष्ट्रपति के आदेश से जारी इन सूचियों के निर्माण का कोई आधार आज तक पेश नहीं किया गया है| यहां तक कि साठ के दशक में प्रकाशित लोकुर समिति की रिपोर्ट के आधारों पर भी किसी भी सूची-संशोधन अधिनियम के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट में बहस नहीं हुई है| एप्रिल 2020 में सी. लीलाप्रसाद राव प्रकरण के संविधान पीठ फ़ैसले में पहले ही एससी-एसटी की वर्तमान सूचियों के पुनरीक्षण का मुद्दा उभर चुका है|

बी.के. मनीष ने यह आशंका भी जताई है कि अब इंद्रा साहनी फ़ैसले के बहुमत का वह बिंदु भी उभर सकता है जिसमें कहा गया है कि राज्य सत्ता प्रतिनिधित्व की अपर्याप्तता विनिश्चित किए बगैर सरकारी नौकरियों कोई आरक्षण नहीं दे सकती| प्रतिनिधित्व की अपर्याप्तता कैसे विनिश्चित करनी है इस पर न्यायमूर्ति सावंत-रेड्डी की राय का पालन करना बहुत भारी चुनौती होगी| लेकिन उसके भी पहले इसके लिए आंकड़े जुटाने के मुद्दे पर रार होनी तय है|

ध्यान रहे कि पदोन्नति में आरक्षण के सीमित प्रक्षेत्र तक में प्रतिनिधित्व के संतोषजनक आंकड़े कोई राज्य या भारत सरकार अब तक जुटा नहीं सकी है| कर्नाटक राज्य के ऐसे प्रयास पर न्यायामूर्तियों यू.यू. ललित और डी.वाई. चंद्रचूड़ (भारत के क्रमश: अगले दो मुख्य न्यायमूर्ति) की पीठ 2019 के बी.के. पवित्रा (द्वितीय) फ़ैसले में मुहर लगा चुकी है, लेकिन जरनैल सिंह के लंबित मामले में इसे तीन-जजों की पीठ की कठिन जांच से गुजरना बाकी है| खबर लिखे जाने तक इस फ़ैसले का सिर्फ़ ऑपरेटिव हिस्सा ही सामने आया है और फ़ैसले की कॉपी सुप्रीम कोर्ट की वेबसाईट या अन्यत्र कहीं अब तक उपलब्ध नहीं है|