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परियोजना प्रभावित ग्राम पंचायतों के विरोध प्रदर्शन में पहुंचा मुक्तिमोर्चा कहा -संवैधानिक अधिकारों का हनन बर्दाश्त नहीं करेंगा बस्तर

परियोजना प्रभावित ग्राम पंचायतों के विरोध प्रदर्शन में पहुंचा मुक्तिमोर्चा कहा -संवैधानिक अधिकारों का हनन बर्दाश्त नहीं करेंगा बस्तर

परियोजना पर उठीं आपत्तियों के निराकरण हेतू, राज्य सरकार संवाद स्थापित करने हेतु कमेटी करें गठित--मुक्ति मोर्चा

दंतेवाड़ा।  बस्तर अधिकार मुक्तिमोर्चा संभागीय संयोजक नवनीत चांद व जिला संयोजक भरत कश्यप के नेतृत्व में मुक्ति मोर्चा के दल द्वारा आज दंतेवाड़ा जिला स्थित बारसूर नगर पंचायत में बोधघाट परियोजना से प्रभावित ग्राम पंचायतों के द्वारा गठित समिति के नेतृत्व में आयोजित तीन दिवसीय महाधरना में अपनी उपस्थिति दर्ज कर। प्रभावित ग्राम पंचायतों की मांगों को सही ठहराते हुए अपने समर्थन का ऐलान किया। 

मुक्ति मोर्चा के संयोजक नवनीत चांद ने मंच से सभा को संबोधित करते हुए कहा कि केंद्र की यह योजना चालीस वर्ष पुरानी योजनाओं में से एक है देश के पूर्व प्रधानमंत्री  देशाई जी के अगवाही में सन् 1980 में बोधघाट परियोजना का संचालन इंद्रावती नदी के ऊपर 90 फीट ऊंचा बांध का निर्माण कर इंद्रावती नदी के पानी को रोक स्थिर पानी से विधुत उत्पादन करने की योजना इस परियोजना के माध्यम से बनाई गई थी, पंरतु उस परिस्थिति में बस्तर के नेताओं की आपत्तियों पर केंद्र सरकार द्वारा अलग अलग अध्ययन कमेटी का गठन कर बस्तर को हो रहें नुकसान व आपत्तियों की वास्तविक्ता को जमीनी स्तर पर देखने हेतु गठित की गई, 1984 से 1994 तक केंद्रीय अनुसंधान कमेटी ने बस्तर में संचालित बोधघाट परियोजना से बस्तर के निवासियों की संस्कृति जीवन यापन वन्यजीव जन्तू, जंगल व पर्यावरण को बड़े नुकसान की चिंता जाहिर करते हुए, परियोजना संचालन पर आपत्ति दर्ज की थी।

 जो आज परियंत तक, यथावत बनी हुई है। राज्य सरकार के चालीस वर्ष बाद बंद पड़े बोधघाट जल विद्युत सिंचाई परियोजना को केंद्रीय जल आयोग की मंजूरी के साथ 22 हजार करोड़ रुपए खर्च कर पुनः प्रारंभ करने की योजना बनाई है। विडम्बना यह है कि, हर सरकार की तरह यह राज्य सरकार भी बस्तर के लोगों से बिना संवाद स्थापित किए, आपत्तियों के निराकरण बिना बस्तर के विश्वास से विश्वास घात कर सीधे परियोजना को जमीन पर शुरू करने की कायवाद प्रारंभ कर दी गई है‌। जो संवैधानिक रूप से गलत है। 42 करोड़ रुपए खर्च कर वेपकोस नामक कम्पनी को सर्वे का कार्य दे दिया गया है‌। 

 परियोजना स्थल सर्वे कार्य प्रारंभ भी हो चुकी है। सरकार द्वारा इस परियोजना से प्रभावित होने वाले जानकारी को सार्वजनिक करते हुए डुबान क्षेत्र में 42 ग्राम पंचायत से अधिक व निजी, वन व सरकारी 14 हजार हेक्टेयर जमीन डुबान के इलाके में आना बताया है। वर्तमान में बस्तर प्रवास में आये मुख्यमंत्री ने इस परियोजना को राज्य सरकार के सपनों की परियोजना बता, इसे प्रारंभ करने की बात कही है।

मुक्ति मोर्चा ने सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि, जब केंद्र सरकार किसानों के खिलाफ पारित किये गये कानून पर किसान मोर्चा के साथ लगातार संवाद कर निराकरण की पहल कर रही है।

तो उसी तर्ज पर बस्तर में स्थापित किसी भी परियोजना हेतु बस्तर के लोगों से संवाद राज्य सरकार द्वारा क्यों? नहीं किया जा रहा है। अपनी पार्टी के जनप्रतिनिधियों से चर्चा कर सीधे बस्तर में परियोजना के संचालन का आदेश दिया जाना आजाद भारत में लोकतंत्र के संवैधानिक प्रावधानों का हिस्सा नहीं। राज्य सरकार को चाहिए,कि वो परियोजना से प्रभावित ग्राम पंचायतों की, समिति बस्तर के समाजिक संगठन, से बस्तर के जनप्रतिनिधियों व राज्य के मंत्रियों एवं आला अधिकारीयों के एक कमेटी बनाकर परियोजना की लाभ व हानी पर विश्रृत चर्चा कर, सभी को विश्वास में लेकर योजना को आगे बढ़ाये।

राज्य की इच्छा यदि बस्तर के सिंचाई योजना को मजबूत करना है तो, पड़ोसी राज्य तेलंगाना के वाटर लिफ्टिंग परियोजना का अध्ययन जरूर किया जाना चाहिए। आंदोलन समर्थन के दौरान मुक्ति मोर्चा के बस्तर जिला संयोजक भरत कश्यप, दंतेवाड़ा जिला संयोजक सुजीत कर्मा, संभागीय सह संयोजक समीर खान, महेंद्र मौर्य, सुखराम कश्यप, व आंदोलनकारियों समिति के स्थानीय पदाधिकारीयों व भारी संख्या में प्रभावित ग्राम पंचायतों के निवासियों आदि उपस्थित थे।