II प्रधान संपादक सुभाष मिश्र अपने लेख में समझा रहे हैं कि तकनीक मनुष्य का विकल्प नहीं हो सकती...जानिए कैसे..?

II प्रधान संपादक सुभाष मिश्र अपने लेख में समझा रहे हैं कि तकनीक मनुष्य का विकल्प नहीं हो सकती...जानिए कैसे..?

तकनीक मनुष्य का विकल्प नहीं हो सकती


  • सुभाष मिश्र

  • कोरोना' जैसी वैश्विक बीमारी के कारण अपने-अपने घरों में आस-पास से भौतिक और सामाजिक दूरियों के बीच रह रहे लोगों के पास, संवाद, मनोरंजन व कामकाज के कितने ही संसाधन, वाई-फाई कनेक्शन, इंटरनेट क्यों न हों और वह वर्चुअल दुनिया में कितने ही सक्रिय क्यों न हों, उन्हें उसकी सामाजिक सामूहिकता की कमी खटकती है। आभासी (वर्चुअल) समुदाय में आप कितने ही क्रियेटिव क्यों न हो जाएं, टिकटाक वीडियो बना लें, गाना गा लें, अंताक्षरी खेल लें, हाउजी खेल लें, किसी कविता, नाटक का पाठ कर लें, बच्चों की ई-क्लास लगा लें, किन्तु उसमें वह गर्मजोशी पैदा नहीं होती जो कि समुदाय के बीच बैठकर होती है। सामुदायिकता समुदाय के कई रुपों पर हम एक—दूसरे से जुड़े रहते हैं। समाज के अंदर एक तरह की नेटवर्किंग ही एक तरह की सामूहिकता है।

    ये परीक्षण का समय आया है कि हमारी वास्तविक सामुदायिकता की कीमत पर यदि हम आभासी-समुदाय को अपनाते हैं तो वह कितनी कारगर है..! इन दिनों हमारी वास्तविक सामुदायिकता हमसे छिन गई है। यही असली सामुदायिकता है जो असल जीवन में हम जी भी रहे हैं। जीवन बहुत ज्यादा आभासी होकर नहीं जिया जा सकता। वर्चुअल दुनिया की नेटवर्किग तभी तक है जब तक हमारे पास वाईफाई है या हम आनलाईन हैं जैसे ही हमारा नेटवर्क गायब होता है, हमारी स्क्रीन से पूरी वर्चुअल दुनिया गायब हो जाती है। हमारे बहुत सारे फेसबुक फ्रेंड कई बार फेक आईडी वाले निकलते हैं।

    वास्तविक (रियल) और आभासी (वर्चुअल) दुनिया के बीच का फर्क इस बात से समझा जा सकता है कि स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए बहुत सी वीडियो कान्फ्रेंसिग के माध्यम से 'डिस्टेंस लर्निग' की कितनी ही क्लासें क्यों न हों, विद्यार्थी अभी भी कोचिंग के लिए आमने—सामने पढ़ाई कराने वाले संस्थानों में ही ज्यादा जाते हैं जिसका उदाहरण कोटा राजस्थान में पढ़ऩे के लिए लाकडाउन में फंसे सैकड़ों बच्चे हैं। हम आभासी दुनिया के जरिए कितना ही विश्व समुदाय से जुड़ जाएं, कितनी ही सूचनाएँ एकत्र कर लें लेकिन हम वह रच नहीं पाते जो वास्तविक जीवन में और समुदाय के बीच में रहकर रचते हैं। इस कोरोना कालखंड के आभासी वातावरण में एक तरह की छटपटाहट व घबराहट है।


  • हम सबके दिलोंदिमाग पर कोरोना इस तरह हावी है कि इससे हमारी रचनाशीलता पूरी तरह प्रभावित हो रही है। किसी फेलोशीप के समय किताब लिखने, कोई कार्य करने के लिए उपलब्ध एकांत आपका चुना हुआ एकांत होता है किन्तु यह एकांत हमने नहीं चुना है। यह एकांत बलपूर्वक मारे डर के लादा हुआ एकांत है। इस एकांत में समुदाय के बिना हम जो कुछ भी रच रहे हैं, उसमें हमारा तात्कालिक, वर्तमान हमारे दिमाग पर हावी है, जो हमारी सहज रचनाशीलता को रोकता है। सामान्य दिनों में हम जिस एकांत में रचनाशीलता की बात करते हैं तब हमें मालूम होता है कि हम जब चाहे अपना एकांत स्थगित करके समाज में कहीं भी आ जा सकते हैं। कोरोना समय में ऐसा संभव नहीं है।

    सामाजिक जीवन की नैतिकता व्यक्ति की रचनात्मकता को सामूहिकता से जोड़ती है। रचनात्मकता और सामूहिकता या सार्वजनिक होने के अंतरसंबंधों पर ही सामाजिक के संदर्भ टिके हैं। रचनात्मकता का दायित्व बोध व्यक्ति की सामाजिकता की धूरी है। सामाजिक स्वीकृति तो बड़ी बात है लेकिन उन रचनात्मकता की समाज में उपस्थिति ही रचनाकार की तुष्टि के प्रबल कारण जुटाती है। रचना का प्रतिफलन व्यक्ति को समाज में चाहिए, वह खुद भी जानता है, जानता हो कि उसका निर्माण उसकी रचना कितनी भी महान हो, लेकिन उसकी उपस्थिति समाज में नहीं हो तो उसे निरर्थकता का बोध होने लगता है। इसी कारण दुनिया में स्वांत: सुखाय एक फरेबी वाक्य है। तुलसी दास ने इसका उपयोग दूसरे संदर्भ में किया था अन्यथा वे भी जानते थे कि रामचरित मानस तो लिखी ही गई जनमानस के लिए है।

    एकांत का सृजन एकांत से बाहर सामूहिक स्वीकृति चाहता है. सामाजिक जीवन के तमाम रिश्ते सामूहिकता में शेष हैं. निजी एकांत को भंग करने के लिए व्यक्ति की सृजनशीलता ही हमेशा सक्रिय रहती है। रचनात्मकता की सामाजिक अभिलाषा एकांत में ही जन्म लेती है। इस उत्तेजक समय में रचनात्मकता मनुष्य के पक्ष में किस हद तक है, यही बात उसकी सामाजिकता भी तय करेगी. लेकिन यह अंतिम सच नहीं है. व्यक्ति के लिए कला की दुनिया में यह जोखिम हमेशा बना रहा है. रचनाकार को अपनी कृति की सामाजिक सराहना चाहे मिले या न मिले, लेकिन उसकी उपस्थिति का स्वीकार उसके लिए जरूरी है, चाहे वह कितना ही स्वांत: सुखाय का हकदार बने।

    ऐसा नहीं है कि कोरोना जैसी बीमारी व त्रासदी से नहीं गुजरे हैं। इतिहास में 1918 में ऐसी ही एक त्रासदी 'प्लेग के नाम से आई थी जिसमें 5 करोड़ से ज्यादा लोग मरे थे. आज यह कोरोना का संकट इतना भयावह तो नहीं है किन्तु इसकी व्यापकता अधिक है। सुप्रसिद्ध लेखक, उपन्यासकार अल्बैर कामू जो खुद प्लेग (तपेदिक) से 37 की उम्र में प्रभावित हुए थे, उन्होंने अपने जीवन अनुभव पर प्लेग नाम से एक उपन्यास लिखा। इस उपन्यास में दिया गया विवरण कोरोना कालखंड की यादों को ताजा करता है। उन दिनों हर किस्म की भविष्यवाणी में लोगों की दिलचस्पी बहुत बढ़ रही थी। उम्मीद की जाती थी कि बहार के मौसम में महामारी अचानक किसी भी क्षण खत्म हो जाएगी। हर आदमी अपने आपको यकीन दिला रहा था कि प्लेग ज्यादा दिन नहीं चलेगा। लेकिन दिनों के गुजरने के साथ ही लोगों दिलों में यह डर बढ़ने लगा कि हो सकता है, यह मुसीबत अनिश्चितकाल तक चलती रहे।

    अखबारों में भविष्यवाणियां धारावाहिक के रूप में छपी थी. उन्हें लोग दिलचस्पी और शौक से पढ़ रहे थे, जैसे स्वस्थ सरगम के जमाने में छपने वाली इश्क-मोहब्बत की कहानियां पढ़ी जाती थीं। हमारे शहर में अंधविश्वास ने जबरदस्ती धर्म की जगह ले ली। कोरोना संक्रमण के इस दौर में हमारे देश में भी कुछ इसी तरह के हालात पैदा करने की कोशिशें लगातार जारी हैं। एक समुदाय के रूप में हम एक—दूसरे से मिलकर रहते हैं, एक—दूसरे के दुख में सहभागी होते हैं, हमारा सामाजिक तानाबाना ऐसा है कि हमारा एक—दूसरे के बिना काम नही चल सकता है. नाई-धोबी-इलेक्ट्रीशियन से लेकर हमें सफाई कामगार तक की जरूरत है। हम सब कहीं न कहीं एक—दूसरे पर आश्रित हैं। यहीं हमारी वास्तविक दुनिया भी है किन्तु हम आज आभासी दुनिया के चक्कर में फंसकर अपने सामने के सच को खारिज करके जो झूठ और भ्रम फैलाया जा रहा है, उसे भी सच समझ रहे हैं।

    हम कोरोना समय में एक स्थगित जीवन जी रहे हैं. आभासी दुनिया के कारण भले ही हमें पूरा विश्व एक समुदाय लग रहा हो किन्तु हमारा दिमाग जकड़ा हुआ है. हम अपने शरीर को जरूर बचा ले रहे हैं किन्तु हमारे दिमाग की उलझन कम होने का नाम नहीं ले रही है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है इसीलिए उसे समाज से घुले—मिले बिना अच्छा नहीं लगता। यही वजह है कि बहुत से लोगों में इस कोरोना कालखंड में अवसाद के लक्षण देखने मिल रहे हैं। घर बैठे-बैठे रोज-रोज सुबह-शाम कोरोना की खबरों, उसकी बातों और उससे बचाव के उपायों और हमारी रोजमर्रा की दिनचर्या में पड़ऩे वाले प्रभाव से हम अछूते नहीं हैं। हम जितने सामान्य दिनों में रचनात्मक होते हैं, सक्रिय होते हैं, उतने हम इस कोरोना कालखंड में रचनात्मक, सक्रिय नहीं हैं। नाटक सहित बहुत सी कलाएं, जो सामुदायिक कलाएं हैं, वह सभी स्थगित हैं और जो व्यक्तिगत स्तर पर रचनाशीलता है, वह भी लगभग खत्म सी है। कुछ लोग इन दिनों जो लिख रहे हैं और सृजित कर रहे हैं तो वह कहीं न कहीं कोरोना के आसपास ही है, चाहे फिर प्रवासी, दिहाड़ी मजदूरों की व्यथा हो या कोरोना मुक्ति की छटपटाहट। 

    (लेखक दैनिक आज की जनधारा तथा वेब मीडिया हाउस के प्रधान संपादक हैं )