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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -राजभवनों की भूमिका पर उठते सवाल

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -राजभवनों की भूमिका पर उठते सवाल


मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, केरल, पश्चिम बंगाल, दिल्ली और अब छत्तीसगढ़ में राजभवन और सरकार के बीच में लगातार विवाद की स्थिति निर्मित होती जा रही है। अक्सर यह देखने में आया है कि जहां कहीं भी केंद्र में काबिज सरकार की विरोधी सरकारें राज्यों में सत्तारूढ़ होती है वहां पर अक्सर राज्यपाल सरकार के कामकाज में नुक्ताचीनी निकालते हैं फिर चाहे विधानसभा सत्र बुलाने का मामला हो या यूनिवर्सिटी में कुलपतियों की नियुक्ति का। हाल ही में महाराष्ट्र के राज्यपाल ने लॉकडाउन में मंदिर नहीं खोले जाने को लेकर मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में जो तंज कसा या फिर छत्तीसगढ़ की राज्यपाल ने कुलपति मामले में या फिर पत्रकारों के उत्पीडऩ के मामले में जिस तरह का हस्तक्षेप किया वह सरकार को पसंद नहीं आया।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने मीडिया के जरिये राजभवन और सरकार के बीच टकराव के संबंध में कहा है कि यह सवाल तो भाजपा और उनके नेताओं से पूछा जाना चाहिए कि आखिर गैर भाजपा शासित राज्यों से राजभवन की इतनी दखलअंदाजी क्यों हो रही है। नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने कहा है कि सत्ता में आने के बाद से लगातार संवैधानिक मर्यादा व गरिमा का उल्लंघन करने वाली कांग्रेस सरकार राजभवन से टकराव के रास्ते पर चल रही है।

हाल ही में सरकार द्वारा नियुक्त राज्यपाल के नए सचिव चार दिन बाद भी राजभवन से ज्वाइन नहीं कर पाए थे जिन्हे बड़ी मशक्कत के बाद ज्वाईनिंग मिली । राज्यपाल की मीटिंग में कोरोना का बहाना बताकर अनुपस्थित रहने वाले गृहमंत्री जब मुख्यमंत्री की बैठक में दूसरे दिन दिखे तो सवाल उठना लाजिमी था। राज्यपाल की नाराजगी दूर करने सरकार के दो भरोसेमंद मंत्रियों को भेजना पड़ा।

पश्चिम बंगाल के बाद महाराष्ट्र और अब छत्तीसगढ़ में राजभवन और सरकार के बीच टकराव की स्थिति बन रही है। तीनों ही राज्य गैर भाजपा शासित है। हाल ही में महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने राज्य में मंदिरों को खोलने के लिए मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को एक पत्र लिखा था। पत्र में लिखे गए शब्दों का कड़ा विरोध उद्धव ठाकरे ने किया था। इस बात की शिकायत शरद पवार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर की है। महाराष्ट्र की तरह ही देश के अनेक राज्यों में राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच किसी न किसी मसले पर टकराहट होने की खबरें आती रहती है। देश के तकरीबन हर बड़े राज्य के राज्यपालों के साथ राज्य सरकार का टकराव होता रहा है। कभी राज्यपाल के बयान तो कभी फैसले राजनीतिक टकराव के कारण ये स्थिति बनी है।

राज्यपाल के पद को संवैधानिक दर्जा हासिल है और उनके दायित्व और अधिकार क्षेत्र भी निर्धारित है, अक्सर केंद्र में जिस पार्टी की सरकार होती है। सामान्यत: उस पार्टी की विचारधारा से प्रभावित व्यक्ति को ही राज्यपाल बनाया जाता है। जब केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार होती है तब तो मुख्यमंत्री और राज्यपाल के संबंध अच्छे रहते हैं। दोनों के बीच कोई खास दिक्कत नहीं होती लेकिन जब राज्य में विपक्षी दल की सरकार होती है तो मुख्यमंत्री और राज्यपाल के माध्यम से कुछ फैसलों को लेकर टकराव पैदा हो जाता है। टकराव की मुख्य वजह होती है राजनीति से प्रेरित होकर फैसले लेना।

राज्यपाल और मुख्यमंत्री दोनों ही मजबूत लोकतंत्र के उत्तरदायी आधार स्तंभ है। इन दोनों पदों पर बैठे व्यक्तियों का दायित्व है कि वह दलगत राजनीति से बाहर निकलकर कार्य करें पर ऐसा होता नहीं है। राज्यपाल के अधिकार को लेकर संविधान में कई बातें स्पष्ट नहीं है और परंपरा में कोई सर्वमान्य माडल नहीं बन सका है। ऐसे में उसके सामने यह स्पष्ट नहीं रहता कि वह अपने विवेक के दायरे को कहां तक रखें।
विवाद की जड़ में गवर्नर की नियुक्ति का तरीका उसकी योग्यताएं पदावधि उसकी विवेकाधीन शक्ति और उसके कार्य करने के तरीके हैं। राज्यपाल का कार्यालय पिछले पांच दशकों से सबसे विवादास्पद रहा है। यह विवाद सर्वप्रथम 1959 में केंद्र और राज्य सरकार के मध्य राजनीतिक मतभेद की वजह से केरल के तत्कालीन गवर्नर द्वारा राज्य सरकार की बर्खास्तगी से शुरू हुआ था। इस विवाद ने 1967 में उत्तर भारत के राज्यों में कई गैर कांग्रेसी सरकारों के उभरने के बाद सबसे खराब रूप धारण कर लिया।

जाने-माने समाजवादी नेता मधु लिमये ने उस दौर में कहा था कि राज्यपाल का पद खत्म कर देना चाहिए। उनका कहना था कि राज्यपाल एक प्रकार से सफेद हाथी है जिस पर बहुत सरकारी पैसा बेवजह खर्च होता है। राज्यपाल की भूमिका भारत जैसे संघीय लोकतंत्र से शक्ति के विभाजन के साथ निगरानी और संतुलन बनाए रखने की जरूरत होती है। हमारे देश में राज्यपाल का पद संवैधानिक व्यवस्था के तहत है। देश के संविधान में इस पद के अधिकारों और दायित्वों को लेकर स्पष्ट व्याख्या भी की गई। जिस प्रकार संघ में राष्ट्र का संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति होता है। उसी प्रकार राज्यों में राज्य का प्रमुख राज्यपाल होता है। वह भारतीय राजनीति की संघीय प्रणाली का भाग है तथा केंद्र एवं राज्य सरकारों के बीच एक सेतु का काम करता है।

संविधान का अनुच्छेद 163 राज्यपाल को विवेकाधिकार की शक्ति प्रदान करता है अर्थात वह स्वविवेक संबंधी कार्यों में मंत्रिपरिषद की सलाह मानने हेतु बाध्य नहीं है। यदि किसी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता है तो राज्यपाल मुख्यमंत्री के चयन में अपने विवेक का उपयोग कर सकता है। किसी दल को बहुमत सिद्ध करने के लिए कितना समय दिया जाना चाहिए यह भी राज्यपाल के विवेक पर निर्भर करता है। विवाद राज्यपाल की विवेकाधीन शक्ति और उसकी कार्यप्रणाली को लेकर भी है।

हाल में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ भी इसी कारण के चलते सुर्खियों में आए थे। उनका कहना था कि अगर संविधान की रक्षा नहीं तो मुझे कार्रवाई करनी पडग़ी। राज्यपाल के पद की लंबे समय से अनदेखी की जा रही है। मुझे संविधान के अनुच्छेद 154 पर विचार करने को बाध्य होना पड़ेगा। यह अनुच्छेद कहता है कि राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होगी और वह उसका प्रयोग इस संविधान के अनुसार स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के द्वारा करेगा। इसके बाद तृणमूल कांग्रेस ने राज्यपाल पर अपने पद की छवि बिगाडऩे का आरोप लगाया था। पार्टी का कहना था कि जगदीप धनखड़ को इस पद के बजाय प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष पद संभालना चाहिए।

इसी तरह राजस्थान में चली सियासी उथल-पुथल के दौरान वहां सत्ताधारी कांग्रेस ने कलराज मिश्र पर कई बार पक्षपात के आरोप लगाए थे। कभी राष्ट्रपति महात्मा गांधी ने इस पद की एक ऐसी संस्था के रूप में कल्पना की थी जो निष्पक्ष होगी और संवैधानिक संरक्षक की अपनी भूमिका का निर्वाह करते हुए देश के संघीय ढांचे को मजबूत करेगी।

गांधीजी की मंशा के विपरीत 1954 में पंजाब की कांग्रेस सरकार को बर्खास्त कर दिया गया क्योंकि मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के बीच मतभेद थे। 1959 में केरल की नम्बूदरीपाद सरकार बर्खास्त की गयी। इसके बाद केंद्र में सत्ताधारी दल द्वारा राज्यपालों को अपने एजेंट की तरह बरतने की यह सूची लंबी होती है। उत्तर प्रदेश में रोमेश भंडारी, झारखंड में सिब्ते रजी, बिहार में बूटा सिंह कर्नाटक में हंसराज भारद्वाज और कई अन्य राज्यपालों का फैसले राजनीतिक विवाद का कारण बने हैं। संघीय व्यवस्था में राज्यपाल राज्य और कार्यपालिका के औपचारिक प्रमुख के रुप में काम करते हैं। खासतौर पर तब जब राजनीतिक उथल.पुथल होती है। राज्यपाल के पद को लेकर अभी तक तीन बातें मानी जाती रही है। पहला कि ये एक सेरेमोनियल यानी शोभा का पद है। दूसरा इस पद पर नियुक्ति राजनीतिक आधार पर होती है और तीसरा ये कि संघीय व्यवस्था में राज्यपाल केंद्र के प्रतिनिधि होते हैं। केंद्र सरकार जब चाहे उनका इस्तेमाल करें  जब चाहे हटाए और जब चाहे नियुक्त करें लेकिन यह केवल शोभा का पद नहीं है अगर होता तो हर नई सरकार के आने के बाद राज्यपालों को बदलने और उनके तबादले इतने महत्वपूर्ण न हो।

जो लोग राज्यपाल का पद साप्त करने की बात करते हैं, उनका तर्क है कि राजभवन राज्यपाल के कार्यालय की गैरनिष्पक्षता राज्यपाल केंद्र सरकार के एजेंट होते हैं और चूंकि उनमें से अधिकांश एक विशेष राजनीतिक दल से संबंधित सेवानिवृत्त राजनेता होते हैं वे लोगों के प्रति वफादार रहते हैं जो उन्हें नियुक्त करते हैं। इसके परिणामस्वरूप वे राज्य सरकार को गिराने की कोशिश करते हैं यदि ऐसा होता है तो यह विपक्षी पार्टी द्वारा सरकार बनने के लिए होता है। यह अलोकतांत्रिक और अनैतिक है।

राज्यपाल का पद गैरराजनीतिक नियुक्तियों के लिए आरक्षित होना चाहिए और सर्वोच्च न्यायालय को इस पर कानून बनाना चाहिए कि जब चुनाव में खंडित फैसला सुनाता है तो राज्यपाल को कैसे कार्य करना चाहिए। गवर्नर के पद के कार्यों में उचित संशोधन करने के लिए सरकारिया आयोग और पंची आयोग की रिपोर्ट की सिफारिशों की बारीकी से जांच करने की आवश्यकता है।

इन पदों को सेवानिवृत्त राजनेताओं के लिए डंपिंग ग्राउंड बनने के बजाय त्रुटिहीन साख वाले प्रतिष्ठित व्यक्तियों को जाना चाहिए। चयन प्रक्रिया में विपक्ष,  सत्तारूढ़ पार्टी, नागरिक समाज और न्यायपालिका को शामिल करने के बाद एक राष्ट्रीय पैनल तैयार किया जाना चाहिए। राज्यपाल को इस पैनल से राज्य के सीएम के परामर्श के बाद नियुक्त किया जाना चाहिए जिसमें वह कार्य करना चाहते हैं।
हमारे लोकतंत्र को धीरे-धीरे मजबूत और ज्यादा लोकतांत्रिक होना था किन्तु सत्ता और पावर की चाह में लोकतंत्रिक मूल्यों की किसी को परवाह नहीं है। राजभवन जिसे निष्पक्ष और राजनीतिक गतिविधियों से दूर रहना चाहिए स्वयं राजनीति का हिस्सा बनते जा रहे हैं।