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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -बढ़ता मानसिक अवसाद और आत्महत्या

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -बढ़ता मानसिक अवसाद और आत्महत्या

-सुभाष मिश्र

चौरासी लाख योनियों के बाद मानस श्रेणी में जन्म लेने की अवधारणा से प्रेरित हमारा देश पूरी दुनिया में आत्महत्या के मामले में चौथे स्थान पर है। दुनिया में हर साल 8 लाख लोग आत्महत्या करते हैं। जिनमें से एक लाख 35 हजार भारत के होते हैं। स्वास्थ्य संगठन के अनुसार महिलाओं की तुलना में पुरुष ज्यादा आत्महत्या करते है। हमारे देश में प्रति एक लाख पर महिला की आत्महत्या दर 16.4 है, वही पुरुषों की आत्महत्या दर 25.8 है। आत्महत्या के चौंकाने वालों आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि आत्महत्या करने वालों में पढ़े-लिखे लोगों की तादात अधिक है।

सवाल यहां आत्महत्या के कारणों का पड़ताल करने की भी है। कितने से भी कितनी कठिन से कठिन परिस्थिति हो मनुष्य की जिजीविषा उसे जीने के लिए प्रेरित करती है। विषम परिस्थिति में भी मनुष्य ने खुद को ढाला है। पर दुर्भाग्य की बात है कि समाज का पढ़ा-लिखा वर्ग है उसमें मृत्यु की प्रवृत्ति, आत्महत्या की प्रवृत्ति ज्यादा बढ़ी है। ये चौकाने वाली बात है। दरअसल मरना सबका तय है, जो पैदा हुआ है, वो मरेगा। कहा भी गया है की जो आया है तो जाएगा, राजा, रंक, फकीर। तो जो पैदा हुआ है वो मरेगा।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन द्वारा 16 सितंबर, 2021 मानसिक स्वास्थ्य और आत्महत्या रोकथाम पर एक संवेदिकरण कार्यशाला रायपुर में आयोजित की गई। मानसिक स्वास्थ्य और आत्महत्या रोकथाम के बारे में विश्वसनीय जानकारी देकर रेडियो कार्यक्रमों द्वारा यह जानकारियां समुदाय तक पहुंचाकर जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से इस कार्यशाला का आयोजन किया गया।

कार्यशाला आयोजन का मानना है कि आत्महत्या के कारणों में प्रमुख कारण दिवालियापन या ऋणग्रस्तता, विवाह संबंधी मुद्दे, दहेज संबंधित मुद्दे, विवाहेतर संबंध, तलाक, परीक्षा में असफलता, नपुंसकता, बांझपन, बीमारी, प्रिय व्यक्ति की मृत्यु, नशीली दवाओं का दुरुपयोग, लत, सामाजिक प्रतिष्ठा में गिरावट, प्रेम संबंधों, दरिद्रता, बेरोजगारी, संपत्ति विवाद, संदिग्ध, अवैध संबंध, अवैध गर्भावस्था, शारीरिक शोषण( बलात्कार), पेशेवर, कैरियर समस्या आदि शामिल है।
भारत के सबसे बड़े 53 शहरों में 19,120 आत्महत्याएं वर्ष 2012 में, चेन्नई में आत्महत्याओं की संख्या सबसे अधिक 2,183थी, उसके बाद बेंगलुरू 1,989, दिल्ली और मुंबई 1.296 दर्ज की गई। जबलपुर, मध्यप्रदेश के बाद कोल्लम का नंबर है।

आत्महत्या की मनोवृति वाले व्यक्तियों पर निगाह रखना जरूरी है। इसमें पहला तरीका है उस व्यक्ति से सीधे बातचीत करना और उसका मनोबल बढ़ाना। वह बताते हैं कि देश में ऐसे मरीजों को आत्महत्या से रोकने के लिए कई हेल्पलाइन नंबर चलाए जा रहे है। लेकिन उसे उस नंबर तक पहुंचने के लिए भी किसी सहारे की जरूरत होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि मानसिक अवसाद की स्थिति में मरीज खुद किसी से कोई मदद नहीं लेना चाहते, यह जिम्मा उसके परिवार, मित्रों और शुभचिंतको को उठाना होगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि आत्महत्या के मामलों के अध्ययन के बाद तमाम सरकारों और गैर सामाजिक संगठनों को मिल कर एक ठोस पहल करनी होगी। इसके लिए जागरूकता अभियान चलाने के अलावा हेल्पलाइन नंबरों के प्रचार-प्रसार पर ध्यान देने होगा। इसके साथ ही समाज में लोगों को अपने आसपास ऐसे लगों पर निगाह रखनी होगी जिनमें आत्महत्या या अवसाद का कोई संकेत मिलता है।

पारिवारिक समस्याएं और बीमारी आत्महत्या की सबसे बड़ी वजह रही है। 2019 में हुई कुल आत्महत्याओं 1,39,123 में पारिवारिक समस्या के कारण 32.4 प्रतिशत और बीमारी के कारण 17.1 प्रतिशत लोगों ने खुदकुशी की हैं। ड्रग की लत की वजह से 5.6 प्रतिशत महिलाओं के मुकाबले पुरुष आत्महत्या करते हैं। 2019 में 70.2 प्रतिशत पुरुषों ने और 29.8 फीसदी महिलाओं ने आत्महत्या की थी, जबकि 2018 में 68.5 फीसदी पुरुष और 31.5 फीसदी महिलाओं ने खुदकुशी की थी। महिलाओं की आत्महत्या की सबसे बड़ी वजहों में विवाह संबंधी खासकर दहेज से जुड़े मामले, नपुंसकता आदि हैं। महिलाओं में सबसे अधिक आत्महत्या घरेलू महिलाओं ने की है। महिलाओं द्वारा की गई कुल खुदकुशी में 51.5 फीसदी गृहणियां है।

डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के मुताबिक यह भी एक चौंकाने वाला तथ्य है कि भारत में आत्महत्या करने वालों में बड़ी तादात 15 से 29 साल की उम्र के लोगों की है। यानी जो उम्र उत्साह से लबरेज होने और सपने देखने की होती है। आईआईटी व आईआईएम जैसे तकनीकी व प्रबंधन के उच्च शिक्षण संस्थानों तक में छात्रों के बीच आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। यह स्थिति हमारी शासन व्यवस्था के साथ-साथ हमारी समाज व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है और हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर परस्पर प्रेम, स्नेह, संवाद पर आधारित हमारे पारंपरिक, पारिवारिक मूल्यों, आदर्शों और नैतिकता का हमारे जीवन से क्रमश: लोप क्यो होता जा रहा है? आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति विशुद्ध रूप से एक समाजशास्त्रीय परिघटना है। आज व्यक्ति अपने जीवन की तल्ख सच्चाईयों से मुंह चुरा रहा है और अपने को हताश और असंतोष से भर रहा है। आत्महत्या का समाज शास्त्र बताता है कि व्यक्ति में हताश की शुरुआत तनाव से होती है, जो उसे खुदकुशी तक ले जाती है। यह हैरान करने वाली बात है कि भारत जैसे धार्मिक और आध्यात्मिक रूझान वाले देश में कुल आबादी के लगभग एक तिहाई लोग गंभीर रूप से हताश की स्थिति में जी रहे हैं, डब्ल्यूएचओ का अध्ययन तो यही हकीकत बयान करता है। कुल दिनों पहले केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट में भी कहा गया था कि देश के लगभग साढ़ेे छह करोड़ मानसिक रोगियों मे से 20 फीसदी लोग अवसाद के शिकार हैं।

लाख मुसीबत आये लाख विपदा आये पर जीने की आस नही छोडऩा चाहिए । प्रसंगवश शैलेन्द्र की यह कविता

तू जि़न्दा है तो जि़न्दगी की जीत में यकीन कर,
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!

सुबह और शाम के रंगे हुए गगन को चूमकर,
तू सुन ज़मीन गा रही है कब से झूम-झूमकर,
तू आ मेरा सिंगार कर, तू आ मुझे हसीन कर!
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!.... तू जि़न्दा है

ये ग़म के और चार दिन, सितम के और चार दिन,
ये दिन भी जाएंगे गुजऱ, गुजऱ गए हज़ार दिन,
कभी तो होगी इस चमन पर भी बहार की नजऱ!
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!.... तू जि़न्दा है

हमारे कारवां का मंजि़लों को इन्तज़ार है,
यह आंधियों, ये बिजलियों की, पीठ पर सवार है,
जिधर पड़ेंगे ये क़दम बनेगी एक नई डगर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!.... तू जि़न्दा है

हज़ार भेष धर के आई मौत तेरे द्वार पर
मगर तुझे न छल सकी चली गई वो हार कर
नई सुबह के संग सदा तुझे मिली नई उमर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!.... तू जि़न्दा है

ज़मीं के पेट में पली अगन, पले हैं ज़लज़ले,
टिके न टिक सकेंगे भूख रोग के स्वराज ये,
मुसीबतों के सर कुचल, बढ़ेंगे एक साथ हम,
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!.... तू जि़न्दा है

बुरी है आग पेट की, बुरे हैं दिल के दाग़ ये,
न दब सकेंगे, एक दिन बनेंगे इन्क़लाब ये,
गिरेंगे जुल्म के महल, बनेंगे फिर नवीन घर!
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!.... तू जि़न्दा है।।