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छत्तीसगढ़ एक खोज: सैंतालीसवीं कड़ी- प्रवीर चंद्र भंजदेव : एक अभिशप्त नायक या आदिवासियों के देवपुरुष

छत्तीसगढ़ एक खोज: सैंतालीसवीं कड़ी- प्रवीर चंद्र भंजदेव : एक अभिशप्त नायक या आदिवासियों के देवपुरुष

- रमेश अनुपम
लोहंडीगुड़ा गोलीकांड के तीन दिन बाद मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. कैलाशनाथ काटजू बस्तर आए। 4 अप्रैल को उन्होंने आला अधिकारियों के साथ बैठक की और खानापूर्ति के नाम पर घटनास्थल तक गए।
बस्तर के संवाददाताओं के सवालों के जवाब में उन्होंने कहा कि लोहंडीगुड़ा में लॉ एंड ऑर्डर की दृष्टि से गोली कांड की घटना उचित है। जैसा कि अधिकारियों ने उन्हें बताया कि वहां स्थिति बेहद गंभीर थी इसलिए गोली चलाना जरूरी था। डॉ. काटजू के साथ तत्कालीन उपमंत्री जनसंपर्क एवं योजना एस. जाजू भी उपस्थित थे।
हमारे मुख्यमंत्री जी ने यह भी कहा कि बस्तर के आदिवासियों के उत्थान के लिए हम निरंतर नई-नई योजनाओं को अंजाम दे रहे हैं। उनके विकास के लिए हमारी सरकार कृतसंकल्पित है आदि-आदि।
4 अप्रैल सन 1961 को मुख्यमंत्री डॉ कैलाशनाथ काटजू से एक प्रतिनिधिमंडल ने भी जगदलपुर में मुलाकात कर तीन सूत्रीय मांग से संबंधित एक ज्ञापन सौंपा। इन तीन सूत्रीय मांग में पहली मांग इस पूरे कांड की ज्यूडिशियल इंक्वारी, दूसरी इस घटना के परिपेक्ष्य में जगदलपुर में सर्वदलीय बैठक का आयोजन तथा तीसरी मांग इस गोली कांड से संबंधित अधिकारियों का तत्काल बस्तर से अन्यत्र कहीं स्थानांतरण।
इस प्रतिनिधिमंडल में सोशलिस्ट पार्टी से आर.एस.वाजपेयी एवं सूरजमल बाफना, कम्युनिस्ट पार्टी से सुधीर मुखर्जी, जनसंघ से पंडरी राव कृदत तथा डॉ. पाटनकर शामिल थे।
लोहंडीगुड़ा गोलीकांड में 59 आदिवासियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था। उन पर सशस्त्र विद्रोह का आरोप लगाया गया था। पूरा बस्तर ही नहीं मध्यप्रदेश और समूचा देश इस गोली कांड से और आदिवासियों पर होने वाले जुल्म से क्षुब्ध था।
देर से ही सही पर अंतत: मुख्यमंत्री डॉ. कैलाशनाथ काटजू को लोहंडीगुड़ा गोली कांड की ज्यूडिशियल इंक्वारी का आदेश देना पड़ा। एडिशनल सेशन जज बी. एल. सक्सेना को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई। सुनवाई में भी देर हुई। 1962 के अक्टूबर माह से इसकी सुनवाई जगदलपुर में शुरू हुई।
जनक कुमार आई.पी.एस.जो बस्तर में उन दिनों स्पेशल ड्यूटी पर तैनात थे, उन्हें तत्कालीन एस.पी. मिश्रा ने लोहंडीगुड़ा जाने का आदेश दिया था। सुनवाई में उनकी गवाही महत्वपूर्ण थी । उन्हें जांच कमेटी के सामने खड़े होना पड़ा।


इस सुनवाई के दरम्यान कलेक्टर आर.एस.एस. राव, डी.आई.जी. पी. सी. राय, ,एस.पी.आर. पी. मिश्र, एस. डी.एम. मुदलियार के बयान लिए गए।
पुलिस और प्रशासन के सभी अधिकारियों ने लॉ एंड ऑर्डर की दुहाई देते हुए लोहंडीगुड़ा गोली कांड को उचित ठहराया था। एक सरकारी गवाह मोहन पटेल जिसे बाद में सरकारी वकील ने होस्टाइल करार कर दिया उसके बयान मायने रखते हैं। मोहन पटेल लोहंडीगुड़ा का ही रहने वाला था। आदिवासियों की भीड़ उसके घर के आसपास ही जमा थी।
मोहन पटेल ने जांच कमेटी को बताया कि भीड़ महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव को तुरंत रिहा करने की मांग कर रही थी। अधिकारियों ने उनसे कहा कि तीन दिन में वे महाराजा को रिहा करवाकर बस्तर ले आयेंगे। आदिवासी उनकी बात ठीक से नहीं समझ सकें। उन्हें कोई हल्बी में समझाने वाला नहीं था। आदिवासी अपने मुंह से सक-सक की आवाज निकालने लगे। पुलिस ने पहले बिना सोचे-समझे भीड़ पर अश्रु गैस का प्रयोग करना शुरू कर दिया और इसके बाद तुरंत उन पर ताबड़-तोड़ गोली चलाना प्रारंभ कर दिया।
बचाव पक्ष के वकील के रूप में रविशंकर वाजपेयी, एम. श्रीनिवासम, सुरेश दत्त झा, गोरेलाल झा, विंधेश दत्त मिश्रा तथा एल.एन. सोनी इस सुनवाई के दरम्यान उपस्थित रहे। बहरहाल इस जांच कमेटी की सुनवाई से जो निष्कर्ष निकलकर सामने आया उससे यह साबित होता है कि पुलिस और प्रशासन अगर चाहती तो इस अप्रिय गोली कांड से बचा जा सकता था। इस व्यापक नरसंहार की जरूरत बिल्कुल ही नहीं थी।
भोले-भाले निरीह और निहत्थे आदिवासियों पर 40 राउंड गोली चलाकर पुलिस ने कोई बहादुरी का काम नहीं किया था।
दरअसल यह गोली बस्तर के आदिवासियों के सीने पर नहीं उनके स्वाभिमान पर चलाई गई थी, जो केवल अपने प्रिय महाराजा की शांतिपूर्वक रिहाई की मांग कर रहे थे।
अप्रैल 1963 में लोहंडीगुड़ा गोली कांड में कैद किए गए 59 आदिवासियों को न्यायालय ने निर्दोष करार दिया और उन्हें जेल से रिहा किया गया। पुलिस उन सबके खिलाफ एक भी साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफल रही।
कुल मिलाकर लोहंडीगुड़ा गोली कांड शासन और प्रशासन की विफलता साबित हुई। शासन-प्रशासन की नियत और आदिवासियों के प्रति उनकी सोच को इस गोली कांड ने जैसे पूरी तरह से एक्सपोज कर दिया था।
आदिवासी हमारे लिए न पहले कोई चिंता का विषय थे और न अब हैं। लोहंडीगुड़ा गोली कांड को बीते हुए भले ही आज साठ वर्ष हो गए हों पर वह आदिवासियों के सीने को भेदती हुई गोली आज भी आदिवासियों के सीने पर धंसी हुई हैं।
आदिवासियों की दैत्याकार मूर्ति बनाकर भले ही मुक्तांगन से लेकर बस्तर के प्रवेश द्वार चारामा तक लगवा दिए जाएं, आदिवासी लोक नृत्य के नाम पर उन्हें नचवाकर अपनी पीठ भी थप-थपा ली जाए पर आदिवासियों के साथ आज भी हम कितना न्याय कर पाए हैं, इस पर गंभीरता और ईमानदारी के साथ विचार करने की आज सबसे अधिक जरूरत है। अन्यथा इस थोथे आदिवासी प्रेम की कलई खुलने में ज्यादा देर नहीं लगेगी।
लोहंडीगुड़ा गोलीकांड आज भले ही इतिहास के पृष्ठों में कहीं दफन हो चुका है। इस गोली कांड की धमक भले ही अतीत के गर्त में समा चुका है, पर हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि इतिहास कभी-कभी करवटें भी बदलता है और जब वह ऐसा करता है तो बीता हुआ इतिहास वर्तमान बनकर हमारे सामने चुनौती देते हुए न केवल खड़ा हो जाता है वरन् हमारी आंखों में आंखें डालकर हमसे सच पूछने का साहस भी कर सकता है।
वह समय शायद अब आ चुका है।

शेष अगले सप्ताह...