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स्व सहायता समूह की महिलाओं ने सीखा बाँस से रोजमर्रा के उपयोग की वस्तुएं बनाना

स्व सहायता समूह की महिलाओं ने सीखा बाँस से रोजमर्रा के उपयोग की वस्तुएं बनाना

इको फ्रेंडली एवं सस्टेनेबल लाइवलीहूड में बाँस है बहुत उपयोगी

दुर्ग, 4 नवंबर। दुर्ग जिला पंचायत द्वारा स्व सहायता समूह की महिलाओं के कौशल संवर्धन के लिए विशेष प्रयास किए जाते रहे हैं। इसी कड़ी में एनआरएलएम (बिहान) के तहत महिलाओं को बाँस से दैनिक उपयोग की विभिन्न चीजें निर्मित करने का प्रशिक्षण दिया गया। जिला पंचायत सीईओ श्री सच्चिदानंद आलोक ने बताया कि ग्रामीण महिलाओं को अलग-अलग तरह के उत्पाद निर्माण की ट्रेनिंग दी जाती है, ताकि कौशल संवर्धन के साथ-साथ आजीविका के साधन भी निर्मित हों। साथ ही इको फेंडली एवं सस्टेनेबल लाइवलीहूड में बाँस के बहुआयामी उपयोग  को देखते हुए इस प्रशिक्षण का आयोजन किया गया। बाँस आसानी से उपलब्ध होता है। इसलिए इनसे बहुत से उपयोगी सामग्रियों का निर्माण सीख कर महिलाओं ने एक नया हुनर भी सीखा।

अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त प्रशिक्षक श्री गनी जमान ने दिया प्रशिक्षण,बताया बाँस से सैकड़ों उत्पाद हो सकते हैं निर्मित- महिलाओं को प्रशिक्षण देने के लिए वर्ल्ड बैम्बू ऑर्गेनाइजेशन  तथा द बैम्बू फोरम ऑफ इंडिया की सदस्य भी है। करीब 25 सालों से श्री गनी जमान बाँस के क्षेत्र में काम कर रहे  हैं। विशेष रूप से इन महिलाओं को प्रशिक्षित करने आए श्री जमान ने बताया कि इससे पहले उन्होंने आर्किटेक्चर की विद्यार्थियों को आधुनिक एवं वैज्ञानिक तरीके बाँस का इस्तेमाल भवन निर्माण में करने की ट्रेनिंग दी है। बिरला इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, सीईटी भुवनेश्वर, गुवाहाटी कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर एसबीए विजयवाड़ा, गीतम यूनिवर्सिटी डिपार्टमेंट ऑफ आर्किटेक्चर विशाखापट्टनम, श्री श्री यूनिवर्सिटी कटक, वेल्लोर इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी, मेस्ट्रो स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर के विद्यार्थियों को प्रशिक्षण दिया है। लेकिन इन महिलाओं के साथ काम करने का अलग ही अनुभव रहा उन्होंने बताया कि महिलाएं अपने घर पर ही रह कर बाँस से दैनिक उपयोग की सैकड़ों चीजें बना सकती हैं और विक्रय कर आमदनी अर्जित कर सकती हैं। महिलाओं को ट्रेनिंग देकर एक आत्म संतुष्टि हुई क्योंकि इससे आर्थिक स्वावलंबन के साथ-साथ उनके आत्मविश्वास में भी बढ़ोतरी होगी। चार पैसे जब महिलाओं के हाथ मे आते हैं तो वो परिवार के हित में ही इस्तमाल करती हैं जिससे पूरे परिवार का जीवन स्तर भी सुधरता है।

बाँस के रखरखाव का तरीका भी सीखा- प्रशिक्षण में गांव को केवल बाँस के उत्पाद बनाना ही नहीं सिखाया गया, बल्कि लंबे समय तक उन वस्तुओं को सुरक्षित रखने के लिए बाँस के रखरखाव के बारे में भी सिखाया गया। बाँस को बैक्टीरिया की मदद से वैज्ञानिक तरीके से कैसे दीमक से बचाने के तरीके के साथ-साथ बोरिक एसिड व बोरिक पॉवडर की मदद बाँस को सुरक्षित रखने के तरीका भी सिखाया गया।

छत्तीसगढ़ में बाँस से जुड़े उद्योगों के लिए असीम संभावनाएं, किसानों की आय में वृद्धि के साथ कुटीर उद्योग, कपड़ा, कागज उद्योग में भी है उपयोगी-  श्री गनी जमान ने बताया बाँस एक ऐसी वनस्पति है जिसके अनगिनत उपयोग हैं। मकान, पुल, फर्नीचर, बर्तन, कपड़ा, दैनिक उपयोग की वस्तुओं के साथ-साथ सजावटी सामान बाँस से बनते हैं। इसके अलावा बाँस के औषधीय उपयोग भी हैं। उन्होंने बताया कि वो नार्थ ईस्ट के रहने वाले हैं जहां 50 से अधिक प्रजातियां उगती हैं। उत्तर पूर्वी राज्यों के जीवन का अभिन्न हिस्सा है। बाँस की श्रेष्ठ कारीगरी भी होती है। बाँस हमारे जीवन और संस्कृति का अभिन्न अंग है और इसका इस्तेमाल धार्मिक अनुष्ठानों कला और संगीत में भी किया जाता है। बाँस 4-5 साल में परिपक्व हो जाता है जबकि ठोस लकड़ी वाले किसी पेड़ को परिपक्व होने में करीब 60 साल लगते हैं। लेकिन इमारती लकड़ी वाले पेड़ों से अलग हटकर बाँस की पर्यावरण पर बुरा असर डाले बगैर कटाई की जा सकती है। बाँस का पेड़ भारी वर्षा या कम वर्षा, दोनों ही तरह की जलवायु में पनप सकता है। हर साल इसके एक पेड़ से 8-10 शाखाएं निकलती हैं। अन्य पेड़ों की तुलना में बाँस का पेड़ 35 प्रतिशत अधिक ऑक्सीजन वायुमंडल में छोड़ता है और 20 प्रतिशत कार्बन-डाई-ऑक्साइड अवशोषित करता है। बाँस की वैज्ञानिक तरीके से खेती करने से वायुमंडल में आक्सीजन का उत्सर्जन और कार्बन-डाई-ऑक्साइड का अवशोषण बढ़ाकर पर्यावरण में भी सुधार लाया जा सकता है।

लक्ष्मी ने पारंपरिक बसूपा, टोकरी, झऊँहा,पर्रा के साथ अब नई नई चीजें बनाना सीखा- छत्तीसगढ़ में  बाँस यहाँ की परंपरा से जुड़ा हुआ है मकान बनाने से लेकर धार्मिक अनुष्ठान तथा दैनिक उपयोग की सूपा, टोकरी, झऊँहा, पर्रा आदि का निर्माण बाँस से किया जाता है। लेकिन अब तक यह कार्य केवल एक विशेष समुदाय के लोगों द्वारा किया जाता था।  श्रीमती लक्ष्मी कड़रा बताती है उनका पैतृक काम बाँस से जुड़ा है 20 सालों से वो टुकनी पर्रा , चरिहा आदि बना रही हैं, लेकिन आधुनिक समय में हर वर्ग के लोगों को जोड़कर इससे अच्छी आमदनी अर्जित की जा सकती है। इस प्रशिक्षण में महिलाओं को टेबल लैंप, विंड चाइम, रेनमेकर झूला, मोबाइल स्पीकर, कपड़े लटकाने का हैंगर, साड़ी लटकाने का हैंगर चिमटा डस्टबिन इत्यादि निर्मित करना सिखाया गया। जो एक तरह से इनके काम में वैल्यू एडिशन है।

महिलाओं ने बहु उपयोगी ‘बैम्बू चारकोल’ बनाना भी सीखा- प्रशिक्षण में महिलाओं को बाँस से चारकोल बनाना भी सिखाया गया। जो बहुत ज्यादा उपयोगी है। भवन निर्माण, फर्नीचर और दूसरी वस्तुओं के निर्माण के दौरान जी अनुपयोगी बाँस बचता है उससे बैंबू चारकोल बनता है। इस तरह आम के आम गुठलियों के भी दाम वाली कहावत चरितार्थ होती है। बैम्बू चारकोल का उपयोग एयर फ्रेशनर से लेकर सौंदर्य प्रसाधनों के निर्माण में होता है।

ये है बाँस की उपयोगी प्रजातियां-  विगत 25 वर्षों से लगातार बाँस के क्षेत्र में कार्य कर रहे श्री जमान ने बताया कि डेंड्रोकैलैमस गाईंगेंटस भवन निर्माण हेतु बहुत उपयोगी है। इसकी ऊंचाई 100 फीट तक और मोटाई 7 इंच होती है। इसकी कम्प्रेशन क्षमता बहुत अधिक होती है। इसी प्रकार डेंड्रोकैलैमस हेमुलटेनाई प्रजाति में बहुत अधिक लचक होती है जिसके कारण यह कांवर इत्यादि के निर्माण में प्रयुक्त होता है। इसकी मोटाई 3 इंच व लंबाई 80 मीटर तक डेंड्रोकैलैमस बालकुआ को ‘ग्रीन स्टील’ भी कहा जाता है जो भवन एवं पुल निर्माण में उपयोगी है। उन्होंने बताया माइल्ड स्टील की कम्प्रेशन क्षमता 26 हजार पाउंड अर्थात लगभग 11 हजार 793 किलोग्राम है, वहीं डेंड्रोकैलैमस बालकुआ की कम्प्रेशन क्षमता 28 हजार पाउंड अर्थात 12 हजार 700 किलोग्राम है। इसकी मोटाई 4 इंच तक वाल की थिकनेस 2.5 इंच व लंबाई 80 फीट तक होती है। इसी प्रकार बैम्बूसा तुलदा प्रजाति अगरबत्ती उद्योग में उपयोगी है। इसकी मोटाई 2.5 इंच व लंबाई 30 फीट तक होती है।

20 समूह  से की महिलाओं ने लिया प्रशिक्षण- एनआरएलएम में लाइवलीहुड की डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम मैनेजर सुश्री नेहा बंसोड़ ने बताया कि प्रशिक्षण में 20 स्व सहायता समूह की महिलाएं सम्मिलित हुई जिन्होंने बाँस से दैनिक उपयोग की एवं सजावट की सामग्रियां बनाना सीखा। इस प्रशिक्षण का उद्देश्य महिलाओं का कौशल उन्नयन था। प्रशिक्षण में शामिल हुई महिलाओं ने बताया कि उन्हें यह प्रशिक्षण बहुत उपयोगी लगा।  इसके माध्यम से वो दैनिक उपयोग की वस्तुएं बनाना सीख रही हैं। महिलाओं ने कहा कि वे अपने काम में और सुधार तथा परफेक्शन लाकर अच्छा करने की कोशिश करेंगी। ताकि इस प्रशिक्षण का कमर्शियल फायदा उठा कर आय अर्जित कर सकें।