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विकास उपाध्याय पर कांग्रेस ने दांव क्यों खेला, कईयों के सपनों पर पानी फिरा, सम्पादक अनिल द्विवेदी का कालम : छत्तीस घाट

विकास उपाध्याय पर कांग्रेस ने दांव क्यों खेला, कईयों के सपनों पर पानी फिरा, सम्पादक अनिल द्विवेदी का कालम : छत्तीस घाट

असम में फूल' उखाड़ने को तैयार !


  • अनिल द्विवेदी

सालों पहले मेरी एक पोस्ट फेसबुक पर वायरल हुई थी. देश सुनामी आपदा से जूझ रहा था और कांग्रेस पार्टी पीड़ितों की मदद के लिए ट्रकों राशन भिजवा रही थी. अनाज सामग्री से भरा एक ट्रक पहुंचा तो बोरियां उतारने के लिए मजदूर नही थे. एयरकंडीशंड नेता मोबाइल हाथ में लिए गुहार लगा रहे थे तभी युवक कांग्रेस के तत्कालीन राष्ट्रीय सचिव विकास उपाध्याय साथियों के साथ पहुंचते हैं और अपने बलिष्ठ कंधों पर बोरियां लादकर उसे खाली कर देते हैं. मैं बात कर रहा हूं संसदीय सचिव और विधायक विकास उपाध्याय की जिन्हें कांग्रेस आलाकमान ने शोभनीय घोषणा करते हुए राष्ट्रीय सचिव और असम राज्य का प्रभारी नियुक्त किया है. बधाई और शुभकामनाएं उन्हें.

आलाकमान के इस फैसले ने जन-मन को ही नही पार्टी के दिग्गज नेताओं को भी चौंकाकर रख दिया. अक्लमंद अटकलें यह हैं कि विकास के संबंधों की फसल जितनी दिल्ली में उर्वरा हुई, उसी के समानांतर राज्य में भी. उन्हें सर्वाइवर’ के तौर पर जाना जाता है. पुरानी कहावत है, आगत का आभास अतीत से मिलता है. सन् 2001 याद आ रहा है. केन्द्र में एनडीए की सरकार थी और नईदिल्ली में जेएनयू चुनाव उफान पर था तब तक विकास उपाध्याय कांग्रेस की छात्रविंग एनएसयूआई की कॉलेज विंग के प्रेसिडेंट थे. अचानक उनसे मैं टकरा गया. फिर हम दोनों पूरे दिन जेएनयू चुनाव का जायजा लेते रहे. विकास ने तो दो-तीन सभाओं को भी संबोधित किया. उनके तेवर और संबंधों को देखकर मैं इतना तो समझ गया था कि महाराज 'अश्वमेध' घोड़ा साबित होंगे.

पार्टी का चक्रवर्ती केंद्र तो गांधी परिवार ही है जिनके सिपहसालारों खासकर मीनाक्षी नटराजन और राजीव सातव का विश्वास विकास ने जीत रखा है तभी तो लगातार दो विधानसभा चुनाव हारने के बाद भी तीसरी बार टिकट मिली और जीते भी. संसदीय सचिव बनाने के लिए भी कांग्रेस आलाकमान ने विकास का पूरा साथ दिया था! विकास एनएसयूआई के राष्ट्रीय सचिव, स्टेट प्रेसिडेंट, युवक कांग्रेस के सचिव, फिर महासचिव भी रहे. केन्द्रीय नेतृत्व ने उन्हें पांच से ज्यादा राज्यों का प्रभारी और विधानसभा चुनाव में बतौर प्रचारक भेजकर उनके नेतृत्व-कौशल की परीक्षा पहले ही ले ली थी और अब असम का भाग्य संवारने की जिम्मेदारी.

पार्टी के इस फैसले ने राज्य के राजनीतिक धुरंधरों के मन में तूफान मचाकर रख दिया है. उन्हें डर है कि विकास भविष्य के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हो सकते हैं! फिलवक्त केन्द्र में छत्तीसगढ़ से दो वरिष्ठ चेहरे हैं. एक हैं मोतीलाल वोरा और दूसरे हैं ताम्रध्वज साहू. वोरा लगभग सन्यास ले चुके हैं और साहू स्टेट पालिटिक्स में रम गए हैं तो क्या इन दो चेहरों से खाली हुए शून्य को भरने के लिए विकास को चुना गया है! यदि ऐसा है तो देवेन्द्र यादव, विपिन मिश्रा, दीपक मिश्रा आदि युवा चेहरे भयाक्रांत हैं कि उनकी कांग्रेसियत का क्या होगा! दिलचस्प दिमाग कह रहा है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को भी उपाध्याय की यह उड़ान कितना रास आएगी!

जनश्रुति हे जइसन बोंही, तइसन लूही. विकास उपाध्याय ऐसे नेता के तौर पर उभरे हैं, जिसे हालात नेपथ्य में धकेलता है, पर वह हमेशा पुरजोर वापसी कर दिखाते हैं. गजब का धैर्य, आत्मविश्वास और साहस है उनमें. नई जिम्मेदारी ने विकास उपाध्याय के सिर पर फूलों की जगह कांटों भरा ताज रखा है. उन्हें एक साथ कई मोर्चों पर लड़ना है. जिस राज्य की भाषा और खान—पान से लेकर सब कुछ जुदा हो, वहां हिन्दी पटटी का युवा नेता क्या गुल खिलाएगा, यह बड़ा सवाल हजारों दिमाग में है लेकिन ऐसी ही चुनौती तो इंदौर के कैलाश विजयवर्गीय के समक्ष भी रही जिन्हें भाजपा ने मार्कसवादी गढ़ पश्चिम बंगाल का प्रभारी बनाया गया.

असम जो कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था, अब वह भाजपा और अन्य क्षेत्रीय दलों के कब्जे में है. ताजा तस्वीर यह है कि वहां स्वायत्त परिषद के चुनाव में भाजपा ने 36 में से 33 सीटों पर कब्जा जमाया है. कांग्रेस के प्रभारी के तौर पर विकास उपाध्याय के लिए यह कठिन टास्क है कि वहां पार्टी को फिर से सत्ता पर काबिज कराया जाए. उन्हें ना सिर्फ असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी में चल रहे विवादों को शांत करना होगा बल्कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टी की जीत भी सुनिश्चित करनी होगी. असम कांग्रेस में भगदड़ मची है. खबर है कि गोलाघाट से चार बार की कांग्रेस विधायक और राज्य की पूर्व मंत्री भाजपा में शामिल हो सकती हैं.

युद्ध में झण्डे के कारण राष्ट्रीय जोश पैदा होता है और लोग जान दे देते हैं. असम में प्रभारी के तौर पर विकास उपाध्याय से ऐसी ही भूमिका की उम्मीद बंधी है. क्या विकास उपाध्याय इस अति-चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी को निभा पाने में सफल होंगे? सनद रहे कि लोकतंत्र में लड़ाइयां सिर्फ संसद में नहीं लड़ी जातीं. जनांदोलन खडे़ करने पड़ते हैं. शहर जिला कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष रहते हुए विकास उपाध्याय ने यह अनुभव भी समेट रखा है. हालांकि वे अनुभवी और परिपक्व राजनेता हैं और अब तक विवादों से दूर रहे हैं. कम से कम दुश्मनी, अधिक से अधिक दोस्ती, उनका उसूल है. यह सियासी शैली असम-घाटी में कितनी कारगर होगी, इसे देखना दिलचस्प होगा. लक्ष्य कठिन जरूर है पर असंभव नही.



( लेखक दैनिक आज की जनधारा और वेब मीडिया हाउस के स्थानीय संपादक हैं )