कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः अपना-अपना नहीं दुख है सबका

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः अपना-अपना नहीं दुख है सबका


अपने-अपने दुख का भार उठाते

सब हैं सब से दूर

अपना-अपना सुख कल्पित कर

नहीं देख पाते हैं सब की ओर

सब के दुख के तापों से दूर

अपने सुख के पापों से दूर

गिनते रहते सब के पापों को

खूब कोसते 

देते रहते शाप दूर से सब को


बैर पालता जीवन

रचता रहता घृणा से भरे 

अपने-अपने स्वर्ग

ले जाता है सब को सब से दूर

नहीं उठा पाता

सब के दुख का भार


पूरे जीवन में 

बसा हुआ है सब का दुख

प्रकट होता है जीवन 

सब के दुख के बीच

अपना-अपना नहीं 

दुख है सब का