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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - इक न एक शमा अंधेरे में जलाये रखिए

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - इक न एक शमा अंधेरे में जलाये रखिए

सुभाष मिश्र
तारिक बदायूंनी की गजल का एक शेर है
इक न इक शम् अँधेरे में जलाए रखिए
सुब्ह होने को है माहौल बनाए रखिए
कोरोना के इस आपदापूर्ण समय में बहुत से लोगों के आचरण, क्रियाकलाप और गैर जिम्मेदाराना पूर्ण रवैय्यै से पूरे देश में गुस्सा, निराशा है, वहीं कुछ लोग अपनी रचनात्मकता और अपने सेवाभाव के जरिए हमारे भीतर नई उर्जा का भी संचार कर रहे है। इस समय इम्युनिटी बूस्ट करने में दवा से ज्यादा लोगों की मदद, उनकी सोच, पहल लोगों के भीतर सकारात्मक उर्जा का संचार कर रही है।
इस अंधेरे समय में अब सब एक-दूसरे को रौशनी का भरोसा दे रहे हैं। कोरोना संक्रमण के बारे में रोज-रोज आ रही बातें अंधे में हाथी की तरह है। हर कोई उसे अपने तरीके से बता रहा है। सबके अपने-अपने अनुभव हैं जो कुछ भोगे हुए हैं, कुछ सुने हुए और कुछ सोशल मीडिया से मिले रहा ज्ञान है। मीडिया में आने वाली खबरें घर बैठे लोगों को डरा रही है। यही वजह है कि बहुत से सोशल मीडिया समूह में लोग कोरोना से डराने वाली, विचलित करने वाली और निधन, श्रध्दाजंलि की खबरें पोस्ट नहीं करने की अपील कर रहे है। सुबह उठकर व्हाट्सअप ग्रूप खोलने पर हम इस बात का शुक्रिया अदा करते हैं की हम बचे हुए हैं, हमें कोरोना नहीं हुआ, वरना हमारा भी वैसा ही हाल हो सकता है, जैसा बहुत से लोगो का हो रहा है। मौत से ज्यादा खौफ कोरोना से होने वाली बीमारी के कारण होने वाली मौत का है। आदमी कोरोना से मौत के बाद अपने ही लोगो के लिए कितना बेगाना हो जाता है, जिसे चार कंधा देने वाले भी नसीब नहीं होते। उसकी शवयात्रा स्थानीय निकाय या ठेके पर काम कर रहे लोगों के भरोसे ऐसे निकलती है जैसे कोई लूट का सामान चोरी छिपे जा रहा है। घर के लोग दूर से मूकदर्शक बने केवल देखते हैं। सबको अपनी जान जो प्यारी है।
ऐसे समय में जो लोग कुछ कर सकते हैं वे भी शुतुरमुर्ग की तरह अपना सिर छिपाकर बैठे हैं या फिर इतने बड़बोले और झूठे हैं, की उन्हें लगता है, हम है तो जहान भी है। जान है तो जहान है का नारा पता नहीं कहां गुम सा हो गया। न अब जान है, ना जहान है। केवल कोरोना का भय है। कोरोना वायरस के कहर से बचने के नाम पर लाकडाउन के जरिए अधिकांश लोग इसकी चैन को ब्रेक करने के लिए अपने-अपने घरों में है। जब जरूरत पड़ रही है तभी घर से बाहर निकल रहे हैं। जो खाता-पीता तबका है, जिसे हर माह अच्छी खासी तन्हखा मिलती है, वह आर्थिक दबाव से मुक्त है, इसलिए वह ज्यादा ज्ञानी और सोशल मीडिया पर ज्यादा सक्रिय है। जिसका काम-धंधा, रोजी-रोटी छिन गई है, जिसे खाने के लाले पड़ रहे हैं, वह आदमी सोच रहा है कि यदि कोरोना से बच भी गया तो गरीबी, भूखमरी और उसकी जरूरतें, उधारी उसे मार डालेंगी।
जो लोग घर में हैं और जिनके पास टीवी, इंटरनेट, मोबाईल, लैपटाप है, वे अपने घर बैठे-बैठे दूरदर्शन, टाटास्काई, जियो वीडियो कान या फिर ओटीटी प्लेट फार्म पर नेट फिलक्स, अमेजान, हाट स्टार, जी-5, एमएक्स प्लेयर आदि एप के जरिये फिल्में, वेबसीरिज और बिना दर्शकों वाला आईपीएल मैच देखकर अपना समय काट रहे हैं। यह समय ऐसा है जिसमें ना कोई किसी को बुला रहा है और ना किसी के पास जा रहा है। जहां चार-यार मिल जाएँ वहीं रात को गुलजार कहने वाले भी अपने-अपने प्याले या तो अकेले लिए बैठे है या मारे डर के इम्युनिटी के चक्कर में काढ़ा पी पा रहे हैं।
मिर्जा गालिब का एक मशहूर किस्सा है। एक बार वो अपना वजीफा (पेंशन) लेने जा रहे थे, तो उनकी बेगम जो बहुत धार्मिक प्रवृत्ति की थी, जिसका अल्लाहताला पर बहुत भरोसा था, उन्होंने कहा कि आप लौटते वक्त सालभर की रसद (अनाज) लेते आईयेगा। गालिब जब घर लौटे तो उनके आगे बहुत सी गाडिय़ों ड्रम से भरकर चली आ रही थी। गाडिय़ों को आते देखकर बेगम बहुत खुश हुई पर जब गाडिय़ां नजदीक आई तो देखा उसमें शराब के ड्रम भरे हुए हैं। बेगम बहुत नाराज हुई और बोली ये क्या आपको रसद लाने कहा था आप शराब ले आये। इस पर गालिब साहब ने कहा बेगम फिक्र क्यों करती हो जिस अल्लाह ने तुम्हे पैदा किया है, पेट दिया है, अनाज भी वहीं देगा लेकिन वो शराब नहीं देगा। इसलिए मैं शराब ले आया।
गालिब साहब का जमाना बीत गया। बहुत से पीने वालों ने लाकडाउन के पहले सरकार के राजस्व में बढ़ौतरी करने के लिए अपना कोटा इक्कठा कर लिया था। जो नहीं कर पाये थे उन्हें रेमडेसिविर, आक्सीजन सिलेंडर की ही तरह शराब भी ब्लेक में मिल रही है। ये सब बेचने वाले कोई गरीब-गुरबे नहीं है। ये वो लोग हैं जो आपदा को अवसर में बदलने का हुनर जानते हैं। ये लोग अक्सर सत्ता के नज़दीक देखे जाते हैं। पैसों के बूते पर इनके सैंया हमेशा कोतवाल रहते हैं।
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव का अंतिम चरण समाप्त हुआ। उत्तरप्रदेश में पंचायत चुनाव खत्म हुए। तेलांगाना में स्थानीय निकाय के चुनाव होने वाले हैं। सारे चुनावों में नेताओं की रैली, उनके आचरण ने बता दिया की उन्हें लोगों के जीने-मरने, कोरोना संक्रमित होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। स्थानीय चुनाव में नेताओं को डेड बाडी से ज्यादा लोकल बाडी की चिंता है। वहीं हमारा चुनाव आयोग जो लगभग केंद्र की कठपुतली की तरह आचरण कर रहा है, उस पर कोर्ट की फटकार का कोई असर नहीं है। वह अभी भी दिखावे के लिए कुछ निर्देश जारी कर अपना पल्ला झाड़ रहा है। कोर्ट के आदेश भी बेमानी साबित हो रहे हैं। कोरोना के बढ़ते आँकड़े इन आदेश-निर्देश की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं।
पूरे देश में कोरोना संक्रमण को लेकर जो डर, पीड़ा और मृत्यु भय व्याप्त है, उस समय बहुत सारे लोग इस डर को कम करने के लिए गीत, संगीत, कविता और इस तरह की कहानियो को आगे लाने के काम में लगे हैं, जो लोगों का हौसला बढ़ाये। हमने देखा है कि आजादी की लड़ाई में हमारे कौमी तराने जिनमें कदम-कदम बढ़ाये जा खुशी की गीत जाये जा, ये जिंदगी है कोम की तू कोम पर लुटाये जा गा रहे थे या फिर मेरा रंग दे बसंती चोला गाकर देश को जागृत कर रहे थे। जब चीन से हमारा युद्ध हुआ उस समय भी बहुत से गानों, फिल्मों और किस्सों के जरिये लोगों का हौसला बढ़ाया गया। जब भी 15 अगस्त, 26 जनवरी या कोई राष्ट्रीय पर्व होता है तो हमें ये मेरे वतन के लोगों जरा आंख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी जरा याद करो कुर्बानी जैसा गीत या कर चले हम फिदा जा वतन साथियों अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों जरूर सुनाई देता है।
कोरोना संक्रमण की इस भीषण आपदा में एक बार फिर कुछ गीत, कविताएं, और ऐसे लोगों के किस्से सुनाई दे रहे हैं, जो हमारे मनोबल को बढ़ाने का काम कर रहे हैं। फिल्म बातों-बातों में किशोर कुमार का गाया गीत - कहां तक ये मन को अंधेरे छलेंगे, उदासी भरे दिन कभी तो ढलेंगे या फिर अंकुश फिल्म का गाना जो स्कूली प्रार्थना तक में शामिल है च्च्इतनी शाक्ति हमें दे ना दाता मन का विश्वास कमजोर हो ना, हम चले नेक राहो पर हमसे भूल कर भी कोई भूल हो ना। च्च्
शैलेंद्र का 1955 में लिखा गया गीत जो बहुत सालों से लोगों के हौसलों को बढ़ा रहा है।
तू जि़न्दा है तो जि़न्दगी की जीत में यकीन कर,
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!
ये ग़म के और चार दिन, सितम के और चार दिन,
ये दिन भी जाएंगे गुजऱ, गुजऱ गए हज़ार दिन,
हज़ार भेष धर के आई मौत तेरे द्वार पर
मगर तुझे न छल सकी चली गई वो हार कर।
जिस तरह हमारे गायको, संगीतकारों ने हमारे देश की विविधता और सतरंगी संस्कृतिस आपसी भाई-चारे को राष्ट्रीय एकता के साथ प्रदर्शित करने के लिए च्च्मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा कंपोज किया था, उसी तरह इस कोरोना काल में भी कुछ ऐसी ही रचनाएं आई हैं, जो लोगों का हौसला बढ़ा रही है।
हमारी सारी धार्मिक, पौराणिक और मिथक कथाओं में हमारे ईश्वर हमारा हौसल्ला बढ़ाते है। इस हौसल्ले को बढ़ाने वाले सबसे लोकप्रिय भगवान हनुमान हैं। भूत पिशाच निकट नही आयें, महावीर जब ना सुनाएं। यही वजह है की आज बहुत सी मोटिवेशनल स्पीच में हनुमान चालीसा से मरीजों का आत्मविश्वास बढ़ाया जा रहा है। कोरोना संक्रमित मरीजों के मन से डर को दूर करने और आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए हौसलाÓ मोटीवेशनल कार्यक्रम की शुरुआत की गई है। मरीजों के लिए मोटिवेशनल स्पीच, प्रेरणा देने वाले गीत, कहानी व महापुरुषों के वक्तव्य सुनाए जा रहे हैं, इससे उनके आत्मविश्वास में बढ़ोतरी की जा रही है।
उज्जैन में शर्मा बंधु के नाम से मशहूर जोड़ी जिसने 1974 में फिल्म परिणय का गीत च्च्जैसे सूरज की गरमी से जलते हुए तन को मिल जाए तरुवर की छाया...ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है, मैं जबसे शरण तेरी आया...मेरे राम...। इन्होने कोरोना पर गीत लिखा जो सोशल मीडिया के जरिए हलचल मचा दी है। पं. गोपाल, कौशलेंद्र, राघवेंद्र व सुखदेव शर्मा चारों भाई शर्मा बंधु के नाम से जाने जाते हैं। उनके द्वारा लिखे गीत में कोरोना से लडऩे और सतर्क रहने संबंधी बातें कही गई हैं।
विश्वास छोडि़ए ना ये आस छोडि़ए ना, जीतेंगे डरो नहीं हारेगा कोरोना।
स्वस्थ रहो, मस्त रहो, घर में ही रहो और व्यस्त रहो।
कुछ हंसने में कुछ गाने में, खतरा है बाहर जाने में।
विश्वास छोडि़ए ना ये आस छोडि़ए ना, जीतेंगे डरो नहीं हारेगा कोरोना।

भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) कॉन्स्टेबल विक्रम जीत सिंह ने एक गाना गाया है। गाने के बोल वरुण कुमार ने लिखे हैं। जो तेरे हौसले को सलाम मेरा, है ये दुनिया को पैगाम मेरा..साथ मिलकर लड़ेंगे हम.. मरने से ना डरेंगे हम रख हौसला, हिम्मत ना हार.. । कोरोना वॉरियर्स को समर्पित किया है। इसी तरह अलग-अलग कवि, संगीतकार, कलाकारों ने अपनी रचनात्मकता के साथ समाज का हौसला बढ़ाने में लगे हुए हैं। इस समय देश को भाषणबाज़ी, लफ्फ़़ाज़ी की नहीं, सही हौसल्ले के साथ सही रणनीति की ज़रूरत है। काश हमारे देश के हुक्मरान जनता के मन की बात जान सकते।
मौजों की सियासत से मायूस ना हो फ़ानी।  
गरदाब (पानी का भँवर) की हर तह में साहिल नजऱ आता है।।