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राज्य.बजट : सरकार की 'हाईट' बढ़ाने वाला बजट है..! वरिष्ठ पत्रकार अनिल ​द्विवेदी की त्वरित टिप्पणी. कोरोना की मार से जूझ रहे आम छत्तीसगढ़िया का मन कोई नया टैक्स ना मिलने से बल्ले बल्ले है!

राज्य.बजट : सरकार की 'हाईट' बढ़ाने वाला बजट है..! वरिष्ठ पत्रकार अनिल ​द्विवेदी की त्वरित टिप्पणी. कोरोना की मार से जूझ रहे आम छत्तीसगढ़िया का मन कोई नया टैक्स ना मिलने से बल्ले बल्ले है!
  • अनिल द्विवेदी

अब इसे संयोग ही कह लीजिए कि आज विधानसभा में पेश हुए राज्य बजट में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरकार के बीच दो समानताएं नजर आईं. पहला यह कि सीएम ने पूरे बजट में एक नया शब्द हाईट' गढ़ा. यानि कि एच से हालिस्टिक डेवलपमेंट यानि समग्र विकास.. ई से एजुकेशन यानि शिक्षा के समान अवसर.. आई से इंफ्रास्ट्रक्चर यानि अधोसंरचना.. जी से गवर्नेंस यानि प्रशासन और एच से हेल्थ यानि स्वास्थ्य के आधार पर गढ़बो छत्तीसगढ़. और दूसरा यह कि पीएम मोदी ने बजट के लिए महिला वित्त मंत्री पर भरोसा जताया था तो सीएम भूपेश बघेल ने महिला वित्त सचिव, आइएएस अलरमेल मंगई डी पर.

इकॉनामिक्स की किताब में कभी एक कहावत पढ़ी थी कि किसी का दुर्भाग्य अन्य का सौभाग्य होता है. गुजरे दिनों जब हमने केंद्रीय वित्त मंत्री का यूनियन बजट देखा था तो चुनिंदा राहतों के अलावा भारतीयों को कुछ खास नही मिल सका था और इसकी वजह अर्थशास्त्रियों ने कोरोनाकाल को बताया था लेकिन हमर राज के मुखिया मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने जो स्टेट बजट पेश किया, उससे यह साबित होता है कि महामारीकाल से निकली विवशताओं से जूझते हुए या उन्हें समझते हुए भी बघेल जी ने आम आदमी को बड़ी राहत प्रदान की है अन्यथा केन्द्र सरकार पेट्रोल और गैस सिलेण्डर के दाम जिस तरह बढ़ाती जा रही है, मध्यम वर्ग का तेल निकल गया है!

विधानसभा में विधायक दल के नेता भूपेश बघेल ने करीब 97 हजार 106 करोड़ का बजट पेश किया जिसमें हरेक तबके को सीएम ने कुछ न कुछ देने की कोशिश की है- चाहे वे किसान हों, ग्रामीण हों, शहरी हों, पटवारी हों, पत्रकार हों, ठेकेदार हों, वृद्ध हों, एससी-एसटी या व्यापारी, उन्होंने सबको राहत दी है. अपने बजट भाषण का समापन करते हुए उन्होंने ठीक ही कहा कि रास्ते की अड़चनों से, हम कभी डरते नहीं : बात हो जब न्याय की, पीछे कभी हटते नहीं. भूपेश बघेल जानते हैं कि महंगाई और बढ़ते दामों से छत्तीसगढ़ की जनता हलाकान है, इसके बावजूद उन्होंने कोई टैक्स नही लादा. आपको आश्चर्य होगा कि जब सारा देश पेट्रोल 100 रूपये लीटर में खरीद रहा है, छत्तीसगढ़ में यह 11 रूपये कम मिल रहा है.

तमाम राज्यों की तरह कोरोना से आर्थिक फिसलन का शिकार छत्तीसगढ़ भी हुआ है. महीनों तक लॉकडाउन के चलते बाजार बंद रहे और राजस्व नही मिल सका. स्थानीय नगरीय निकायों ने भी कर संग्रहण के लिए कोई ज्यादती नही की. दूसरी ओर कोरोनाकाल में ही तो हमने वह सूची भी देखी है जिसमें भारत के शीर्ष 11 अरबपतियों की आमदनी कोविड-काल में इतनी बढ़ी कि इस राशि से वे देश की समूची जरूरतमंद आबादी को कोरोना का टीका लगवा सकते हैं या अगले 10 वर्षों तक मनरेगा का खर्च उठा सकते हैं. लेकिन आम नागरिक के पास तो किराने से लेकर बिजली बिल चुकाने तक के पैसे नहीं हैं. वह किन चुनौतियों से जूझ रहा है, यह कृषक रह चुके भूपेश बघेल बखूबी जानते हैं. लेकिन सवाल यह है कि इसके लिए संसाधन कहां से आएंगे? क्योंकि वित्त मंत्री ने खुद कहा है कि कोई टैक्स नही लादा गया है. फिर उन्होंने कई रियायतें भी दे दी हैं, वहां से भी कलेक्शन कम आएगा तो उसका बोझ अलग है। हां, आबकारी, राजस्व और केन्द्र सरकार की कृपा रही तो जीएसटी से राज्य सरकार का खजाना भर सकेगा!

प्रदेश के अर्थशास्त्री आश्चर्य कर रहे हैं कि जब आय नही होगी तो खर्च कहां से आएगा! मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इसके लिए  आबकारी, खनिज और जीएसटी की प्राप्तियों पर केंद्रित किया है. पिछले साल के मुकाबले सिर्फ एक हजार करोड़ आय का लक्ष्य तय किया गया है जबकि कुल व्यय दो हजार करोड़ अनुमानित है. नए टोल टैक्स शुरू करने के पीछे भी राजस्व बटोरना ही लक्ष्य है. राष्ट्रीय स्तर पर 4.2 प्रतिशत वृद्धि की तुलना में राज्य की वृद्धि दर 1 प्रतिशत अधिक है और प्रति व्यक्ति आय भी 22 हजार तक पहुंच गई है. यह दर्शाता है कि बघेल सरकार ने जो योजनाएं लागू कीं, उसका अप्रत्यक्ष रूप से फायदा जनता तक पहुंचा है क्योंकि विकास योजनाएं पूर्ण हो रही हैं और नई सृजित भी की जा रही हैं. हमर मुखिया के नेक—दृष्टि स्पष्ट है कि सरकार चलाने के लिए पैसा जरूर चाहिए लेकिन वह आम आदमी की जेब में चूना लगाकर तानाशाह तरीके से नही निकाला जाएगा.

इसमें कोई दो राय नहीं कि वित्त मंत्री ने लक्ष्य काफी अच्छे-अच्छे घोषित किए हैं, मगर हरेक बजट की यह विडंबना रही है कि लक्ष्य तो अच्छे-अच्छे ऐलान कर दिए जाते हैं, मगर वे हासिल नहीं हो पाते. हम बजट में दिखा देते हैं कि हमारा कर राजस्व ज्यादा होगा, गैर-कर राजस्व भी अधिक आएगा और जब ऐसा नहीं होता, तो सरकारी खर्चों में कटौती कर देते हैं. इसलिए इस बजट को लेकर भी यही आशंका है, क्योंकि कर राजस्व उस रफ्तार से बढ़ने की सूरत नजर नहीं आ रही, जिस रफ्तार का दावा सरकार कर रही है, या फिर हमारा राजस्व घाटा बढे़गा. इस वक्त ही हमारा सकल वित्तीय घाटा 6000 करोड़ तक पहुंच गया है. क्या हम इसे और ज्यादा बढ़ाने को तैयार हैं!

इतिहास की पुरानी सीख है कि आर्थिक असमानताओं का लंबा सिलसिला असंतोष जनता है. असंतोष से अविश्वास पैदा होता है और अविश्वास अक्सर आम आदमी को सड़कों पर उतरने के लिए बाध्य कर देता है जैसा कि हम नईदिल्ली में किसानों या अन्य उपभोक्ता आंदोलनों में देख चुके हैं. लेकिन छत्तीसगढ़ के किसान को या नागरिक को अपनी सरकार, अपने मुख्यमंत्री पर भरोसा है. ताजा बजट में भी वह टूटा नही है. विपक्षी कानाफूसी करने लगे हैं कि क्या सरकार की हाईट' बढ़ रही है!


( लेखक दैनिक आज की जनधारा समाचार-पत्र के संपादक हैं )