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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - भूपेश है तो भरोसा है

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -  भूपेश है तो भरोसा है

- सुभाष मिश्र

जन्मदिन पर विशेष

जिस तरह राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा समर्थकों का मानना है कि मोदी है तो मुमकिन है, उसी तरह छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल के जन्मदिन के लिए जगह-जगह लगाए गए होर्डिंग में लिखा है भूपेश है तो भरोसा है। दरअसल कोई भी नारा जब गढ़ा जाता है तो उसके पीछे बहुत से निहितार्थ छिपे होते हैं। छत्तीसगढ़ की वर्तमान राजनीति में सबसे जुझारु तेवर और जमीनी हकीकत को समझकर बोल्ड डिसिजन लेने वाला कोई जननेता है तो वह है भूपेश बघेल। भूपेश बघेल ने अपनी पहचान अपने तेवर और संघर्ष के बूते पर बनाई है।

जब पूरे देश में भाजपा कांग्रेस मुक्त भारत का नारा बुलंद कर अपने अश्वमेघ का घोड़ा दौड़ा रही थी तो अकेला छत्तीसगढ़ जैसा राज्य था जिसने उसे विधानसभा चुनाव में वो शिकस्त दी जिसकी कल्पना किसी भी भाजपा के नेता को नहीं थी। 15 साल की सत्ता के बाद 90 विधानसभा सीटों में से 15 पर सिमटने वाली भाजपा को यदि किसी नेता से खौफ है, तो उसका नाम है भूपेश बघेल। झीरमघाटी में हुई नक्सल हिंसा में अपने 32 शीर्ष नेताओं की जान गंवाने के बाद कांग्रेस ने अपना नेतृत्व भूपेश बघेल को सौंपा। भूपेश बघेल ने पदयात्राएं कर कांग्रेस संगठन में नई जान फूंकी। यूं तो छत्तीसगढ़ विधानसभा के चुनाव 2024 में है लेकिन कांग्रेस और भाजपा दोनों ने अभी से अपनी तैयारी प्रारंभ कर दी है।

छत्तीसगढ़ी अस्मिता के साथ गांव, गरीब और किसान की चिंता करने वाले भूपेश बघेल ने अपनी कार्यशैली और निर्णयों से छत्तीसगढिय़ापन को नये उत्साह और उमंग से भर दिया है। मुख्यमंत्री निवास में चाहे वह तीजा मनाने की बात हो या हरेली का त्यौहार। छत्तीसगढ़ी तीज त्यौहार हो या यहां की महान विभूतियां सभी की पूछपरख चहुं ओर बढ़ी है। छत्तीसगढ़ी बोलते हुए अब यहां का रहवासी हिचकता नहीं, गर्व महसूस करता है।

दुर्ग जिले के पाटन में 23 अगस्त 1961 को जन्मे भूपेश बघेल मूलत: किसान हैं। यही वजह है कि उन्हें गांव के गरीब किसान से लेकर खेतीहर मजदूर तक की पीड़ा का सही ज्ञान है। मुख्यमंत्री बनते ही भूपेश बघेल सरकार ने 17 दिसम्बर 2018 को किसानों से 2500 रुपये प्रति क्विंटल धान की खरीदी का निर्णय लेकर 80 लाख मीट्रिक टन से अधिक की धान खरीदकर किसानों को तीन हजार करोड़ का भुगतान किया। कर्ज के बोझ से दबे किसानों के अल्पकालीन ऋण माफ कर 19 लाख किसानों को 11 हजार से अधिक के कर्जे से मुक्ति दिलाई। नरवा, गरुवा, घुरवा, बाड़ी जैसी योजना लाकर ग्रामीण आर्थिक व्यवस्था को मजबूती प्रदान की। चिटफंड कंपनियों के बहकावे में आकर उनके लिए काम करने वाले युवाओं के खिलाफ प्रकरणों को समाप्त कर चिटफंड कंपनियों द्वारा ठगे गए निवेशकों को उनकी राशि वापस दिलाने का बीड़ा उठाया। देश में अपने तरह की अनूठी और चौंकाने वाली गोबर खरीदी की गोधन न्याय योजना प्रारंभ कर पशुपालकों और किसानों को बड़ी राहत दी। पूरे छत्तीसगढ़ में गौठान बनाकर अब तक 99 करोड़ 8 लाख रुपए की गोबर खरीदी 26वीं किश्त के भुगतान के साथ हो चुकी है।
भूपेश है तो भरोसा है तब ज्यादा प्रभावी तरीके से सामने आया जब ढाई-ढाई साल की सत्ता की बात मीडिया में जोर-शोर से प्रचारित की गई। टीएस सिंहदेव के नाम से भूपेश विरोधियों ने ढाई साल का ट्रम्प कार्ड खेला और यह बताने की कोशिश है कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर भूपेश बघेल ढाई साल के लिए है। कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व ढाई साल बाद टीएस सिंहदेव को मुख्यमंत्री बना देगा। ढाई साल निकल गये और यह भ्रम भी लोगों के बीच से साफ हो गया कि यहां भूपेश बघेल के अलावा और कोई कांग्रेस के मुख्यमंत्री की कुर्सी का दावेदार है। इस बीच रुठने मनाने का खेल भी चला।

भूपेश बघेल सरकार में भारी-भरकम बहुमत में बहुत से विधायक मंत्री पद नहीं पा सके। विधायकों के साथ कांग्रेस के निष्ठावान नेताओं को निगम-मंडल में पद देकर बहुत हद तक संतुष्ट कर दिया है। चार नये जिले बनाकर प्रशासनिक क्षेत्रिय संतुलन को भी कायम रखा है। अविभाजित मध्यप्रदेश में पाटन विधानसभा से 1993 में निर्वाचित होकर विधायक बनने वाले भूपेश बघेल की कहानी भी किसी रोमांचक कहानी से कम नहीं है। छत्तीसगढ़ की राजनीति के चाणक्य समझे जाने वाले वासुदेव चन्द्राकर को लोग उनका राजनीतिक गुरु बताते हैं। 1993 के बाद 1998 में पुन: पाटन से विधायक निर्वाचित होने के बाद उन्हें मध्यप्रदेश की दिग्विजय सरकार में राज्यमंत्री बनाया गया। 2003 में एक बार फिर पाटन से विधानसभा सीट जीतने वाले भूपेश बघेल 2004 और 2009 में दुर्ग संसदीय क्षेत्र से लोकसभा सीट और 2004 में पाटन से विधानसभा चुनाव हार गये। उसके बाद 2013 और 2018 में वे पाटन से पुन: विधायक बने। 2018 के चुनाव में पाटन में अपनी शानदार जीत दर्ज कर भूपेश बघेल छत्तीसगढ़ कांग्रेस की ओर से पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री बने। इसके पहले अजीत जोगी नवंबर 2000 में मुख्यमंत्री बने थे, तब अविभाजित मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह की सरकार थी। अजीत जोगी सरकार में भूपेश बघेल मंत्री रहे किन्तु दोनों की प्रतिद्वंदिता जगजाहिर है। भूपेश बघेल ने ही जोगी जी को कांग्रेस से बाहर का रास्ता दिखाया। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आया भूपेश बघेल अपने भरोसे को जनअपेक्षा के अनुरुप बनाया। छत्तीसगढ़ में विधायकों के बहुमत के आधार पर यहां कांग्रेस सरकार बनी जो 2004 के विधानसभा में पराजित हुई और 15 साल तक कांग्रेस का गढ़ समझे जाने वाले छत्तीसगढ़ में भाजपा का शासन रहा।

जब पूरा देश बेरोजगारी, आर्थिक तंगी और पलायन से जूझ रहा था तब छत्तीसगढ़ राज्य ने कोरोना संक्रमण से उपजी स्थितियों से निपटते हुए ग्रामीण क्षेत्र में जहां एक ओर धान खरीदी के माध्यम से किसानों को नगद भुगतान किया, वहीं दूसरी ओर मनरेगा जैसी योजना का बेहतर क्रियान्वयन कर छत्तीसगढ़ के मजदूरों को उनके घर के नजदीक काम देकर कैश फ्लो को बनाये रखा।

भूपेश बघेल अपने तेवर से लगातार ये काम करते रहे हैं। वे उन फूलछाप या कमल छाप कांग्रेसियों में से नहीं हैं, जो दोनों जहान को साधे रहते हैं। कांग्रेस में बहुत सारे नेता ऐसे हैं, जिनकी सोच भाजपा के बहुत ही नजदीक की है। यही वजह है कि जब सत्ता का लालच दिखता है, तो बहुत से लोग अपनी ही पार्टी से बगावत करके अपनी सरकार गिराकर भाजपा में उपस्थिति दर्ज कराते हैं।

विधानसभा में पराजित हुई और कांग्रेस का गढ़ समझे जाने वाले छत्तीसगढ़ में भाजपा का 15 साल तक राज रहा ।

भूपेश बघेल के तेवर हमेशा से आरएसएस के खिलाफ तीखे रहे हैं। वे अपने आपको गांधी के विचारों के नजदीक पाते हैं। उनके निर्णयों में गांधी के ग्राम स्वराज की झलक साफ दिखाई देती है। भूपेश बघेल अपने तीसरे साल में अब गांवों के साथ-साथ शहरों को भी साधने में लग गये हैं। कांग्रेसजन भूपेश बघेल की कार्यप्रणाली से सहमत हों या असहमत हों उन्हे यह कहना ही पड़ रहा है कि भूपेश है तो भरोसा है।