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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -आरक्षण का खेल कोई पास कोई फेल

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -आरक्षण का खेल कोई पास कोई फेल

-सुभाष मिश्र

चुनाव आते ही पार्टियां जाति, धर्म, संप्रदाय के नाम पर वोट पाने के लिए बहुत कुछ करने पर आमदा रहती है। देश की आजादी के बाद से अब तक चाहे लोकसभा के चुनाव हो या विधानसभा के सभी जगह जातिगत आरक्षण एक बड़ा मुद्दा होता है। हमारे देश में आरक्षण के नाम पर मंडल आयोग की सिफारिशों को लेकर जो हालात बने वे किसी से छिपे नहीं हैं। सरकारों के पास नौकरियां नहीं है। शिक्षण संस्थानों की कमी है या यदि वे है भी तो वहां उच्च शिक्षा के लिए सीटें बहुत ही कम हैं। ऐसे में प्रवेश पाने से वंचित विद्यार्थियों के मन में आरक्षण को लेकर बहुत सारे सवाल, गुस्सा और संशय रहता है। बहुत सारे राजनीतिक दलों को अलग-अलग जाति समुदाय के बीच वैमनस्यता के बीज बोने का मौका मिल जाता है। अभी पिछले दो सालों में कोरोना संक्रमण के कारण करोड़ों लोगों की नौकरी गई है, बहुतों के सामने रोजी-रोटी का संकट है। सरकार की ओर से स्थापना व्यय कम करने के नाम पर स्वीकृत पदों को कम किया जा रहा है। नई भर्तियां बंद हैं। अच्छे और उच्च शिक्षण संस्थानों में सीटें कम होने से प्रवेश के लिए मारामारी है। शिक्षा का अधिकार लागू होने के बावजूद गरीब और कमजोर वर्ग के बच्चे अच्छी शिक्षा से वंचित हैं। समाज ने ऊंच-नीच, छुआ-छूत की मनोवृत्ति बनी हुई है। अभी भी बहुत से एकलव्य और कर्ण जैसे होनहार विद्यार्थी गुरु द्रोणाचार्य से शिक्षा पाने में वंचित हैं। आरक्षण की तमाम व्यवस्था के बावजूद आरक्षित वर्ग के लोगों की बेरोजगारी कम नहीं है।

सरकारी नौकरी के लिए मंगाए गए आवेदनों में एक पद के लिए एक अनार सौ बीमार लाईन में लगे हैं। ऐसे समय नौकरी से और कालेजों में एडमिशन से वंचित वर्ग को आरक्षण के नाम पर बरगलाना आसान है।

देश के वरिष्ठ पत्रकार और राजनेता अरुण शौरी की पुस्तक आरक्षण का दंश पढ़ते हुए लगा की देश, प्रदेश में लागू आरक्षण की व्यवस्था की थोड़ी पड़ताल की जाये। अरुण शोरी ने अपनी किताब की भूमिका में देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के आरक्षण को लेकर विचारों को लिखा है। पंडित नेहरू आरक्षण के पक्षकार शुरुआत से नहीं थे, उन्होंने कहा था कि यह न केवल मूर्खता है, बल्कि दुर्भाग्यपूर्ण भी है। उन्होंने कहा था हम अपनी परंपरागत लीक से हट रहे हैं। ऐसे में हमारे लिए अपनी आरक्षण की आदत और किसी जाति या समुदाय विशेष को विशेषाधिकार देने की प्रवृत्ति से बाहर निकलना होगा। 27 जून 1961 को उन्होंने राज्यों के मुख्यमंत्रियों को इस संबंध में पत्र लिखा था उसमें वे साफ तौर पर कहते हैं कि वे किसी तरह के आरक्षण के पक्षकार नहीं हैं। खासतौर पर नौकरियों में वे कहते हैं मैं ऐसी किसी भी व्यवस्था के खिलाफ हूं जो हमें अकुशलता या दोयम दर्जे की ओर ले जाए। आरक्षण पर सर्वोच्च न्यायालय की एक टिप्पणी का अंश है-योग्यता और श्रेष्ठता की धारणा शुद्ध आर्यवादी मन की उपज है। जिसे आर्यों ने अपने एकाधिकार को सुरक्षित बनाए रखने के लिए अपनाया था। भारत की उच्च जाति के शासकों ने देश के मूल निवासियों अछूत आदिवासियों पिछड़ी जाति और धार्मिक अल्पसंख्यक को स्थायी रूप से अपना दास बनाए रखा है।

अरुण शोरी ने अपनी किताब आरक्षण का दंश में लिखते हैं- वस्तुत: ये न्यायाधीश अपने पहले के प्रगतिवादियों के वक्तव्य को सिर्फ दोहराते ही नहीं हैं बल्कि उसे और भी ज्यादा ठोस बनाकर प्रस्तुत करने की कोशिश करते हैं। इस प्रकार उन्हें एक तरह से उन्हें यही लगता है कि अपने सभी प्रगतिवादियों द्वारा प्रस्तुत की गई धारणा को एक मजबूत आधार प्रदान करने में सहयोग देना, उनकी बाध्यता है।

अभी हाल ही में मेडिकल कालेज में पी.जी. एडमिशन की काउसिंलिंग पर लगी रोक को हटाते हुए पूर्व में केंद्र और राज्य की आरक्षण व्यवस्था को यथावत रखा है। मेडिकल पीजी सीट में केंद्र राज्य का 50-50 प्रतिशत कोटा निर्धारित है। राज्य की ओर से लागू आरक्षण की व्यवस्था में 12 प्रतिशत एससी, 32 प्रतिशत एसटी और 14 प्रतिशत ओबीसी का कोटा है। वहीं केंद्र की ओर से आबंंटित सीटों में एससी 7.5 प्रतिशत, एसटी 27 प्रतिशत ओबीसी का कोटा है। छत्तीसगढ़ में पहली बार सेंट्रल के 27 प्रतिशत कोटे के अनुसार पीजी के एडमिशन में ओबीसी वर्ग को लाभ मिलेगा। इसके अलावा 10 प्रतिशत ईडब्ल्यूएस के वर्ग के लोगों को भी सीटों के आवंटन का लाभ मिलेगा। पूरे प्रदेश में 201 पीजी की सीटें है। जिसमें केंद्र राज्य की सीटों का प्रतिशत 50-50 है। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की रोक के कारण राज्य के कोटे में ईडब्ल्यूएस वर्ग को फिलहाल लाभ नहीं मिल पा रहा है।

मेरे सहकर्मी रहे देश के नवगीतकार स्व. भगवान स्वरुप सरस की लिखी कविता याद आती है-
दूध कटोरा तक्षक को, शैशव को सिसकी,
सबका सब आकाश बंाधकर, चीलें खिसकी,
कब तक अपनी भूख नारों और झुंझनों से बहलाएं,
छोटे-छोटे दरवाजे हैं, आदमकद इच्छाएं।

हमारे देश में आरक्षण की राजनीति उतनी ही पुरानी है जितनी की हमारे देश का स्वतंत्रता का इतिहास। हर चुनाव के पहले आरक्षण का मुद्दा अक्सर गर्म रहता है। बिहार, उत्तरप्रदेश के नेता जनगणना में जातिगत गणना की मांग कर रहे हैं। वर्तमान में जनगणना के दौरान एससी, एसटी का डाटा एकत्र किया जाता है। ओबीसी का डाटा इकट्ठा नहीं किया जाता। देश में जाति आधारित राजनीति करने वाले चाहते हैं कि गणना जाति आधार पर हो ताकि उन्हें अपने वोट बैंक की असली ताकत का अहसास हो सके और वे सत्ता में भागीदारी के लिए बारगेनिंग कर सके।

इंदिरा साहनी विरुद्ध भारत सरकार फैसला जिसे बाद में मंडल आयोग के नाम से जाना गया उसके अनुसार आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए था। पूर्ववर्ती मध्यप्रदेश और वर्तमान छत्तीसगढ़ में वर्ष 1998 से 2012 तक 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था थी। 2012 में 50 प्रतिशत के आरक्षण को बढ़ाकर 58 प्रतिशत कर दिया। सरकार के इस फैसले के खिलाफ बिलासपुर उच्च न्यायालय में चार याचिकाएं 599/592/593/594-2012 विचाराधीन है। पहले एससी वर्ग के लिए 16 प्रतिशत, एसटी के लिए 20 प्रतिशत और ओबीसी के लिए 14 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था थी उसे 2012 में बदलकर एससी के लिए 16 प्रतिशत से घटाकर 12 प्रतिशत, एसटी के लिए 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 32 प्रतिशत कर दिया गया। ओबीसी का 14 प्रतिशत यथावत रखा गया।

सरकार के इस फैसले से छत्तीसगढ़ के एससी वर्ग में काफी आक्रोश था बावजूद इसके भाजपा सरकार ने 2013 में एससी बाहुल्य क्षेत्र से जीत हासिल की। छत्तीसगढ़ भूपेश बघेल सरकार ने दिसंबर 2019 में एक अध्यादेश जारी कर ओबीसी के आरक्षण को 27 प्रतिशत करने और ईडब्ल्यूएस के आरक्षण को 10 प्रतिशत करने का आदेश किया जिस पर हाईकोर्ट से स्टे ले लिया गया जो अभी तक लागू है। हाईकोर्ट के पास सरकार ओबीसी और ईडब्ल्यूएस का कोई अधिकृत डाटा उपलब्ध नहीं करा पायी। ओबीसी की गणना करने के लिए पटेल आयोग गठित किया जिसका कार्यकाल 2021 दिसंबर को समाप्त हो गया। अब इसे पुन: बढ़ाया जा रहा है। छत्तीसगढ़ में पदोन्नति के पदों पर मिलने वाले आरक्षण पर कोर्ट आदेश के कारण रोक लगी हुई है। इस समय जो भी प्रमोशन किये जा रहे हैं वह कामन से सीनियारटी के आधार पर इन शर्तों के साथ किये जा रहे हैं कि कोर्ट का फैसला मान्य होगा। वर्तमान में नई भर्ती में कुल 58 प्रतिशत जिनमें 12 प्रतिशत एससी, 32 प्रतिशत एसटी और 14 प्रतिशत ओबीसी का आरक्षण लागू है।

सरकारी नौकरियों में आरक्षण के लिए राज्य और जिले का कॉडर अलग-अलग होता है। छत्तीसगढ़ की बात करें तो राज्य सरकार पर नई भर्ती के लिए 12 प्रतिशत एससी, 32 प्रतिशत एसटी और 14 प्रतिशत ओबीसी के लिए आरक्षण की व्यवस्था है। वहीं जिला स्तर पर यह व्यवस्था वहां की आबादी के अनुपात में है। रायपुर-दुर्ग जिले में केवल 34 प्रतिशत आरक्षण लागू है। क्योंकि यहां एससी-एसटी की संख्या कम है। इसके उलट दंतेवाड़ा में 94 प्रतिशत आरक्षण लागू है। यहां एसटी को 76 प्रतिशत, एससी को 4 प्रतिशत और ओबीसी के लिए 14 प्रतिशत आरक्षण है।

अभी उत्तरप्रदेश, पंजाब में चुनाव होने है जहां की आबादी का 45 प्रतिशत और एक तिहाई ओबीसी वर्ग का है। 1979 में मंडल आयोग की रिपोर्ट में कहा गया था कि 1980 तक देश में 2399 पिछड़ी जातियां है जिनके 837 अत्यंत पिछड़ी है। मंडल आयोग के समय देश में 2052 पिछड़ी जातियां थी वहीं 1994 में इनकी संख्या बढ़कर 3700 हो गई। ओबीसी वर्ग के आरक्षण में क्रीमीलेयर का जो निर्धारण किया गया था उसमें पहले 6 लाख वार्षिक आय का प्रावधान था जिसे 2017 में भाजपा की सरकार ने बढ़ाकर 8 लाख रूपए की आय सीमा किया बाद में इसे बढ़ाकर 12 लाख रुपए कर दिया गया है। ओबीसी वर्ग को 1992 में 52 प्रतिशत माना गया। आरक्षण जो पहले दस वर्षों के लिए था वह साल दर साल बढ़ता गया। अब यह कमजोर पिछड़े और सामाजिक आर्थिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ी जाति, समूह के बदले राजनीतिक एजेंडा बन गया है जिस पर सरकार कुछ नहीं कहना चाहती।