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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -क्रिया की प्रतिक्रिया कहीं घातक न हो जाए

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  -क्रिया की प्रतिक्रिया कहीं घातक न हो जाए

-सुभाष मिश्र

फिल्म एक्टर नसीरुद्दीन शाह ने एक बार फिर अपने बयान से विवाद खड़ा कर दिया है। मिर्जा गालिब और बहुत से दमदार किरदार निभाकर सिनेमा जगत में अपनी अभिनय क्षमता का लोह मनवाने वाले नसीरुद्दीन शाह ने एक इंटरव्यू में कहा कि मुगल शरणार्थी थे। सोशल मीडिया पर वायरल हो रही क्लिप में नसीरुद्दीन शाह ने कहा कि मुगल भारत में इसे अपनी मातृभूमि बनाने के लिए आए थे और उन्होंने देश को स्थायी स्मारक और नृत्य, संगीत, पेंटिंग और साहित्य की परंपरा दी। सोशल मीडिया पर दिग्गज अभिनेता से कई लोग माफी मांगने को कह रहे हैं, वहीं कुछ तो इतने खफा हैं कि एक्टर को पाकिस्तान भेजने की बात कह रहे हैं। अपने वायरल वीडियो में नसीरुद्दीन शाह को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि मुगलों के तथाकथित अत्याचारों को हर समय उजागर किया जा रहा है। हम भूल जाते हैं कि मुगल वे लोग हैं जिन्होंने देश के लिए अपना योगदान दिया है ये वे लोग हैं जिन्होंने देश में स्थायी स्मारक छोड़े हैं, जिन्होंने नृत्य, संगीत, चित्रकला, साहित्य की परंपरा को दिया है। इसे अपनी मातृभूमि बनाने के लिए मुगल यहां आए थे। आप चाहें तो उन्हें रिफ्यूजी कह सकते हैं। भारतीय सिनेमा का विश्व पटल पर लोहा मनवाने में नसीरुद्दीन शाह पिछले कुछ सालों से खासतौर पर सोशल मीडिया का देश में नेटवर्क बढऩे के बाद वे अक्सर एक खास वर्ग के निशाने पर आ जाते हैं। कई बार ये महसूस किया गया है कि उनके खिलाफ जिस तरह कड़वे बोल के इस्तेमाल होते हैं वो एक एजेंडा का हिस्सा है। किसी सी शख्स को लगातार निशाने पर रखना। उसे एक एक बात पर कटघरे पर खड़ा करना उस व्यक्ति की जिंदगी को पिंजरे में कैद करने जैसा है।

अकबर इलाहबादी का एक बेहद प्रसिद्ध शेर है—
हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता।।


अगर सही मायनों में देखा जाए तो नसीरुद्दीन और उनके जैसे इस देश के कई हस्तियों की स्थिति पर ये शेर बेहद मौजू बैठता है...। नसीरुद्दीन शाह के बयान से सहमत-असहमत हुआ जा सकता है कि यदि इस क्रिया की प्रतिक्रिया के रुप में प्रचारित कर अलग रंग देने की कोशिश की जायेगी तो परिणाम घातक हो सकते हैं। हरिद्वार में जिस तरह से मुसलमानों को देश के बाहर भेज देने की धमकी देना या किसी और तरीके से लानत भेजना हमारी संस्कृति नहीं है। अगर किसी को हालातों से किसी बात से तकलीफ है और वो इसे जाहिर करता है तो इसमें देशद्रोह की बात कहा से आ जाती है। जो लोग नसीरुद्दीन शाह या उन जैसे लोगों को ट्रोल कर रहे हैं वे इस मामले में पूरी तरह से चुप्पी साध लेते हैं। जहां से इस तरह की बातें होती है। जब लोग तरह-तरह की अनर्गल बातें करते हैं तो वहां की राजसत्ता और जिम्मेदार लोग चुप रहते हैं किंतु जब गांधीजी को गाली देने वाले किसी कालीचरण को गिरफ्तार किया जाता है तो इनका स्वर मुखर हो जाता है।

जॉन एलिया ने लिखा था-  
चारासाज़ों की चारा-साज़ी से
दर्द बदनाम तो नहीं होगा।।

पिछले दिनों एक टीवी चैनल में बातचीत करते हुए नसीरूद्दीन ने भारत की तुलना जर्मनी की नाजी सरकार से कर दी थी। उन्होंने कहा था कि जिस तरह नाजीवादियों द्वारा प्रोपेगेंडा फैलाया जाता था उसी तरह आज फंडिंग कर सरकार फिल्में बनवा रही है। उन्होंने इसे इस्लाम फोबिया का नाम दिया था। हालांकि उन्होंने इस दौरान ये भी कहा था कि उनके साथ किसी तरह का भेदभाव फिल्म इंडस्ट्री में हुआ है ऐसा नहीं लगता इस तरह कई मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखने वाले नसीर साब अक्सर कट्टरता के निशाने पर आ जाते हैं।

हालांकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर हमारे देश में सोशल मीडिया पर ऐसे ऐसे बयान चलाए जाते हैं। महापुरुषों के बारे में ऐसी ऐसी मनगढ़ंत कहानियां कही जाती हैं जिसे सहज तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। नेहरू-गांधी परिवार से लेकर कई बड़े नेताओं के बारे में इस तरह की बातों से गूगल भरा पड़ा है लेकिन इस तरह के भ्रामक कंटेंट फैलाने वालों के खिलाफ कभी बात नहीं होती। आजकल तो एक वर्ग के लिए देशभक्ति की परिभाषा ही इन महापुरुषों को भला बुरा कहने तक सीमित रहती है। ऐसे में अभिव्यक्ति को दो अलग-अलग चश्मे से देखना की आदत हमें विश्व बिरादरी के बीच शर्मिंदा कर सकती है। ऐसे में हमे सोचना होगा और असहमति को जगह देकर उसका विरोध ही करना है तो मर्यादा में रहकर ही करना चाहिए।
इन दिनों हवा में हिन्दू-मुस्लिम का सियासी खेल कुछ ज़्यादा ही हो रहा है। फौरी सियासी फ़ायदे के लिये खेले जा रहे इस खेल का मक़सद साफ़ है लेकिन इसके दूरगामी उद्देश्यों पर भी विचार किये जाने की ज़रूरत है। इस दृष्टि से सोचें तो भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने का सपना देखने वाली राजनैतिक महत्वाकांक्षा को यह सपना सच के बहुत कऱीब पहुँचता जान पड़ता है। इसलिए हरिद्वार में संपन्न कथित धर्म संसद में हिंदू राष्ट्र की स्थापना के लिए  एक भिन्न समुदाय के लोगों के संहार के लिए हथियार उठाने का खुले तौर पर आह्वान किया गया। उधर, दूसरे समुदाय के भीतर भी खलबली मची हुई है और कुछ लोग उस पर ऐसी ही तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं। लगता है कि देश में व्यापक हिंसा की पृष्ठभूमि तैयार की जा रही है।

दरअसल पिछले वर्षों में बहुसंख्यकवाद की बढ़ती राजनैतिक ताक़त अब अनियंत्रित हो रही है बल्कि योजनाबद्ध तरीके से उसे उच्छृंखल होने दिया जा रहा है। धर्म संसद के आयोजन के पीछे यदि स्वामी विवेकानंद के शिकागो धर्म सम्मेलन का विचार है तो यह समझना होगा कि स्वामीजी के लिए 1893 का वह आयोजन हिंदू धर्म के उदात्त और समावेशी संस्करण की विजय का उद्यम था। इसलिए उन्होंने सभा में उपस्थित प्रतिनिधियों को भाइयों और बहनों कह कर संबोधित किया था, लेकिन मौजूदा दौर में हिंदू धर्म की राजनीतिक विजय की महत्त्वाकांक्षा के साथ फुँफकार भरने वाले लोग सोची-समझी साजिश के तहत ज़हर उगल रहे हैं। परिणाम यह है कि अल्पसंख्यक समुदाय के भीतर एक तरफ़ भय का माहौल बन रहा है, वहीं उसकी प्रतिक्रिया में उसके भीतर प्रतिकार की मानसिकता को भी हवा देने की आशंका भी पनप सकती है। ऐसी स्थिति में उसके भीतर जुझारूवृत्ति जगाने के लिये उनमें मौजूद कट्टरपंथी तत्त्व सक्रिय हो जाएं और उनकी असुरक्षा ग्रंथि को मज़बूत करने का प्रयत्न तीव्र हो जाए तो अचरज नहीं। पाँच राज्यों के आसन्न चुनाव के पूर्व साम्प्रदायिक उन्माद पैदा करने के लिए जो हिंसक बयानबाज़ी हो रही है उसे चिंगारी मिल जाए तो धधकते देर नहीं लगेगी। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। क्रिया की प्रतिक्रिया का सिद्धांत इस सियासी खेल में पहले ही मान्य किया जा चुका है। समाज क्रूर हिंसा के मुहाने पर खड़ा है। इस खेल को तभी रोका जा सकता है जब राजनीतिक लाभ के लिये धर्म-भावना का दुरुपयोग करने से बचा जाए और सामाजिक सौहार्द्र और प्रेमभाव को सामाजिक पूँजी मानकर विकसित करने का विवेक जागृत किया जा सके।