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होली कविताः सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

 होली कविताः सूर्यकांत त्रिपाठी निराला


केशर की कलि की पिचकारी

Radha Krishna Holi Wallpapers - Wallpaper Cave


केशर की, कलि की पिचकारीः

पात-पात की गात सँवारी ।


राग-पराग-कपोल किए हैं,

लाल-गुलाल अमोल लिए हैं

तरू-तरू के तन खोल दिए हैं,

आरती जोत-उदोत उतारी-

गन्ध-पवन की धूप धवारी ।


गाए खग-कुल-कण्ठ गीत शत,

संग मृदंग तरंग-तीर-हत

भजन-मनोरंजन-रत अविरत,

राग-राग को फलित किया री-

विकल-अंग कल गगन विहारी ।


खेलूँगी कभी न होली


Happy Holi Status | Radha krishna Holi Status | WhatsApp Status Videos

खेलूँगी कभी न होली

खेलूँगी कभी न होली

उससे जो नहीं हमजोली ।


यह आँख नहीं कुछ बोली,

यह हुई श्याम की तोली,

ऐसी भी रही ठठोली,

गाढ़े रेशम की चोली-


अपने से अपनी धो लो,

अपना घूँघट तुम खोलो,

अपनी ही बातें बोलो,

मैं बसी पराई टोली ।


जिनसे होगा कुछ नाता,

उनसे रह लेगा माथा,

उनसे हैं जोडूँ-जाता,

मैं मोल दूसरे मोली

ख़ून की होली जो खेली


Happy Holi Greetings for WhatsApp

युवकजनों की है जान ;

ख़ून की होली जो खेली ।

पाया है लोगों में मान,

ख़ून की होली जो खेली ।


रँग गये जैसे पलाश;

कुसुम किंशुक के, सुहाए,

कोकनद के पाए प्राण,

ख़ून की होली जो खेली ।


निकले क्या कोंपल लाल,

फाग की आग लगी है,

फागुन की टेढ़ी तान,

ख़ून की होली जो खेली ।


खुल गई गीतों की रात,

किरन उतरी है प्रात की ;-

हाथ कुसुम-वरदान,

ख़ून की होली जो खेली ।


आई सुवेश बहार,

आम-लीची की मंजरी;

कटहल की अरघान,

ख़ून की होली जो खेली ।


विकच हुए कचनार,

हार पड़े अमलतास के ;

पाटल-होठों मुसकान,

ख़ून की होली जो खेली ।


मार दी तुझे पिचकारी


Radha Krishna Playing Holi ⬇ Vector Image by © vectomart | Vector Stock  8920960

मार दी तुझे पिचकारी,

कौन री, रँगी छबि यारी ?


फूल -सी देह,-द्युति सारी,

हल्की तूल-सी सँवारी,

रेणुओं-मली सुकुमारी,

कौन री, रँगी छबि वारी ?


मुसका दी, आभा ला दी,

उर-उर में गूँज उठा दी,

फिर रही लाज की मारी,

मौन री रँगी छबि प्यारी।


नयनों के डोरे लाल-गुलाल भरे


Happy Holi Radha Krishna HD Images, Status Updates | | CalendarBuzz

नयनों के डोरे लाल-गुलाल भरे, खेली होली !

जागी रात सेज प्रिय पति सँग रति सनेह-रँग घोली,

दीपित दीप, कंज छवि मंजु-मंजु हँस खोली- मली मुख-चुम्बन-रोली ।


प्रिय-कर-कठिन-उरोज-परस कस कसक मसक गई चोली,

एक-वसन रह गई मन्द हँस अधर-दशन अनबोली-

कली-सी काँटे की तोली ।


मधु-ऋतु-रात,मधुर अधरों की पी मधु सुध-बुध खोली,

खुले अलक, मुँद गए पलक-दल, श्रम-सुख की हद हो ली-

बनी रति की छवि भोली ।


बीती रात सुखद बातों में प्रात पवन प्रिय डोली,

उठी सँभाल बाल, मुख-लट,पट, दीप बुझा, हँस बोली

रही यह एक ठिठोली ।