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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - केंद्र-राज्य टकराहट के बीच ब्यूरोक्रेसी

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - केंद्र-राज्य टकराहट के बीच ब्यूरोक्रेसी

-सुभाष मिश्र
पश्चिम बंगाल के 1987 बैच के आईएएस अधिकारी मुख्यसचिव अल्पन बंदोपाध्याय जो 31 मई को सेवानिवृत्त हो रहे हैं और जिन्हें अभी कुछ दिन पहले ही सरकार ने उनके अच्छे कार्यों को देखते हुए तीन माह की सेवावृद्धि दी है, उनके अचानक दिल्ली तबादले को लेकर राजनीति गरम हो गई है। इसी तरह की राजनीतिक लड़ाई की कीमत अक्सर ब्यूरोक्रेसी को चुकानी पड़ती है। पश्चिम बंगाल में चुनाव के समय भी कुछ अधिकारियों के तबादले करके चुनाव आयोग के जरिये केंद्र ने राज्य को अपनी ताकत और अधिकारो का सांकेतिक रूप से एहसास कराया था। थोड़े दिन पहले सीबीआई की कार्यवाही उसका ज्वलंत उदाहरण है। केंद्र अक्सर विपक्ष की सरकारों और उनके नेताओं को अपनी एजेन्सी के जरिये यह एहसास कराता रहता है की हम हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, झारखंड आदि जगहों पर आये यास तूफान से प्रभावित क्षेत्र का दौरा कर जब पश्चिम बंगाल पहुंचे तो उनकी मीटिंग में मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी विलंब से आई और राहत का मांग का पत्र देकर अयंत्र दौरे पर चली गई। उनके साथ मुख्य सचिव को भी उनके जाना पड़ा। केंद्र सरकार और भाजपा ने इस घटना पर गहरी नाराजगी जाहिर करते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी। कोरोना से उपजी आपदा पर भाजपा नेताओं के एक साथ इतने बयान नहीं आये जितने ममता बैनर्जी के रवैय्ये और विलंब को लेकर आये।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी जिनकी बात बे बात केंद्र से टकराहट होती रहती है। उन्होने कहा कि ये बैठक मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के बीच होनी थी। इस बैठक में विपक्ष के नेता शुभेंद्रु और राज्यपाल क्यों उपस्थित थे? उड़ीसा की बैठक में विपक्ष के नेता को क्यों नहीं बुलाया गया? बाकी राज्यों में भी इस तरह की बैठकों में प्रधानमंत्री विपक्ष को नहीं बुलाते?

सामान्यत: भारतीय सेवा में चयनित अधिकारियों को उनकी पसंद की प्राथमिकता कम और प्राप्त अंकों के आधार पर रेन्डम तरीके से राज्यों का आवंटन होता है। वे जिस राज्य के कॉडर में भेजे जाते हैं, वहां तब तक सेवा देते हैं जब तक की केन्द्र उनकी सेवा प्रतिनियुक्ति पर मांगता नहीं या वे  इम्पेनलड  नहीं हो जाते हैं। सामान्यत: अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति पर जाने के लिए केंद्र की सहमति के बाद राज्य उन्हें जाने की अनुमति देता हैं। अल्पन बंधोपाध्याय के मामले में केंद्र सरकार के कार्मिक प्रशासनिक विभाग ने बिना राज्य सरकार की अनुमति के उन्हें 31 मई तक दिल्ली में ज्वाइनिंग देने कहा है। कांग्रेस सहित बहुत सारी राजनीतिक पार्टियां कह रही है कि आजादी के बाद से अभी तक ऐसा प्रकरण देखने में नहीं आया। सिविल सेवा नियमों के जानकार कहते हैं कि भारत सरकार को यह अधिकार है कि वह भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी की सेवाएं कभी भी ले सकती है क्योंकि उनकी मूल पदस्थापना भारत सरकार के पास ही होती है।
अक्सर यह देखा गया है कि जब कभी भी सत्तारूढ़ नेताओं के बीच लड़ाई-झगड़ा होता है तो उसका खामियाजा ब्यूरोक्रेट को ही भुगतना पड़ता है। पश्चिम बंगाल में हुई घटना पर केंद्र सरकार ममता बैनर्जी का तो कुछ नहीं कर सकती थी, इसलिए उसने अपनी नाराजगी प्रतीकात्मक तरीके ही सही मुख्य सचिव का तबादला कर दर्ज करा दी। अक्सर उन राज्यों में भी जहां एक ही पार्टी या गठबंधन की सरकारें हैं उनके भीतर भी नेताओं के चहेते ब्यूरोकेट की पोस्टिंग और तबादले को लेकर तलवारें खिंची रहती है। बहुत सारे ब्यूरोक्रेट अपने सर्विस नियम को भूलकर नेताओं के साथ पार्टी कार्यकर्ता की तरह काम करते हैं। जब भी कोई सरकार बदलती है, पहली गाज शासकीय सेवको या कहे टॉप के ब्यूरोक्रेट पर तबादले के रूप में गिरती है। सरकार अपनी शक्ति और सामर्थ का प्रदर्शन तबादले के जरिए करती है। समूची ब्यूरोक्रेसी को तबादले के जरिये से यह मैसेज चला जाता है कि कौन सरकार की नाक का बाल है और किसे सरकार ने ठिकाने लगा दिया, लूप लाईन में पटक दिया। डम्पिंग जोन में पटक दिये गये अधिकारी पॉवर लास होकर अक्सर अवसाद में चले जाये जाते हैं। बहुत सारे अधिकारी प्राईम पोस्टिंग पाने के लिए न जाने क्या-क्या जुगाड़ करते हैं। जहां झुकने मात्र से काम चल सकता है वहां बहुत से लोग लेट जाते हैं।

ममता बैनर्जी मुख्यसचिव के इस तरह तबादले को उनका अपमान बता रही है। अब देखना यह है कि मुख्यसचिव क्या स्टैंड लेते हैं। हो सकता है उनकी निष्ठा का ईनाम राज्य में कोई बेहतर पद के रूप में हो। कई बार बहुत सारे ब्यूरोक्रेट, न्यायाधीश इसी आस में रिटायरमेंट के करीब अपना आचरण सत्ता के अनुकूल करके उसी की बात सुनते हैं और आफ्टर रिटायरमेंट पोस्टिंग पाकर उपकृत होते हैं। नजर डालें तो आपको अपने आसपास ही ऐसे बहुत से नाम चेहरे नजर आयेगें।
ममता बैनर्जी ने मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि मेरी जीत केंद्र सरकार से हजम नहीं हो रही है। पीएम मोदी से इजाजत लेने के बाद ही वो वहां से दीघा के लिए रवाना हुई थीं। पीएमओ द्वारा प्रसारित एक तरफा सूचना को चलाकर मुझे अपमानित किया। मैं आपके चरण स्पर्श करने को तैयार हूं। यह राजनीतिक प्रतिशोध बंद करो।

तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा ने तंज कसकर कहा है कि कथित तौर पर 30 मिनट के लिए इतना हंगामा क्यों मचा हुआ है। भारत के लोगों ने 7 सालों तक 15 लाख रुपये के लिए इंतजार किया। एटीएम के बाहर कई घंटों की लाइन लगाई। वैक्सीन के लिए कई महीनों तक इंतजार किया। थोड़ा आप भी वेट कर लीजिए कभी-कभी। ममता बैनर्जी ने प्रधानमंत्री की बैठक में विलंब से आने को लेकर बीजेपी अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने इसे संवैधानिक मर्यादाओं की हत्या करार दिया है। गृह मंत्री अमित शाह ने तो ममता पर आरोप लगाया है कि उन्होंने जनकल्याण से ऊपर अपने अहं को रखा है। वहीं राजनाथ सिंह ने इसे स्तब्ध करने वाला बताया है। इसके साथ ही कई केंद्रीय मंत्रियों ने भी ममता के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

केंद्र व राज्य की लड़ाई के बीच इसके पहले भी दिल्ली के चीफ सेक्रेटरी से लेकर कई राज्यों के ब्यूरोक्रेट कार्यवाही के घेरे में आये हैं। सरकारी अफसरों की दुविधा यह है कि वे किसकी बात माने, किसके साथ खड़े रहे। बहुत सारे अधिकारी अक्सर कवि कुभंनदास के दोहे के याद करते हुए कहते रहते हैं-

संतन को कहा सीकरी सों काम
आवत जात पनहियों टूटी
बिसरि गयो हरि नाम।
जिनको मुख देखें दुख उपजत,
तिनको करिबे परी सलाम