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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - जाति गणना में किसे नफा किसे नुकसान

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - जाति गणना में किसे नफा किसे नुकसान

-सुभाष मिश्र
देश में 2021 में जनगणना होना है। बिहार सहित कुछ राज्यों के नेता चाहते हैं कि इस बार जाति आधारित जनगणना हो। इस बात को लेकर बिहार के सभी राजनीतिक दल के नेताओं ने गत दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भेंट की। आने वाला समय बतायेगा कि जातिगत गणना होने से किसे नफा और किसे नुकसान होगा। जानकार मानते हैं कि ओबीसी वर्ग को सीटों के बंटवारे के साथ-साथ आरक्षण में लाभ होगा। बिहार में जाति की पहचान हटाने को लेकर पूर्व में बहुत से प्रयोग किये गये। लोगों ने अपनी जाति नाम के बाद लगाना भी बंद कर दिया। अधिकांश लोग नितीश कुमार, रवीश कुमार राजीव रंजन और ना जाने क्या क्या उपनाम लगाने लगे लेकिन अब वहीं से जाति गणना की मांग तेजी से उठ रही है।

कबीर साहब लाख समझाईश देकर कह गये हैं कि-
जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान
या संत रैदास कहते हैं जनम जात मत पूछिए, का जात अरु पात, रैदास पूत सब प्रभु के, कोए नहिं जात कुजात।

दरअसल हमारी जातिगत अस्मिता की जड़ें इतनी गहरी हैं कि हम चाहकर भी जातपात से अपने को अलग नहीं कर पाते। जो जितना पढ़ा-लिखा है वह उतना ही ज्यादा जातिवादी है। हमारे विश्वविघालय के अलग-अलग जाति गुट इसके प्रक्षत्य उदाहरण हैं। चुनाव में टिकिटों का बंटवारा हो या आरक्षण देने की बात उसका मुख्य आधार जातिगत संख्या ही है। मनुवादी व्यवस्था के चलते चार वर्णों में बंटा समाज कब छोटी-छोटी जातियों, उपजातियों में विभक्त होकर वोट बैंक में तब्दील हो गया पता ही नहीं चला। हमने आजादी के बाद जनतांत्रिक समाज व्यवस्था को आगे बढ़ाने की बजाय जातिगत जनतंत्र की व्यवस्था को ज्यादा पुख्ता किया। जातिगत गणना की मांग के पीछे अन्य पिछड़ा वर्ग के नेताओं की यह भावना भी छिपी हुई है कि 27 प्रतिशत के आरक्षण घाटे का जो निर्धारण किया गया है, वह पुर्नपरिभाषित हो और जातिगणना के बाद जो वास्तविक आंकड़े आये उसके आधार पर आरक्षण की व्यवस्था है। अभी केन्द्रीय स्तर पर नौकरियों में जो स्थितियां बनी हुई है उनमें अनु. जाति के लिए 17 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति के लिए 6 प्रतिशत और ओबीसी के लिए 5 प्रतिशत नौैकरी है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार देश में 1963 जातियां, 3973 उपजातियां हैं और इनके विरुद्घ 522 नौकरियां हैं।

हमारे देश के नेता कभी अनुसूचित जाति, जनजाति कभी मंडल कमीशन के कारण ओबीसी को मिले आरक्षण को लेकर समाज के युवाओं को आपस में दिग्भ्रमित करते हैं, कोई उन्हें यह सच नहीं बताता कि नौकरी ही उतनी नहीं है जितनी कि बेरोजगारी। निकट भविष्य में उत्तरप्रदेश में विधानसभा चुनाव है उसके बाद लोकसभा चुनाव। भाजपा अपने आपको ओबीसी का हितचिंतक बताते नहीं थक रही है वहीं बिहार जैसे राज्य के नेता और अन्य नेता पिछड़ों को आबादी के अनुसार 27 प्रतिशत आरक्षण की सीमा को बढ़ाना चाहते हैं।

केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने 20 जुलाई 2021 को लोकसभा में दिए जवाब में कहा कि फि़लहाल केंद्र सरकार ने अनुसूचित जाति और जनजाति के अलावा किसी और जाति की गिनती का कोई आदेश नहीं दिया है। पिछली बार की तरह ही इस बार भी एससी और एसटी को ही जनगणना में शामिल किया गया है। इसके ठीक उल्ट भाजपा सरकार नीट परीक्षा के ऑल इंडिया कोटे में ओबीसी आरक्षण देने पर खुद अपनी पीठ थपथपाती रही है। वर्ष 1941 में जनगणना के समय जाति आधारित डेटा जुटाया ज़रूर गया था, लेकिन प्रकाशित नहीं किया गया था। वर्ष 1951 से 2011 तक की जनगणना में हर बार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का डेटा दिया गया, लेकिन ओबीसी और दूसरी जातियों का नहीं दिया गया। इस दौरान 1990 में केंद्र की तत्कालीन विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार ने दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग, जिसे आमतौर पर मंडल आयोग के रूप में जाना जाता है, की एक सिफ़ारिश को लागू किया। जिसके अनुसार अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों को सरकारी नौकरियों में सभी स्तर पर 27 प्रतिशत आरक्षण देने की थी। मंडल आयोग की सिफारिश को लेकर पूरे देश में आंदोलन हुए।

सेंटर फ़ॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के प्रोफ़ेसर और राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार का मानना है, जनगणना में आदिवासी और दलितों के बारे में पूछा जाता है, बस ग़ैर दलित और ग़ैर आदिवासियों की जाति नहीं पूछी जाती है। इस वजह से आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन के हिसाब से जिन लोगों के लिए सरकार नीतियां बनाती है। अनुसूचित जाति, भारत की जनसंख्या में 15 प्रतिशत है और अनुसूचित जनजाति 7.5 फ़ीसदी है। इसी आधार पर उनको सरकारी नौकरियों, स्कूल, कॉलेज़ में आरक्षण इसी अनुपात में मिलता है लेकिन जनसंख्या में ओबीसी की हिस्सेदारी कितनी है, इसका कोई ठोस आंकलन नहीं है। कोर्ट के निर्णय अनुसार 50 फ़ीसदी से ज़्यादा आरक्षण नहीं दिया जा सकता, इस वजह से 50 फ़ीसदी में से अनुसूचित जाति और जनजाति के आरक्षण को निकालकर बाक़ी का आरक्षण ओबीसी के खाते में आता है जिसे लेकर उन राज्यों में असंतोष है जहां ओबीसी की आबादी अधिक है। बिहार, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में भी जातिगत जनगणना की मांग होती रही है। चूंकि वर्ष 2021 है और इसी साल देशभर में राष्ट्रीय जनगणना होना प्रस्तावित है। ओबीसी समाज अपनी जातिगत गणना की मांग कर रहा है ताकि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजातियों की तरह उन्हें भी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिल सके।    

1947 में भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर को संविधान भारतीय के लिए मसौदा समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। भारतीय संविधान केवल धर्म, नस्ल, जाति, लिंग और जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है। बल्कि सभी नागरिकों के लिए समान अवसर प्रदान करते हुए सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछले वर्गों या अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की उन्नति के लिए संविधान में विशेष धाराएं रखी गयी हैं। 10 सालों के लिए उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए अलग से निर्वाचन क्षेत्र आबंटित किए गए हैं।  

 1979 - सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए मंडल आयोग को स्थापित किया गया। आयोग के पास उपजाति, जो अन्य पिछड़े वर्ग कहलाती है, का कोई सटीक आंकड़ा था और ओबीसी की 52 प्रतिशत आबादी का मूल्यांकन करने के लिए 1930 की जनगणना के आंकड़े का इस्तेमाल करते हुए पिछड़े वर्ग के रूप में 1,257 समुदायों कावर्गीकरण किया।

 1980 - आयोग ने एक रिपोर्ट पेश की और मौजूदा कोटा में बदलाव करते हुए 22 प्रतिशत से 49.5 प्रतिशत वृद्धि करने की सिफारिश की। 2006 के अनुसार  पिछड़ी जातियों की सूची में जातियों की संख्या 2297 तक पहुँच गयी, जो मण्डल आयोग द्वारा तैयार समुदाय सूची में 60 प्रतिशत की वृद्धि है।

1990 में मण्डल आयोग की सिफारिशें विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा सरकारी नौकरियों में लागू की गई। 1991 में नरसिम्हा राव सरकार ने अलग से अगड़ी जातियों में गरीबों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण शुरू किया।

1995-संसद ने 77वें सांविधानिक संशोधन द्वारा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की तरक्की के लिए आरक्षण का समर्थन करते हुए अनुच्छेद 16(4)(ए) डाला। बाद में आगे भी 85वें संशोधन द्वारा इसमें अनुवर्ती वरिष्ठता को शामिल किया गया था।

 1998- केन्द्र सरकार ने विभिन्न सामाजिक समुदायों की आर्थिक और शैक्षिक स्थिति कामूल्यांकन करने के लिए पहली बार राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण किया। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण का आँकड़ा 32 प्रतिशत है। जनगणना के आंकड़ों के साथ समझौतावादी पक्षपातपूर्ण राजनीति के कारण अन्य पिछड़े वर्ग की सटीक संख्या को लेकर भारत में काफी बहस चलती रहती है। आमतौर पर इसे आकार में बड़े होने का अनुमान लगाया गया है, लेकिन यह या तो मण्डल आयोग द्वारा या और राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण द्वारा दिए गए आंकड़े से कम है। मण्डल आयोग ने आंकड़े में जोड़-तोड़ करने की आलोचना की है। राष्ट्रीय सर्वेक्षण ने संकेत दिया कि बहुत सारे क्षेत्रों में ओबीसी की स्थिति की तुलना अगड़ी जाति से की जा सकती है।

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण नहीं किया जा सकता, लेकिन राजस्थान जैसे कुछ राज्यों ने 68 प्रतिशत आरक्षण का प्रस्ताव रखा है, जिसमें अगड़ी जातियों के लिए 14 प्रतिशत आरक्षण भी शामिल है। जातिगत गणना होने के बाद जो आंकड़े सामने आयेंगे उससे निश्चित रुप से टिकिट वितरण के समय ओबीसी वर्ग को लाभ होगा औरउच्च वर्ग की जातियों को नुकसान। यही वजह है कि इस मामले में राजनीतिक दल खुलकर सामने नहीं आ रहे हैं। पूरे देश में चुनावों में जातिगत आरक्षण और प्रदेश में जातियों की संख्या के आधारपर आरक्षण का मुद्दा गरमाया हुआ है। बिहार ने ओबीसी के लिए जो पहल की है, उसमें निश्चित ही केन्द्र की सहमति होगी वरना नितीश कुमार के नेतृत्व में सारे नेता दिल्ली में प्रधानमंत्री के पास लामबंद होकर नहीं जाते।

गुरू परसाई की एक चर्चित व्यंग्य रचना है हम बिहार से चुनाव लड़ रहे हंै उसी का प्रसंगवश एक अंश-
पाठकों, मैं वह हरिशंकर नहीं हूं, जो व्यंग्य वगैरह लिखा करता था। मेरे नाम, काम, धाम सब बदल गए हैं। मैं राजनीति में शिफ्ट हो गया हूं। बिहार में घूम रहा हूं और मध्यावधि चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहा हूं।
अब मेरा नाम है- बाबू हरिशंकर नारायण प्रसाद सिंह याद रखियेगा- नहि ना भूलियेगा हंसियेगा नहीं। हम नया आदमी है न। अभी सुद्ध भासा सीख रहे हैं।  जैसा बनता है न, वैसा कोहते हैं।

मैं बिहार की जनता की पुकार पर ही बिहार आया हूं। जनता की पुकार राजनीतिज्ञों को कैसे सुनाई पड़ जाती है, यह एक रहस्य है धंधे का, नहीं बताऊंगा। जनता की पुकार कभी-कभी मेमने की पुकार जैसी होती है। वह पुकारता है मां को और आ जाता है भेडिय़ा। मेमना चुप रहे तो भी कभी भेडिय़ा पहुंचकर कहता है-तूने मुझे पुकारा था। मेमना कहता है मैंने तो मुंह ही नहीं खोला, भेडिय़ा कहता है तो मैंने तेरे हृदय की पुकार सुनी होगी। बिहार की जनता कह सकती है हमने तुम्हें नहीं पुकारा। हमें तुम्हारे द्वारा अपना उद्धार नहीं करवाना। तुम क्यों हमारा भला करने पर उतारु हो?