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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-तमसो मा ज्योतिर्गमय

   प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-तमसो मा ज्योतिर्गमय

 
दीपावली पर हम बृहदारण्यकोपनिषद् से लिए गए असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय का स्मरण करते हुए सभी के लिए यही कामना करते हैं कि हमें असत्य से सत्य की ओर ले चलो। हमे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो। हमें मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो। दीपावली अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने का पर्व है। यदि हम इस रुपक को जीवन दर्शन से जोड़ें तो ज्ञान ही वो प्रकाश है जो हमें अज्ञान के तमस से मुक्ति दिलाता है। ज्ञान के प्रकाश से ही हमारे चक्षु खुलते हैं, हमारी दृष्टि के जाले साफ होते हैं। बृहदारण्यकोपनिषद् का ये मंत्र गहरे अर्थ से संपन्न है।
जीवन भर हमारा प्रयास अंधेरे से मुक्ति की यात्रा है। हम सतत प्रकाशित होने का प्रयास करते हैं। प्रकाश यानि सकारात्मकता। अंधकार है अज्ञान, हमारे समाज की रुढिय़ां, संकीर्णताएं, हमारी कुंद धार्मिक निष्ठाएं। यदि हमारे भीतर उदारता, क्षमा, प्रेम और करुणा का प्रकाश नहीं तो जीवन व्यर्थ है। हर तरह की घृणा, ईर्ष्या, द्वेष, अज्ञान का अंधकार है। शोषण, कमजोरों पर अत्याचार अंधकार है और ये अंधकार उन सबमें हैं जो ये सब कुछ करते हैं। कुछ लोग इस जीवन यात्रा में इस अंधकार से मुक्ति का सतत प्रयास करते हैं लेकिन कुछ लोग इस अंधकार को हृदय में रख कर स्वयं को कलुषित ही रखना चाहते हैं। अंधकार से प्रकाश की यात्रा मानव से महामानव होने की यात्रा है। अज्ञान के अंधेरे से मुक्ति में हमारे सबक हमारी मदद करते हैं। जीवन को ठोकरें, बड़ों की डांट, समझाइश, हमें इस अज्ञान से निकलने में सहायता प्रदान करते हैं। अज्ञान से निकलने में मदद करती हैं पुस्तकें, अच्छे मित्र और यही नहीं आधुनिक युग के डिजिटल प्लेटफार्म लेकिन ऐसा नहीं है कि यहां सब कुछ उजला है। यहां विकसित तकनीक के सिर पर भी कई जगह अंधेरे का साम्राज्य है। यहां अफवाहों का, नफरत का अंधेरा है जिसका घेरा एक छोटे से मोबाइल से निकलकर समाज के एक बड़े वर्ग को अपनी चपेट में ले रहा है। चूंकि, विवेक का आलोक नहीं, तर्क बुद्घि कुंद है न इतिहास का ज्ञान है न वर्तमान का इसलिए हमें शब्द हांक रहे हैं, हमें झूठी खबरें हांक कर अंधेरे की ओर ले जा रही है।

ऐसा नहीं है कि सिर्फ अंधेरा है। आज का मनुष्य पौराणिक आख्यानों के देवताओं से अधिक प्रज्ञावान, सुविधा संपन्न है। उसका अपना इन्द्रलोक है, जन्नत है। ज्ञान ने ही मनुष्य को विकास के इस स्तर तक पहुंचाया है। कुछ लोगों ने दूसरे के ज्ञान हुनुर और चालाकी के जरिए भी बहुत कुछ हासिल किया है, इसके बावजूद ज्ञान ने ही प्रकाश बनकर मनुष्य के जीवन का काया कल्प किया है लेकिन सिर्फ भौतिक समृद्घि ही सब कुछ नहीं है। भारतीय मनीषा में आंतरिक स्वच्छता, आंतरिक शुद्घता की बात की गई है। हमारे मनीषियों ने वाणी की उग्रता को भी वाचिक हिंसा माना। भीतर के अज्ञान को मनुष्य के पतन का कारक माना। दीपावली का दीपक उस प्रकाश का प्रतीक है जो अपने आसपास के अंधेरे से लड़कर प्रकाश फैलाता है। हमें भी अपने भीतर एक ऐसा दीपक जलाने की जरुरत है जो हमारे भीतर से नफरत, संकीर्णता और शत्रुता के अंधकार को दूर कर सके।
दीपावली का पर्व हमारे देश का खुशियों का सबसे बड़ा पर्व है। दीपावली को लेकर अलग-अलग कथाएं प्रचलित हैं। सबसे मान्य परंपरा भगवान राम से जुड़ी हुई है। यही वजह है कि इस बार भगवान श्रीराम की नगरी अयोध्या में दीपोत्सव-2021 पर नया रिकॉर्ड रचा जा रहा है। दीपोत्सव को पहले से अधिक भव्य और वैश्विक पटल पर अविस्मरणीय बनाने उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग की ओर से अयोध्या में पांच दिवसीय दीपोत्सव हो रहा है। इस बार दीपोत्सव के दौरान प्रभुराम की नगरी में 12 लाख दीपों को जलाया गया। दीपोत्सव-2021 के दौरान राम की पैड़ी पर 9 लाख दीपों का प्रज्जवलन किया गया। यह एक प्रकार से विश्व रिकॉर्ड हुआ। इसके अलावा अयोध्या नगरी में 3 लाख दीपों को प्रज्जवलित किया गया। सरयू के तट पर रामायण की गाथा को भी अमर बनाया गई। साथ ही लेजर लाइट में भव्य रामायण का हेरिटेज लुक में शो दिखाया गया। लोकल से ग्लोबल के मूल मंत्र को जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए उत्तरप्रदेश के हर गांव से आने वाले पांच मिट्टी के दीये प्रभु श्रीराम की नगरी को रोशन किया गया। राज्य के 90 हजार से अधिक गांवों में से प्रत्येक से पांच मिट्टी के दीपक समय पर अयोध्या पहुंच गए थे।  

सभी राजनीतिक दल इस बार भगवान राम की शरण में हैं। अगले साल उत्तरप्रदेश में चुनाव हैं। उसके बाद लोकसभा के चुनाव हैं। सभी को हिन्दू वोटों की चिंता सता रही है। ऐसे में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि दिल्ली बाजार के नाम से एक पोर्टल तैयार किया गया है, जिसमें दिल्ली की हर छोटी-बड़ी दुकानों को स्थान मिलेगा। इसके अलावा अरविंद केजरीवाल दिवाली के अवसर पर अपने कैबिनेट सहयोगियों के साथ पूजा करेंगे। जिसका टेलीविजन पर सीधा प्रसारण किया जाएगा।  

यह दीवाली पिछली दो दीवालियों से बिल्कुल अलग है। इस बार लोगों के चेहरों से मास्क के साथ-साथ भय भी गायब हैं। बाजारों में रौनक है। किसान आंदोलन के बावजूद फसल अच्छी हैं। छत्तीसगढ़ का किसान राजीव गांधी किसान न्याय योजना की तीसरी किश्त के रुप में 1500 करोड़ रुपए पाकर खुश हैं और बाजार में खरीददारी करने उनकी जेबें भरी हुई हैं और इससे व्यापारियों में भी काफी उल्लास है।

दीपावली का पर्व यूं तो हमारी खुशियों का पर्व है हम अपने घरों में साफ सफाई करते हैं दीये जलाते हैं। दीवाली को लेकर जनमानस के बीच जो कथाएं प्रचलित हैं उनके अनुसार जब भगवान श्रीराम 14 वर्ष के वनवास के पश्चात अयोध्या नगरी लौटे थे, तब उनकी प्रजा ने मकानों की सफाई की और दीप जलाकर उनका स्वागत किया। ये पर्व इस वजह से भी मनाया जाता है। एक अन्य कथा के अनुसार जब श्रीकृष्ण ने राक्षस नरकासुर का वध करके प्रजा को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई तो द्वारका की प्रजा ने दीपक जलाकर उनको धन्यवाद दिया। तीसरी कथा के अनुसार सतयुग में जब समुद्र मंथन हुआ तो धन्वंतरि और देवी लक्ष्मी के प्रकट होने पर दीप जलाकर आनंद व्यक्त किया गया। भारतीय संस्कृति में दीपक को सत्य और ज्ञान का द्योतक माना जाता है, क्योंकि वो स्वयं जलता है, पर दूसरों को प्रकाश देता है। तमसो मा ज्योतिर्गमय का शाब्दिक अर्थ है अंधकार से प्रकाश यानी कि रोशनी की तरफ बढ़ो। अंधकार यानी कि बुराई और बुरी आदतों को त्यागकर प्रकाश यानी कि सत्य के पथ पर उन्मुख होना ही वास्तविक साधना और आध्यात्म है।  

ये भी कहा जाता है कि दीपदान से शारीरिक एवं आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है। जहां सूर्य का प्रकाश नहीं पहुंच सकता है, वहां दीपक का प्रकाश पहुंच जाता है। दीपक को सूर्य का भाग सूर्यांश संभवो दीप कहा जाता है। धार्मिक पुस्तक स्कंद पुराण के अनुसार दीपक का जन्म यज्ञ से हुआ है। यज्ञ देवताओं और मनुष्य के मध्य संवाद साधने का माध्यम है। यज्ञ की अग्नि से जन्मे दीपक पूजा का महत्वपूर्ण भाग है।
जिनके हिस्से में अभी तक भरपूर रौशनी अवसर नही आयें है, यह दीपावली उनके जीवन को भी जगर-मगर करें।
प्रसंगवश जावेद अख्तर का शेर-
किसी ने कर ली है सूरज की चोरी
आओ किरण-किरण इकठ्ठा कर एक नया सूरज बनाएं।।