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कोई नक्शे से रंग चुरा रहा है

कोई नक्शे से रंग चुरा रहा है

ध्रुव शुक्ल

मतान्ध लुटेरों, लोभियों और हत्यारों ने धरती का अपहरण करके हमें अपने-अपने हिस्से में बाँट लिया है। वे अत्याचारी हमारी त्वचा पर चढ़े रंग के भेद और मन में बसी ऊँच-नीच की भावना को ताड़कर हमारे नरक की रक्षा का आश्वासन देकर हम पर राज करते हैं। वे इस नरक का विस्तार करने के लिए आपस में युद्ध करते हैं और हर बार हमारा खून बहाकर नयी सीमा-रेखा खींचते चले जाते हैं। उनके युद्ध का मैदान उनके द्वारा सदियों से रचा जा रहा नरक ही होता है। हम इसी नरक में डूबकर न जाने किस स्वर्ग के सपने देख रहे हैं।


आकाश में रंगबिरंगी पतंगों की तरह उड़ती व्यापारिक कम्पनियाँ आपस में पेंच लड़ाकर एक-दूसरे की पतंगें काट रही हैं। वे पेंच लड़ाते हुए इतनी ढील देती जाती हैं कि जैसे पूरे जीवन को दुलारने के लिए धरती पर उतर रही हों। छोटे-छोटे नक्शों में कै़द हमारा जीवन सदियों से  अपने धूमिल आकाश में यह पतंगबाजी देख रहा है। हर देश के शासक अपने ढीले हाथों में नटाई ज़रूर पकड़े हुए हैं पर डोर उनके हाथ में नहीं है। देखते-देखते पतंगें अपनी डोर खींचकर अदृश्य हो जाती हैं और अपने साथ नक्शों में भरे सारे रंग उठाकर ले जाती हैं।

बाज़ार की जीभ पर लोग भाग रहे हैं। वे उसके मुख से जैसे ही फिसलने लगते हैं, वह अपनी जीभ पलटकर फिर मुँह में खींच लेता है। लोग सूखती जा रही नदियों के पुल पार करते, उजड़े हुए वनों और वीरान गाँवों से आँखें मूँदे बाज़ार के मुख में उड़ रहे हैं, उसी में तैर रहे हैं।