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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - भाषा का गिरता स्तर और नफरत की राजनीति

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - भाषा का गिरता स्तर और नफरत की राजनीति

 -सुभाष मिश्र

सार्वजनिक जीवन में लोगों के बीच भाषा के स्तर में बहुत गिरावट आई है। बात-बेबात लोग एक दूसरे से गाली-गलौच करने, नीचा दिखाने से बाज नहीं आते। टीवी पर होने वाली बहस हो या चुनाव के समय होने वाली रैली, सभाएं सभी में अब हैट स्पीच या कहे अमर्यादित भाषा और आरोप-प्रत्यारोप आम बात है। चरित्र हनन के इस दौर में मीडिया भी किसी सुपारी किलर से कम नहीं है। अब एजेंडा बेस बहसें, आलोचना होती है। टीवी पर आने वाले रियलिटी शो में गाली-गलौच, व्यक्तिगत बातों को लाना आम हो गया है। ऐसे समय में यदि कोई ऐसी घटना हो जाये जो हिन्दू-मु्स्लिम के बीच वैमनस्यता और संदेह की स्थिति को बढ़ाये तो वह राजनीतिक दल के नेताओं के लिए आपदा में अवसर की तरह होता है।  

मजदूरों के काम की तलाश में साल दर साल होने वाले पलायन पर चुप रहने वाले नेता एकाएक किसी दूसरे राज्य में मजदूरों के साथ होने वाली घटना, हत्या आदि पर एकदम से हितैषी बनकर आक्रामक रुख अपना लेते हैं। जम्मू-कश्मीर में अभी हाल ही में अलगाववादी ताकतों द्वारा काम के लिए गए मजदूर, व्यक्तियों और वहां के लोगों की हत्या की तो अचानक से पूरे देश की राजनीति में बवाल आ गया। पिछले एक साल में कश्मीर में आतंकवादियों द्वारा 30 आम नागरिकों की हत्या की गई। तब बहुत से लोग खामोश रहे, क्योंकि वे इंसान नहीं किसी जाति, संप्रदाय विशेष के नहीं थे। हत्या किसी की भी हो उसकी निंदा की जानी चाहिए। निर्दोष जनता का मारा जाना किसी भी व्यवस्था के माथे पर कलंक की तरह है। रोजी-रोटी, काम-धंधे के लिए मजदूरों का पलायान हमारे देश में आम बात है। हमें आज जितने महानगर, औद्योगिक नगर दिखाई देते हैं वहां की बड़ी आबादी ऐसे लोगों की है जो रोजी-रोटी व बेहतर जीवन की अपेक्षा के साथ आये है। जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी संगठन ऐसे लोगों को निशाना बना रहे हैं जो दूसरे प्रदेशों से आकर कश्मीर में काम कर रहे है। पिछले 15 दिनों में 11 लोगों को उनकी पहचान के आधार पर मारा गया। कश्मीर की घटना को लेकर पूरे देश में एक अलग तरह का स्वर समाने आ रहा है, जो नफरत की राजनीति को बढ़ा रहा है। दरअसल जो लोग चुन-चुनकर जब क्षेत्र विशेष, भाषा, धर्म विशेष के लोगों पर हमला करते है, तो उनका उद्देश्य एक तरह का आतंक, अराजकता फैलाना ही होता है। जम्मू-कश्मीर में टारगेट किलिंग की बढ़ती घटनाओं ने केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर प्रशासन की चिंताएं बढ़ा दी हैं। पाकिस्तान प्रायोजित आतंकियों ने इस महीने की शुरुआत से अपनी रणनीति बदलते हुए आम लोगों को निशाना बनाना शुरू किया है। इन घटनाओं में इस महीने अब तक 11 लोगों की हत्याएं की जा चुकी हैं। आतंकी घाटी में अल्पसंख्यकों और गैर कश्मीरियों को निशाना बनाने में जुटे हुए हैं। आतंकी पूरी रेकी करने के बाद इन घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं।  
कभी मुम्बई से भैया लोगों को भगाने का आंदोलन हो या असम से घुसपैठियों के नाम पर लोगों को निकालने का, ओडिशा का मारवाड़ी भगाओं आंदोलन हो। अलग-अलग क्षेत्रों में बोली, भाषा, धर्म, जाति और स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर खत्म होने के नाम पर इस तरह की क्षेत्रीमता की भावना को भटका कर किया जाता है। इस तरह के मामलों में मीडिया की भूमिका भी बहुत ही गैर जिम्मेदारना दिखलाई पड़ती है। हमारे देश का सामाजिक ताना-बाना जो कि बहुत नाजूक है, उसे नुकसान पहुंचता है।

अभी हाल में नोबल शांति पुरस्कार से सम्मानित पत्रकार मारिया रेस्सा का कहना है कि सोशल मीडिया के गलत इस्तेमाल और उसके दुरुपयोग से हमारी जनसुरक्षा और लोकतंत्र को खतरा है। मारिया रेस्सा एक महिला पत्रकार हैं जिन्होंने अपने साथ घटित-घटना को बताया कि उनके जीवन को सोशल मीडिया ने पूरी तरह से बदल दिया है। उन्होंने फेसबुक के संस्थापक जुकरबर्ग को यह बताया कि उनके देश में 97 प्रतिशत लोग फेसबुक सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं और गलत उपयोग करते है। उनके विरुद्घ सरकार ने कर चोरी से लेकर मानहानि तक के आरोप लगाए और उन्हें जेल में बंद कर दिया गया। बाद में जब सरकार को सोशल मीडिया फेसबुक में फैल रही विभिन्न अफवाहों के बारे में पता चला तो उन्हें उनके साहस और जज्बे को सलाम करते हुए शांति के क्षेत्र में नोबॉल पुरस्कार से सम्मानित कर बधाई दी।

सोशल मीडिया के जरिये फैलाई जा रही वैमनस्यता, अभद्र भाषा और अफवाहों को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी और कड़े उपायों को लागू करने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है। याचिका में केंद्र को अभद्र भाषा और अफवाह फैलाने के खतरे से निपटने के लिए विधि आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए विधायी कदम उठाने का निर्देश देने की भी मांग की गई है।

वकील और भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर इस रिट याचिका में कहा गया है कि नागरिकों को चोट बहुत बड़ी है, क्योंकि अभद्र भाषा और अफवाह फैलाने में व्यक्तियों या समाज को आतंकवाद, नरसंहार, जातीय सफाई आदि के कृत्यों के लिए उकसाने की क्षमता है। अभद्र भाषा समुदायों के लिए हानिकारक और विभाजनकारी है और सामाजिक प्रगति को बाधित करती है।  

हेट स्पीच यानि द्वेषपूर्ण भाषा के अंतर्गत वो बातें आती हैं जिनमें किसी भी ऐसी बात, हरकत या भाव को, बोलकर, लिखकर या दृश्य माध्यम से प्रसारित करना, जिससे हिंसा भड़कने, धार्मिक भावना आहत होने या किसी समूह या समुदाय के बीच धर्म, नस्ल, जन्मस्थान और भाषा के आधार पर विद्वेष पैदा होने की आशंका हो।

अभी हमारे देश में अब भी ऐसे कई कानून हैं जिनका संबंध अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और हेट स्पीच से है। इन कानूनों का समय-समय पर विरोध होता रहता है। सेक्शन 295 ए के अंतर्गत लिखकर, बोलकर, सांकेतिक रूप से या अन्य माध्यम से किसी भी वर्ग के भारतीय नागरिकों की धार्मिक भावनाओं को भड़काने, धर्म को बेइज्जत करने या ऐसा करने की कोशिश करने का अपराध इस धारा के तहत आता है। इसके अलावा सेक्शन 153ए के अंतर्गत लिखित, मौखिक, सांकेतिक या अन्य माध्यमों से धर्म, नस्ल, जाति, जन्मस्थान, निवास स्थान, भाषा, संप्रदाय या अन्य किसी आधार पर नफरत की भावना को बढ़ावा देना या शांति व्यवस्था भंग करना इस धारा के तहत आता है।

सेक्शन 499 - यह आईपीसी की मानहानि से जुड़ी धारा है। इसके तहत लिखित, मौखिक, सांकेतिक या अन्य माध्यम से किसी व्यक्ति के बारे में ऐसी बात कहने का अपराध आता है, जिससे उसकी समाजिक प्रतिष्ठा या इज्जत को नुकसान पहुंचता हो।

सेक्शन 124 ए, आईपीसी की यह धारा राजद्रोह से जुड़ी हुई है। इसके तहत उस व्यक्ति को सजा दी जा सकती है जो भारत सरकार के विरुद्ध नफरत फैलाने या सरकार के खिलाफ भड़काने की कोशिश करता है या सरकार की अवमानना करता है।

सेक्शन 505-इस धारा के तहत ऐसी अफवाह या खबरें फैलाना या छापना आता है, जिससे जनता में डर की भावना बढ़ती हो। इसमें किसी धर्म, जाति या भाषा के प्रति भड़काऊ बात करना भी आता है। वर्ष 1860 से चली आ रही यह धारा गैरजमानती है।

उर्दू का एक शेर है:-
हर चीज यहां की मरकज़ में, एक रोज यहां एक रोज वहां
नफरत से ना देखो दुश्मन को, शायद वो मोहब्बत कर बैठे।


हमने कोरोना काल के दौरान देखा कि कुछ लोगों ने खास करके मीडिया पर तबलीगी जमात के खिलाफ बहुत ही नफरत फैलाने की कोशिश की गई। ऐसी-ऐसी बातों पोस्ट की गई जिससे हिन्दूृ-मुस्लिम के बीच वैमनस्यता फैले। तबलीगी जमात के बहाने मुसलमानों पर निशाना साधा गया।

ये तो हमारी साझी संस्कृति, समझ और आपसी रिश्ते ऐसे है कि बहुसंख्यक वर्ग इस तरह की भ्रामक और हेट स्वीच के बहकावे में नहीं आता। बहुत सारे ऐसे लोग है जिन पर नियम, कानून और मनुष्यता को बचाये रखने की जिम्मेदारी है पर वे मनुष्यता की अपनी सोच-समझ का लोभ किनारे रखकर व्यक्तिगत स्तर पर धार्मिक होकर ऐसा आचरण करते है जो उन्हें बौना करार देता है। किसी भी राज्य की प्रजा धार्मिक हो सकती है, अलग-अलग धर्मो को मानने वाली तो सकती है, किन्तु यदि सरकार भी जाति, संप्रदाय के आधार पर भेदभाव करने लगे, संकीर्ण हो जाये तो वह राज्य, राष्ट्र धर्म निरपेक्ष कैसे रहा सकता है। दुर्भाग्य से हमारे देश में लगातार सभी स्तरों पर संकीर्णता बढ़ रही है।

हमारे संविधान में जो धर्मनिरपेक्षता के प्रावधान है उसके अनुसार राज्य किसी धर्म की स्थापना या प्रचार नहीं करेगा और न ही राज्य का कोई धर्म होगा। किसी धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए सार्वजनिक धन का उपयोग नहीं किया जायेगा राज्य को धर्मपालन से जुड़ी हुई आर्थिक, वित्तीय एवं अन्य धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों को नियंत्रित करने का अधिकार होगा। हर नागरिक को धर्म व अंत:करण की समान स्वतंत्रता होगी।

संविधान की भावना से इतर हमारी राजसत्ता, हमारा तंत्र, नौकरशाही, न्यायपालिका, पुलिस, सेना, शिक्षा आदि जगहों पर बहुत सी फिरकापरस्त सोच के लोग भरे हुए हंै, जिनकी वजह से हमारा समूचा तंज कहीं न कहीं बहुत ही पूर्वाग्रही दिखता है वहीं मामलों में अहम भूमिका निभा रहा है।
समूचे हालात को देखकर दुष्यंत कुमार का ये शेर प्रसंगवश याद आता है-
उनकी अपील है कि हम उनको मदद करें
चाकू की पसली से गुजारिश को देखिए।।